Thursday, 26 January 2023

बादशाह का पहला क़दम दिल्ली और आख़िर भी दिल्ली।

अज़ीज़ नाज़रीन

सामां है सो बरस का पल की ख़बर नहीं आगाह है अपनी मौत से कोई बशर नहीं।  

यह सहाफी २०१० में सहाफत की दुनियां में आया था।  और जिस बेबाकी से लिखता था उससे मोदी जैसे दरिंदे दहशतगर्द को इल्म हो चूका होगा की मुझ जैसे रावण को फांसी अगर हुई या गर्दन क़लम की गई तो सहाफियों की बेबाकी की वजह से ही होगी।  उसने अपने आपको अकाल और लावारिस मौत मरने से बचाने के लिए २०१० में ही ते कर लिया था की वोह वज़ीरे आज़म बनेगा तो यह तमाम उधेड़ बून ही ख़तम हो जाएगी।

फिर जब मोदी के गलीज़ और शैतानी दिमाग़ में वज़ीरे आज़म बनने का कीड़ा कुलबुलाने लगा था तब उसने २००२ के बाद पहली बार दहशत की पनाहगाह गुजरात से बहार निकलने की हिम्मत जुटाई थी।  उसकी पहली भिड़ंत नवजनों के साथ दिल्ली यूनिवर्सिटी के तालिबे इल्मों के साथ थी।  उस ने वोह कुश्ती भी पूरे तहफ़्फ़ुज़ इक़दाम कर के लड़ी थी।मीडिया के कुछ धड़ों को अपने क़ब्ज़े में कर के और विद्यापीठ में ऐ.बी.वी.पी, के दहशतगर्दों का मेहफ़ूज़ घेरे के अंदर ही गले में काला गमछा डाल कर दिल्ली यूनिवर्सिटी में तालिबे इल्मों को ख़िताब करने गया था मोदी।

नज़रिन २०१० से सहाफत के तमाम फोरम्स और अपने मज़्मूनों में लिखता था की मोदी ने मीडिया, अदलिया और अवाम को ख़रीद लिया है वोह सिर्फ इसलिए की उस ख़ौफ़नाक मौत से बच सके जो गुजरात हिन्दू दहशतगर्द हमलों में उसके मुलव्विस होने की वजह से उसका पीछा कर रही है।  नाज़रीन मोदी यह भूल गया की हाकिमियत के फ़राइज़ को अंजाम देते हुए वोह जिस मालिके कायनात को भूल गया था और जिस मौत से वोह भाग रहा है वोह उसको कहीं भी दबोच सकती है।  अगरचे मोदी ज़मीन के आख़िर सतह में जा छुपे तब भी मौत से नहीं बच सकता।  दूसरी बात जिस जगह लिखी है वोह पहले ही उस जगह पहुंच जाएगा फिर मौत उसके पीछे पीछे पहुंचेगी। 

एक हक़ीक़ी बात के साथ अपने मज़मून को ख़तम करता हूँ।  हज़रते सुलेमान अलैहे सलाम नबीयूना के पास ऐसा तख़्त था जो सेकंड में रूहे ज़मीन से ले कर आसमान की बुलंदिओं पर पहुंच जाता था।  और दुनियां के किसी भी ख़ित्ते पे कुछ ही सेकंड में पहुंच जाता था।  एक बार हज़रते इज़राईल, सुलेमान अलैहिसलाम के साथ हमकलाम थे तभी उन्होंने देखा की एक शख्स उनके पास आया तो हज़रते इज़राईल उसको देख कर बोहोत ही जलाल के अलाम में गए चेहरे पर बड़े ही सवालिया निशान नुमाया हो गए बड़े ही पशो पेश में फिक्रमंदी के आलम में उसको देखने लगे।  अब उसने हज़रते सुलेमान अलहेसलाम नबीयूना से उस तख़त की सवारी की इल्तेजा की और उस जगह जाने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की जो करोड़ों मील की दूरी था।  उसकी यह बात सून कर हज़रते इज़राइल हंस पड़े और पुर सुकून हो गए।  जब वोह शख्स रवाना हुआ तो सुलेमान असहसालाम ने इज़राइल अहलेसलाम से इस गुस्से और इत्मीनान की वजह जाननी चाही।  इज़राइल अलैहिसलाम से कहा नबी अल्लाह इस शख्स की मुझे जिस जगह जिस वक़्त रूह क़ब्ज़ करने का हुकुम है वोह जगह यहाँ से करोड़ों मील दूर है और में यहीं सोच रहा था अल्लाह ने इसकी रूह चंद ही मिनटों क़ब्ज़ करने का हुकुम दिया है वोह तो करोड़ों मील दूर है और यह शख्स तो अभी यहाँ है कैसे मुमकिन होगा इसलिए में परेशान था।  लेकिन इसने आपका तख़्त मांग कर उसी जगह जाने की आरज़ू ज़ाहिर की जहाँ मुझे इसकी रूह क़ब्ज़ करने का हुकुम मिला था इसलिए में पूर सुकून हो गया।   अब चंद सेकंड में यह शख़्स उस जगह पहुंचेगा और इसके पीछे पीछे में पहुँचता हूँ इसकी रूह निकालने के लिए। 

नाज़रीन बताने का मक़सद वहीँ है जिस दिल्ली से मोदी ने अपनी दहशत और तानाशाही का आगाज़ किया था आज वहीँ दिल्ली मोदी के गले में फांसी का फंदे का बाईस बन रही है।  हर ख़ित्ते में एहतेजाज हर यूनिवर्सिटी में बवाल हो रहा है।  और इस बार मेहगाई, बदअमनी की वजह से नहीं बल्कि मोदी के क़त्लो ग़ारत दहशत की वजह से जिस इंसानियत का क़तल हुआ मोदी के उस नाइंसाफ़ी भरे अमल के खिलाफ है।  ना ही साबरमती एक्सप्रेस में मुस्लिम अवाम ने आग लगाई थी और ना ही किसी मुस्लिम ने कार सेवकों को मारा था।  जिसका ज़िक्र में मेरे हर बार के मज़मूनों और खबरनामों के तब्सिरों में २०१० से कर चूका हूँ।  भारत के मीडिया ने तो मेरी तहक़ीक़ात और रिपोर्ट को इतिहास की किताबों तक सीमित रखा लेकिन जब वही रिपोर्ट और तहक़ीक़ात आलमी मीडिया के पास पहुंचाई गई तो बवाल हो रहा है।  

इस बात का ज़िक्र १७ जनवरी २०२३ को 'आज तक' की दावूद इब्राहीम की दूसरी शादी वाली एक ख़बर में कर चूका हूँ।  मेने साफ़ यही लिखा है मेरी तहक़ीक़ात पूरी हो चुकी है और मेने मेरी रिपोर्ट आलमी बरादरी और आलमी मीडिया को सौप दी है।  में २०१० से भारत में आलमी तहक़ीक़ाती इदारे की जानिब से अकलियतों पर होने वाले मज़ालिमों पर एक रिपोर्ट बना रहा था अब वोह मुकम्मल हो गई है और हो सकता है अब मुझे मेरे ऑफिस वापिस बुला लिया जाए।  २१ जनवरी को में मेरे मुक़ाम पर पहुंचा और २३ को बीबीसी ने डॉक्युमेंटरी रिपोर्ट शाया की है। 

Journalist Zuber

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