Thursday, 5 January 2023

तीन क़ौमी नज़रिया से ही होगा ज़हर का ख़ात्मा।

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज कल कांग्रेस के सिपाहा सालार जनाब राहुल गाँधी भारत जोड़ो मिशन पर हैं।  बक़ौल कांग्रेस जिसमे उनको अवाम का ताऊन भी मिल रहा है।   लेकिन मेरा एक सवाल ना सिर्फ जनाब राहुल गांधी से बल्कि कांग्रेस और तमाम सेक्युलर तंज़ीमों के सरबराहों, उनके रकूनों, नुमाइंदों से है।  क्या महज़ भारत को जोड़ने से ही उस ज़हर का ख़ात्मा हो जाएगा जिसकी संगे बुनयाद मुठ्ठी भर शिद्दत पसंद दहशतगर्दों ने १९२५ में रखी थी।  उस ही आलूद, मवाद, फ़िरक़ापरस्ती की वजह से अज़ीम इस्लामिक रियासतें पाकिस्तान, जूनागढ़, गोवा, हैदराबाद और कश्मीर वजूद में आई थी और उसी आलूद, फ़िरक़ापरस्ती फसाद के सबब बाबा ऐ क़ौम महात्मा गांधी को ज़ालिमों, दरिंदों, जल्लादों, दहशतगर्दों के हाथो जामे शहादत नोश करना पड़ी थी।  

इस सहाफ़ी का तो यही मानना है महज़ भारत जोड़ो की कोई हैसियत नहीं है अगरचे अवाम के दिलों दिमाग़ में मुल्क की सबसे बड़ी अक़लियत के ख़िलाफ़ मवाद और ज़हर की मिक़्दार सबसे बड़े पैमाने पर हो।  फील वक़्त कितना भी भारत को जोड़ लो मुस्तक़बिल में वोह लावा फिर कभी भी फट सकता है।

इस तमाम मसले और ज़हर का हल या काट है तीन क़ौमी तहरीक।  तब की इस्लामिक रियासतें पाकिस्तान, जूनागढ़, हैदराबाद इस्लामिक उसूलों पर बनी और गोआ क्रिस्चियन।  लेकिन हिन्दू उसूलों की कोई बात ही नहीं करता है।  भारत बना एक सेक्युलर मुल्क।  अब जिन फ़िर्क़ापरस्तों, ज़ालिमों, दरिंदों ने भारत को सिर्फ हिन्दू मज़हब के लिए तक़सीम किया था उनका मक़सद फ़ौत हो गया।  उसके ऊपर जवाहरलाल, गांधी और दीगर सियसतदांओं ने अक़लियती हुक़ूक़ की  बालादस्ती का बीड़ा उठाया।  अकलियतों के लिए एक अलहदा वाज़ारतखाने का एहतेमाम किया गया, उनको हुक़ूक़ फ़राहम किये जाने लगे।  यह देख कर हिन्दू शिद्दत का जब्र, बर्बरियत और ज़ुल्म अक़लियतों ख़ास मुस्लिम और क्रिस्टी अवाम के ऊपर बेहद बढ़ता चला गया।  

उसी ज़हर की काश्त को फ़रोग़ देने के लिए फौजी हिकमते अमली इख़्तेयार कर के इस्लामिक रियासत हैदराबाद, जूनागढ़ और क्रिस्टी रियासत को बलजबरी से जंग कर के शिद्दत और हज़ारों लाखों अवाम का क़त्ले आम कर के भारत में शामिल कर लिया गया।  और पाकिस्तान की तक़सीम की गयी, ताके उसकी ताक़त और क़ुव्वत कभी भी भारत को दोनों जानिब से मुज़िर साबित ना हो सके।   

वही हिकमते अमली भारत के शिद्दत पसंद, फ़िर्क़ापरस्त हिन्दू अवाम के इसरार पर कश्मीर में की गई लेकिन कश्मीर के जंगजुओं ने भारत के फ़ौजिओं का धुव्वा निकाल दिया।  भारत के फ़ौजिओं की हलाकत और कश्मीर की तहरीके आज़ादी की दास्तान आज ७० सालों से ज़ाइद भारत के लिए गले की फांस साबित हो रही है।

माज़ी और तारीख़ की बातें बताने का मक़सद वही है की मुस्तक़बिल में भारत के लिए फिर से वही दास्ताने बर्बादी ना लिखी जाए।  दरहक़ीक़त भारत जोड़ों उतना एहम नहीं है जितना की भारत के अक्सरियत अवाम के दिलों दिमाग़ में पेवस्त किया हुआ ज़हर।  इलाज उस ज़हर का करना है अब चाहे गोली देना पड़े या इस ज़हर के ख़ात्मे के लिए कोई और हिकमत हुकूमत इख़्तेयार करे। बजाये अक़लियतों, दबे कुचले मुस्लिम अवाम पर मज़ीद तशददुत करने के उस ज़हर का इलाज करने की हाजत है जो हिन्दू अक्सरियत के दिमाग़ में चढ़ गया है। और उनको एक लाइलाज बीमारी हो गई है हिन्दू ख़तरे में है।  हम अक़लियत हो जायेगें।  हर मुद्दे पर उनको मुस्लिम अवाम से एक ख़ौफ़ का अंदेशा ही रहता है।अरे मुग़लों ने तुम्हारे ऊपर १२०० साल हुकूमत की तब तुमको अक़लियत नहीं होने दिया। 

२०० साल क्रिस्टी अवाम ने ग़ुलाम बनाया तब तुम अक़लियत नहीं हुए लेकिन वज़ीरे आज़म तुम्हारा, हुकूमत तुम्हारी, सदरे जम्हूरिया तुम्हारा, नायब सदरे जम्हूरिया तुम्हारा, ऐवान तुम्हारा, अदलिया तुम्हारी, रिज़र्व बैंक तुम्हारा, तंज़ीम तुम्हारी,  फ़ौज तुम्हारी, इंतेख़ाबी अमला तुम्हारा २० से ज़ाइद सूबों में हुकूमत तुम्हारी फिर भी हिन्दू ख़तरे में आ जाएगा।  अब ऐसे फ़ल्सफ़ेबाज़ों को नामर्द ही कहा जाएगा जिनका मज़हबी एतेक़ाद महज़ एक भगवा अंगोछे से टूट जाता है। 

इनको ख़ौफ़ भगवा की बेइज़्ज़ती का नहीं है बल्कि उस पठान से ख़ौफ़ ज़दा हैं जिनके क़लमों की धार इनके सीने चाक किये दे रही हैं।    

राहुल गांधी से में मुतालबा करूँगा की इस फ़िरक़ापरस्ती, दहशत के नाग के डांस को हर वक़्त के लिए ख़तम कर दिया जाए जिसका डांस भारत के अवाम ने १९४७ और २०१४ से भोगा है।  १९४७ से क़ब्ल और २०१४ के बाद ग़ुलामी की जिन ज़ंजीरों को तोड़ कर आज़ादी नसीब हुई थी फिर से वोह हालात ना बने उसके लिए इक़दाम करने होंगे।  अगर अब आज़ादी फिर वही फ़िर्क़ापरस्त, ज़ालिम, जल्लाद, नाइंसाफ और दहशतगर्दों के हमराह मिली तो अगला हदफ़ इन लोगों का महात्मा गांधी, हेमंत करकरे जैसे अज़ीम पुलिस अफसर की जज़्बा ऐ शहादत को वतन परस्ती को तमगा ऐ ग़द्दारी में तब्दील करने की होगी।  और आज़ाद भारत के पहले दहशतगर्द नाथूराम गोडसे उसकी नस्ल से आये जितने भी शिद्दत पसंद हैं उनको वतन परास्त बनाने की होगी।  इस मोहीम में शामिल होंगे तमाम ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियाँ।    

आज की तारीख़ में संघ और बीजेपी ने अकसरियत अवाम को उस हद तक पुर आलूद कर दिया है की अब अगर मुस्लिम अवाम के साथ इन्साफ़, हक़ पसंदी या हुस्ने सुलूक की बात भी की जाए तो भारत के हर हिन्दू अवाम को ईज़ा पहुँचती है और वोह इश्तेआल अंगेज़ी भरे मुज़ाहिरे करता है।  इन सब हालात के लिए ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर और लँगूरनियों की टोली ज़िम्मेदार हैं।  जिनको हर मुद्दे पर महज़ मुस्लिम ही दिखाई पड़ जातें हैं।  बाबरी मस्जिद पर हक़ और इन्साफ़ की बात पर कभी मुबाहिसा नहीं हुआ।  आला अदालत ने माना की बाबरी मस्जिद को शहीद करना एक मुजरिमाना अमल था।  फिर मुजरिमों के ऊपर मुबाहिसा छोड़ राम मंदिर के मवाफ़ेक़त भरे डीबेट होने लगे।  जबकि राम मंदिर का कोई वजूद ही नहीं मिला, कोर्ट ने इस बात को तस्लीम किया की मस्जिद की तामीर के लिए कोई मंदिर नहीं तोड़ी गई थी।  लेकिन तारीख़ के सफों में यह बात दर्ज हो गई की इस्लामिक बादशाही और हाकिमियत में कोई मंदिर नहीं तोड़ा गया लेकिन हिन्दू अकसरियत में मंदिर की तामीर के लिए मस्जिदें तोड़ी गई है।

में गुज़ारिश करता हूँ कांग्रेस के सरबारह राहुल गांधी से और तमाम सेक्युलर तंज़ीमों से अब आज़ादी मिले तो मुस्तक़बिल में कभी भी ऐसे ज़हरीले अनासिर, फ़िरक़ापरस्त ताक़तें उस आज़ाद भारत का हिस्सा ना बनने पाए जो सेक्युलर भारत के शीरी पानी को अपनी ग़लीज़, गन्दी, ज़हरीली  ज़ेहनियत से फिर से पुर आलूद कर सकें। 

जिनको हिन्दू राष्ट्र चाहिए उनको तीन क़ौमी नज़रिये पर अमल करना ही होगा।  अगर १९४७ की बात करते हो तो पाकिस्तान की तोहसीह मौजूदा दौर में करना होगी और तमाम मुस्लिम अवाम को वहां पर भेज कर दो क़ौमी नज़रिये पर अमल करना होगा।   हर हाल में भारत का एक तक़सीम फिर से करना ही पडेगा।  अगर हिन्दू राष्ट्र बनाना है मनु का क़ानून नाफ़िज़ करना है एकसा क़ानून बनाना है तो मुस्लिम, क्रिस्टी, सिख अवाम तुम्हारे मनु के क़ानून को नहीं मानेगा ऐसी सूरत में २० करोड़ मुस्लिम अवाम ३ करोड़ क्रिस्टी और २ करोड़ के करीब सिख अवाम किधर जायेगें। 

सीधा सा हल है तीन क़ौमी नज़रिये पर अमल करते हुए भारत का एक और तक़सीम कर के हिन्दू राष्ट्र बनाया जाए और दूसरा रहे सेक्युलर।  लेकिन उस सेक्युलर भारत में एक भी संघी, एक भी शिद्दत पसंद हिन्दू, एक भी बीजेपी वाला एक भी ज़हरीला नाग ना रहे।  उस सेक्युलर भारत से ऐसे सुहैब क़ासमी, मुख्तार अब्बास नक़वी, शाहनवाज़, मोहसीन रज़ा, ज़फर इस्लाम जैसे उन तमाम मुस्लिम अवाम को भी हकाल दिया जाए जो मौजूदा दौर में बीजेपी, संघ की हिमायत करते हैं और हर मुद्दे पर सेक्युलर भारत के उसूलों दस्तूर की ख़िलाफ़वर्ज़ी करतें हैं। 

भारत जोड़ो यात्रा से एक सियासी पैग़ाम तो जा रहा है लेकिन उस ज़हर का ख़ात्मा नहीं हो रहा है जो अवाम के दिलों दिमाग़ में १९२५ से भरा गया था और आज एक सदी के बाद तमाम अकसरियत अवाम पुर आलूद हो चूका है।  अगर आज अकसरियत अवाम राहुल के साथ आ रहा है तो वोह वतन की मोहब्बत में नहीं बल्कि अपने मसाइल से परेशान हो कर आ रहा है।  बेरोज़गारी, मेहगाई, तालीम, माश की वजह से आ रहा है। 

कल जब सब कुछ पुरअमन हो जाएगा भारत तरक़्क़ी करना शुरू करेगा फिर से कोई फ़िर्क़ापरस्त, ज़ालिम, दरिंदा, क़साई, दहशतगर्द उठ कर भारत को मज़ीद पस्ती की जानिब धकेल देगा।  कब तक भारत ऐसे ही धीरे धीरे तड़प तड़प कर मरता रहेगा।  हलाल पर एतेराज़ करने वालों और झटके पर यक़ीन रखने वालों से कहूंगा की एक ही झटके में भारत को सेक्युअर और हिन्दू राष्ट्र में टुकड़े कर दो। 

Zuber

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