Wednesday, 11 January 2023

सल्तनते मोदी के कुछ फ़ैसले क़ाबिले तारीफ़

 

अज़ीज़ नाज़रीन

यूं तो सहाफ़ी मोदी हुकूमत और बीजेपी का सख़्त मुख़ालिफ़ रहा है, लेकिन इस बात को इस सहाफ़ी को मन्ज़रे आम करने में ज़र्रा भर शक और शुबह नहीं है की सल्तनते दिल्ली के तख़्त पर फ़ाइज़ मौजूदा बादशाह मोदी के कुछ फ़ैसले क़ाबिले तारीफ हैं।   वोह कौन कौन से फ़ैसले हैं जिनकी ताऱीफ करना सहाफ़ी का मक़सद है वोह मज़मून के दरमियानी हिस्से या इक्तेदाम पर तहरीर करूँगा।  फील वक़्त जो एहम फैसला लिया गया है उसको बताता हूँ।   

मरकज़ ने हज को ले कर एक एहम फ़ैसला लिया है।  अब हज के लिए हुकूमत की जानिब से दिया जाने वाला वी.आई.पी. कोटा अब खत्म हो गया है।   इससे क़ब्ल हज बैतुल्लाह को लेकर कुछ मेहफ़ूज़ सीटें दी जाती थीं, जिन्हें कि अब खत्म किया जा रहा है. इस क़दम के बाद हज बैतुल्लाह पर जाने वाले तमाम  हुज्जाज हज़रात आम ज़ायरीनों की तरह ही सफ़र करेंगे. किसी भी हाजी को कोई मख़सूस वी.आई.पी.  कल्चर नहीं मिलेगा. 

इससे क़ब्ल सदरे जम्हूरिया, नायब सदर, वज़ीरे आज़म, अक़लियती मामलों का वाज़ारतख़ाना और हज कमिटी की जानिब से अलोटेड सीटों से तक़रीबन ५०० अफ़राद हज पर जा सकते थे. सदरे जम्हूरिया कोटे से १००, नायब सदर कोटे से ७५, वज़ीरे आज़म कोटे से ७५, अक़लियती मामलों का वाज़ारतख़ाना कोटे से ५०, अल हिन्द हज कमेटी को २०० सीटें मिलती थीं. लेकिन नई हज नीति के मसौदे में अब इसे खत्म किया गया  है. 

सल्तनते मोदी ने मुस्लिम अवाम से मुत्तलीक़ जो भी ग़लतफ़हमी ज़ाफ़रानी सहाफ़ियों ने अक्सरियत अवाम के दिलों दिमाग में भर रखी थी उसको फांसी दे दी।  नाज़रीन अब सिलसिले वार समझने की कोशिश करते हैं जिन मुद्दों पर ज़ाफ़रानी सहाफिओं ने मुस्लिम अवाम के ख़िलाफ़ गलत फ़हमी पैदा की थी। 

१.         हज सब्सिडी:  जिसके ऊपर २०१० से में सहाफ़त में आया था तब से हर डिबेट में अक्सरियत अवाम से तनक़ीद सुनने को मिलती थी हमारे टेक्स का पैसा कांग्रेस हज सब्सिडी में देती है।  अक्सरियत अवाम के अल्फ़ाज़ों में ज़हर उतना होता था की मुस्लिम अवाम का क़त्ले आम करने की हिकमत तक चलें जाएँ।  फिर Hindustan Times और The Times of India अंग्रेज़ी और नव भारत टाइम्स हिंदी खबरनामों के तब्सिरों में अक्सरियत अवाम से खुले अलफ़ाज़ में बोलता था बंद करो हज सब्सिडी हम हमारे मालिक की रज़ा के लिए हज पर जातें हैं किसी काफ़िर हुकूमत के रहमो करम पर नहीं जाते।  हज सब्सिडी ख़तम होने पर कई मज़मून शाया किये हैं की यह पैसा मुस्लिम अवाम से ज़्यादा ले कर कुछ पैसा उनको वापिस कर दिया जाता था।  दरअसल सब्सिडी थी ही नहीं वोह हमारा ही पैसा था।  दूसरी बात कही थी हज कमेटी सिर्फ एयर इंडिया से टिकट बुक करती है कुछ तो भला इंडियन एयर को हो रहा होगा तो हाजियों को भी थोड़ा सा बेनिफिट दे दिया।

२.          ट्रिपल तलाक़:  ट्रिपल तलाक़ जब तक बेन नहीं हुआ था तब तक हर शिद्दत पसंद हिन्दू हर बीजेपी वाला हर संघी हर लंगूर लँगूरनियाँ मुस्लिम मस्तूरातों के मुहाफ़िज़ बन कर आ जातें थे।  बीचारि क्या खायेगी, कहाँ रहेगी, क्या पहनेगी।  लेकिन जब हक़ीक़त से रू बरू किया गया तो पता चला की ट्रिपल तलाक़ सिर्फ और सिर्फ ढकोसले बाज़ी थी।  हमदर्दी का एक नाटक।  अगर मुस्लिम ख़ातूनों से हमदर्दी होती तो जो भी मुस्लिम मस्तूरातें हूजूमी दहशत में बेवा हो गई उनके बच्चे यतीम हो गए उनके लिए भी हुकूमत काम करती।  लेकिन मक़सद मुस्लिम मर्द को जेल भेज कर मुस्लिम ख़ातूनों का इसतेसाल करना था।  और जेल गए शोहर की बीवी से मजबूरी में क़ानूनी देख रेख में संघी दहशतगर्दों से उसकी शादी करवाना थी। 

३.      बाबरी मस्जिद: बाबरी मस्जिद का नाइंसाफ़ी भरा फ़ैसला आया तो ना सिर्फ़ भारत के मुस्लिम अवाम बल्कि उनके साथ काम करने वाले बोहोत से सेक्युलर और इन्साफ़ पर यक़ीन करने वाले हिन्दुओं को भारत के अदालती निज़ाम की पोल खुल गई और सख़्त तशवीश हुई।  उस नाइंसाफ़ी के फ़ैसले पर ना सिर्फ़ आलमी बरादरी बल्कि तमाम इस्लामिक दुनियां भारत की अदलिया और गंगा जमुना तहज़ीब पर फ़िक़रे कसने लगे।  तमाम आलमी बरादरी के सामने भारत और उसका निज़ामे अदलिया एक मुजरिम के जैसे बरहना हो गया।  

४.    कश्मीर की दफ़ा ३७० मन्सूख़:  नाज़रीन कश्मीर की दफ़ा ३७० जिस अंदाज़ में दस्तूर का क़त्ल कर कश्मीर की इंतेखाबी असेम्ली की जानिब से सिफारिश किये बग़ैर एवान में जब्र, शिद्दत और दहशत का मुज़ाहेरा कर के मन्सूख़ की गई उससे भारत की अज़मत को शदीद इज़ा पहुंची है।  मसला ऐ कश्मीर जो २०१९ तक भारत के ऐवान के बंद कमरों में क़ैद था उसको वज़ीरे दाख़ला ने आलमी बरादरी के लिए खोल दिया और उसको बेनक़वामी बना दिया।

५.    हूकूमती हाजी ख़तम:  अब हुकूमत की जानिब से वीआईपी हज नुमाइंदगी ख़तम की गई है। जिसका ख़ैर मक़दम करता हूँ।  उसकी वजह है अब बीजेपी, मुनाफ़िक़ और हूकूमती ग़ुलाम अरेबिया वी आई पी कोटे से नहीं जा सकेगें। नहीं तो नक़वी, शाहनवाज़, मोहसिन, आरिफ, ज़फर जैसे ग़द्दारे क़ौम इस्लाम दुशमन अरेबिया जा कर रियासते मदीना पर धौंस जमाते थे और काफ़िर मुल्क में मुस्लिम शाद हैं आबाद हैं ऐसे क़सीदे कस्ते थे।

कुछ मुनाफ़िक़ और शिद्दत पसंद हिन्दू, संघ के रकून बाबरी मस्जिद और दफ़ा ३७० पर हुकूमत की पीठ थापतपाते हैं की ऐसे मसले मिनटों में हल कर दिए।  तो उनसे कहना चाहता हूँ मसले हल नहीं हुए हैं उसके दूरंदेश नताइज भयानक होंगे। फिर इन्साफ़ का क़तल कर के भारत की अज़मत आलमी बरादरी में सबसे निचली पायदान पर पहुंचा कर अदलिया को ज़लील कर के ख़ुद को देहशतगर्द ज़ाहिर कर के अगर कुछ काम किया तो उसकी अज़मत और इज़्ज़त नहीं रहती है।  फैसला मुंसिफाना कहाँ हुआ।  उस फ़ैसले से आला अदालत के वक़ार और इज़्ज़त की धज्जिया उड़ गई और साबित हुआ की अदालत भी साजिश कर्ताओं, ज़ालिमों, मुजरिमों और अदालत की तोहींन करने वाले नाइंसाफों के साथ है।   फैसले हल कर दिए लेकिन किस क़ीमत पर हल किये।  और भारत को उसके लिए कितनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी है।  

फिर ऐसे तारिक़ फ़तेह, तस्लीमा नसरीन जैसे मुनाफ़िक़ों को अलहदा कीजिये बल्कि ऐसे मुनाफ़िक़ों को हूकूमते हिन्द की जानिब से सज़ा दिलवाइये। "सर तन से जुदा"  या नहीं तो उनको ऐसी सख़्त हिदायत दी जाए वसीम रिज़वी की तरह तुम भी सनातन मज़हब इख़्तेयार करो लो नहीं तो अपनी जान देने को तैयार रहो।

Zuber

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