Saturday, 21 January 2023

तंज़ीम मजलिस और असद साहब और कितना ज़लील होंगें।

अज़ीज़ नाज़रीन

२०१४ के ग़ुलाम भारत में संघियों, बीजेपी, शिद्दत पसंद हिन्दू और लंगूर-लँगूरनियों में मुस्लिम नुमाइंदगी को ले कर एक आम रुझान देखने को मिल रहा है।  हाकिमियत की कुर्सी पर फ़ाइज़ तमाम काफ़िर शिद्दत पसंद  भारत को अपनी जागीर तसव्वुर करने लगें हैं।  हर मुद्दे पर ऐसे ग़द्दारे वतन भारत के सबसे पहले दहशतगर्द, ज़ालिम, फ़िरक़ापरस्त, दरिंदे, क़ातिल गोडसे के वारिस तमाम मजलिस, मुस्लिम नुमाइंदों और असद साहब को पाकिस्तान परास्त और क़ाइद ऐ आज़म जनाब मुहम्मद अली जिन्ना साहब का परोकार और मुवाफ़िक़ बोलतें हैं। 

दरअसल लंगूरों की इस टीम और ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों को ऐसा गुमान ना जाने कहाँ से हो गया है की भारत उनकी मिलकियत है और भारत में रहने वाला मुसलमान अब दुसरे और तीसरे दर्जे का शहरी है।  लंगूर लँगूरनियों की टीम भारत के मुसलमानों को बे यारो मददगार तस्लीम कर रही है।  मुस्लिम क़ियादत पर इन लंगूर लँगूरनियों की टोली और ज़ाफ़रानी दशहतगर्दों को शदीद ज़र्ब  पहुँचती है।  जैसा की १५ मिनिट पर पहुँचती है।   अंगार ऐसी लगती है की जलन बुजाये नहीं बूझती। मजलिस के नुमाइंदों और असद साहब से ज़लालत भरे सवालात करना उनको पाकिस्तानी बताना इस मुल्क में उनकी कोई शिराकत नहीं है तुमको दे दिया पाकिस्तान अब वहां जाओ वग़ैरा।  मजलिस के मुस्लिम नाम से लंगूर लँगूरनियों को एतेराज़ है।  मै हैरान हूँ की मजलिस के नुमाइंदे यहाँ तक की असदुद्दीन ओवेसी साहब भी लंगूर-लागूरनियों और ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों के नाज़ेबा एतेराज़ पर दिफ़ा कियों करतें हैं।  हम बाय चॉइस भारीतय हैं बाय चांस नहीं।  क्या बेकार फलसफ़ा है।  अब तो खुल कर बोलना होगा तुमको अगर  इस्लाम से इतनी नफ़रत है और  मुस्लिम क़ौम से दुश्मनी तो करो तीन क़ौमी नज़रिये पर अमल।  ठीक है एक बनाओ हिन्दू राष्ट्र दूसरा रहेगा सेक्युलर इंडिया।  अगर हमको आज की तारीख़ में पाकिस्तान भेजना है तो तोसीह सरहद करना होगी।  जब हमारे हुक़ूक़ पर डाका डाला जा रहा है और हमको हर मुद्दे पर ज़लील रुस्वा किया जा रहा है।  हमारी नुमाइंदगी तुमको क़ुबूल नहीं हर मुस्लिम मसले पर तनक़ीद तो सरहद तरमीम करो हम पाकिस्तान चले जायेगें। 

आज मोदी जी को बोहरी अवाम याद आ रहा है।  दर हक़ीक़ात यह बोहरी अवाम की मोहब्बत नहीं बल्कि उनकी दौलत की मोहब्बत बोल रही है जिस पर गिद्ध के जैसी गलीज़ और गन्दी निगाहें हैं।   सिर्फ और सिर्फ ज़ुबानी जुमले बाज़ी।  फिर आपका और आपके भक्तों का जो गलीज़ और गंदा ट्रैक रिकॉर्ड है उसको कैसे साफ़ करोगें।  आप तो आगे चलने की बातें कर रहे हो लेकिन आपके पीछे मुस्लिम अवाम के क़त्ल और खून के निशान आपकी शिनाख्त को बदनुमा कर रहें हैं। 

ठीक है बोहरी अवाम पर ही बात कर लेते हैं।  २०१८ में सूबे शुमाल में दरिंदा सिफ़त ज़ालिम क़ातिल शिवराज सिंह चौहान हार गया था उसकी हार में सूबे शुमाल की लँगूरनी को देखिये बोहरी मज़हबी पेशवा के खिलाफ कैसे अदना दर्जे की तफ़्सीर पेश कर रही है।  पेशे खिदमत है जनवरी २०१९ को लिखा मज़मून और सूबे मध्य प्रदेश से नाज़ेबा तफ़सीर।   सय्यदना की रूहानी ताक़त के आगे पस्त हुई शैतानी ताक़त

अब बतातें हैं पसतमंदा मुस्लिम अवाम के बारे में।  उसकी पसतमंदगी और मुफलिसी के ज़िम्मेदार है आपके अपने ज़ाफ़रानी सिपह सालार।  सूबे शुमाल, हरयाणा, दिल्ली, आसाम, मध्य प्रदेश में जितने भी मुस्लिम अवाम के घरों को मिस्मार किया वोह पसतमंदा ही थे।  खरगोन की वोह बस्ती याद है जहाँ गरीब बेगुनाह मुस्लिम अवाम के घरों को सिर्फ एक फ़रेब के बल पर तोड़ दिया था की वोह संगबाज़ थे।  यहाँ तक की प्रधान मंत्री आवास योजना के तहत दोनों हाथों के मफ़लूज के घर और ज़ारिया ये रोज़गार को भी तोड़ डाला था। 

उन ज़ाफ़रानी सहाफियों पर क्या हिकमते अमली की जिन्होंने मुस्लिम अवाम की झूठी और फरेबी बातों पर नस्ल कूशी की और इज़्ज़ते नफ़्स की इज्तेमाई अस्मतदरी की है।  क्या उनको ऐसे ही आम माफ़ी नामा दे दिया जायेगा। 

हाल ही में ४ जनवरी २०२३ को दिल्ली में एक दारोग़ा को अनीश धर्म पाल ने चाकू से हमला कर के शदीद ज़ख़्मी कर दिया।  अब लंगूर और लँगूरनियों की टोली ने उस अनीश को अनीस बना दिया।  जब्कि पुलिस आफ.आए.आर. में शफ्फाफ़ज़ अलफ़ाज़ में नाम दर्ज है अनीश वल्द धर्म पाल सिंह।  फिर ४ रोज़ बाद जब वोह दारोग़ा हलाक हो गया तो मज़ीद अब उस अनीश नाम को मुहम्मद अनीस बना दिया।  साथ में जिहादी, क़ातिल, दरिंदा, आतंकवादी जैसे अलक़ाब मज़ीद लगा दिए गए जिससे मुस्लिम नस्ल की इज़्ज़ते नफ़्स की अस्मतदरी और क़त्ल किया जाए।  ऐसे अलक़ाब और ना ज़ेबा झूठे फरेबी खबर शाया करने में सिर्फ हिन्दू लंगूर ही मुलव्विस नहीं हैं बल्कि ग़द्दार सईद अंसारी जैसे मुनाफ़िक़ भी शामिल हैं।  उनको अपनी तन्खा और ज़िन्दगी का खौफ़ लगा रहता है।  अगर सही और दुरस्त खबर दिखाई तो हुकूमत कभी भी क़तल कर देगी।  या हादसे में जान चली जाएगी।  ज़न्खे

ग़ैरों से भी ज़्यादा तो क़ौम के उन रहबरों से शिकवा है जो हिन्दू अक्सरियत का माक़ूल जवाब फ़िज़ूल और बेबुनयाद फलसफों पर देतें हैं लेकिन तोहसीह या एक और तक़सीम पर ख़ौफ़ज़दा हो कर ख़ामोशी की हिकमत इख़्तेयार करतें हैं।  और दावा सिर्फ खुदा से डरने का करतें हैं। 

मुस्लिम अवाम कितना भी भारत के वफादार होने का सबूत दे लेकिन यह दर हक़ीक़ात है उनको कभी भी अक्सरियत अवाम ने इस मुल्क का नहीं तस्लीम किया।  आज मुस्लिम नुमाइंदगी तोसीह या एक और तक़सीम पर बात करने से गुरेज़ कर रही है ख़ौफ़ज़दा है या और कोई वुजूहात लेकिन आती मुस्लिम नस्लों तक को अपनी वफादारी साबित करते रहना पडेगा और अक्सरियत अवाम के हाथों ज़लील रुस्वा होते रहना पडेगा।  हर बार,  बार बार वही ज़लालत और वफादारी साबित करने के बजाये एक बार हो जाए १५ मिनिट में मसला ही ख़तम।  तोहसीह या तक़सीम।   

सहाफ़ी ज़ुबेर

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