हाकिम की थी मर्ज़ी की हो हमारी हिजरत
मालिक की मर्ज़ी थी
की हो ज़ालिम की रियाया बेघर
ग़फ़ूर बस्ती रहे सदा
सलामत
तुम करो अपनी ज़मीन
से हिजरत
चलने
लगी दरारें तुम्हारे घरों पर
बोहोत
शौक़ था तुमको की चलाएं हमारे ऊपर बिलडोज़र
किया
था ज़ुल्म हमको समझ पराया
हाकिम
की साजिश का शिकार हुई खुद उसकी रियाया
सहाफ़ी
ज़ुबेर
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