अज़ीज़ नाज़रीन,
मोदी
जी ने नक़ल की लेकिन अक़्ल नहीं लगाई और पाई रूस्वाई। उसने अक़्ल लगाई दिल की बात जुबां पर आयी हुई इज़्ज़त
अफ़ज़ाई।
मुंबई लो में आ गया।
नाज़रीन
हम जैसे फलसफे बाज़ों के नज़दीक अल्फ़ाज़ों की ही तो एहमियत है। मुंबई लो में आ गया, मतलब फतह हासिल कर के आया। में ज़िंदा लौट आया। मतलब मैदाने जंग से फरार हो कर पीठ दिखा कर भाग
कर लौट आया। दोनों में फ़र्क़ है। एक को आने नहीं दिया जा रहा था लेकिन अवाम लाखों
की तादात में सुनने को बेताब थी। पुलिस के
तमाम घेरे को भेदते हुए वोह पंहुचा, दुसरे को अवाम सुनने को नहीं थी तैयार, वोह मरकज़ी
तहफ़्फ़ुज़ अमले के साथ हो गया फरार।
मुंबई लो में आ गया।
अब
मरकज़ी नुमाइंदा ठहरा चिन्दी चोर, कुछ इधर से चुराया कुछ उधर से चुराया और बोल दिया
ग़ुलाम पालतू ज़ाफ़रानी लँगूरनियों के सामने।
उन्होंने भी खुशी खुशी चला दिया, में ज़िंदा लौट आया। जहाँ मुँह खोलना था वहां तो ख़ामोशी और चुप्पी इख़्तेयार
कर के आ गया और अब अपने मोहल्ले में पहुंच कर बड़ी बड़ी बातें कर रहे हो। मालूम है की अब यह मेरा इलाक़ा है कोई कुछ बोल नहीं
सकता। एक कहावत है अपनी गली में तो योगी आदित्यनाथ
भी गीदड़ की तरह भोंकने लगता है। लेकिन असली
शेर वोह जो दुश्मन के घर में घुसे और दुश्मन को चीर फाड़ डाले, उसके मेहफ़ूज़ क़िले की
दीवारों को तबाह कर दे, उसकी बुनयाद को हिला दे, उसके वजूद के लिए खतरा पैदा कर दे। उसको उस शेर का ख़ौफ़ पैदा हो जाए।
नाज़रीन
जहाँ जहाँ इस गीदड़ योगी आदित्यनाथ को इन्तेख़ाब के लिए ज़ाफ़रानी तंज़ीम ने भेजा वहां तंज़ीम
की कश्ती ग़र्क़ाब कर के आया है। केरला असेंबली
इन्तेख़ाब में बड़ी बड़ी बाते बोल कर आया था एक सीट थी वोह भी गयी। वही हालात तिलिंगाना असेम्ब्ली इन्तेख़ाब में हुए ज़हरीले बीज बौने की कोशिश की १ सीट पर महदूत हो गए. उसके बाद हैदराबाद बल्दिया में गया जहाँ जहाँ गीदड़
ने बोला वहां वहां ज़ाफ़रानी तंज़ीम के नुमाइंदे हारे। और सबसे बड़ी बात असदुद्दीन के जितने भी रकूने बल्दिया
थे सभी फतहयाब हुए, पुराने हैदराबाद से एक भी सीट भीक में भी नहीं मिली। बिहार, वेस्ट बंगाल सभी जगह वही हाल है। जहाँ जहाँ उस पनोती बाज़ गीदड़ आदित्यनाथ के मनहूस
क़दम पड़े की हो गया ज़ाफ़रानी तंज़ीम का सूपड़ा साफ़।
नाज़रीन
यह ज़ाफ़रानी नुमाइंदों की एक ख़ास पहचान है अगर मोदी जी की ख़ाकी चड्डी गलती से वाशिंग
मशीन में दुसरे कपड़ों का रंग ले ले तो सभी संघी अपनी तमाम ख़ाकी चड्डियाँ उसी रंग की
रंग देंगे उन बेवक़ूफ़ों को इतनी भी तमीज और सोचने की सलाहीयत नहीं की गलती से हो गया
होगा। जब नाम के आगे चौकीदार लगाया तब बड़े
बड़े डॉक्टर्स, इंजिनीर्स, सहाफी, बी टेक, ऍम टेक, साइंटिस्ट सभी ने अपने नामों के आगे
चौकीदार लगा लिया। क्या यह पड़े लिखे जाहिल
नहीं है। और क्या इनका अमल जहालत का मुज़ाहेरा
नहीं कर रहा है। अरे सामने वाला तालीमी आफ़ता
नहीं है उसने ख़ुद ही २०१३ में एक सहाफ़त इजलास में इस बात का एतेराफ किया है। फिर वोह काम भी अदना दर्जे का करता रहा है। लेकिन तुम तो तालीम लिए हो ज़हानत है तुम उसके पीछे
पीछे भेड़ बकरियों के जैसे कैसे चल पड़े।
नाज़रीन
अपनी बात एक कहानी से ख़तम करूँगा। किसी देश
में जानवरों का एक अजायबघर था, उसमे क़िस्म क़िस्म के जानवर थे, लेकिन एक ख़ास जानवर चिंपांज़ी
(बड़ा बन्दर या लंगूर) जो अवाम की तवज्जो का मरकज़ बना हुआ था उसकी खूब चर्चा थी। क्योंकि जैसा इंसान करता वैसा ही वोह भी करने लगता। एक रोज़ योगी आदित्यनाथ भी पंहुचा जानवरों को देखने। योगी उस चिंपांज़ी को देख का हसा तो चिंपांज़ी भी
हसने लगा, रोया तो वोह भी रोने लगा, फिर योगी ने नाक खुजाल दी, यह देख कर चिंपांज़ी
आया और योगी के हाथ पैर तोड़ दिए सर फोड़ दिया।
नौबत यह हो गयी की हॉस्पिटल में भर्ती करना पड़ा। तहक़ीक़ात हुई की गलती किस की थी चिंपांज़ी की या योगी
की। अजायबघर वालों ने पुछा ऐसा क्या हुआ जो
चिंपांज़ी इतना इश्तेआल हो गया। योगी बोला
मेने बस नाक खुजाल दी, उसपर अफसर बोले लंगूर की ज़ुबान में इसका मतलब होता है,
"तेरी माँ…………ले।
अब
योगी ने ठान ली की बदला तो लेना है, वोह जब ठीक हो गया फिर अजायबघर गया और इस बार अपने
ज़ाफ़रानी लुंगी में सामने एक गाजर रख कर और जेब में एक चाक़ू रख कर गया। और फिर वही बन्दर चाले करने का आगाज़ किया कभी उछल
कभी कूद कभी अपने को थप्पड़ मारना वैसा ही चिंपांज़ी भी करता रहा। फिर योगी ने अपनी ज़ाफ़रानी लुंगी उठाई और नीचे की
तरफ से सामने गाजर को खड़ी कर के कच कच कच गाजर को काट डाला। और चाक़ू चिंपांज़ी की जानिब फैक दिया। चिंपांज़ी ने पहले चाक़ू को देखा फिर योगी को देखा
फिर अपने नीचे और अपनी नाक खुजाल दी।
नाज़रीन
बताने का मक़सद यही है की एक लंगूर चिंपांज़ी को मालूम हैं की क्या सही है और क्या ग़लत। लेकिन इन अक़ल के अंधों को नहीं मालूम अगर इनके सामने
मोदी अपनी मसनूई गाजर खच खच खच काट कर चाक़ू भक्तों की जानिब फेंकेगे तो तमाम अपनी असली
गाजर को ही काट लेंगें। किस्सा अल मुक्तसर।
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