Friday, 21 January 2022

बेलौस मोहब्बत,

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज की कहानी का उन्वान अल्लाह की पैदा कर्दा उन तमाम मख़लूक़ से निस्बत रखती है जो किसी भी शै से उन हद तक मोहब्बत करतें हैं की ख़ुद बर्बाद हो जातें हैं उस शै की खुशी के लिए ख़ुद को क़ुर्बान कर डालतें हैं।  फिर भी इस क़ुर्बानी और बर्बादी में भी तस्कीन और इत्मीनान पातें हैं, क्योंकी जिस शै से उनको मोहब्बत थी उनकी बर्बादी और क़ुर्बानी में ही उसकी फलाह उरूज और ख़ुशी पोशीदा थी।  

नाज़रीन आज की कहानी का आग़ाज़ सब्ज़ दरख़्तों से होता है।  जो इंसानी समाज के लिए किसी  अज़ीम नेमत से कम नहीं हैं।  

किसी मुल्क में बेपनाह सब्ज़ दरख़्त और जंगलात का झुरमुठ हुआ करता था।  उस मुल्क की फलाह और ऊरूज का राज़ ही दरख़्त थे।  अवाम ताजिर उन दरख़्तों की ठंडी साया के नीचे बैठ कर आराम करता और सुकून पा कर फिर अपने सफर पर निकल जाता।  अब सब्ज़ दरख़्तों का चर्चा उस मुल्क से निकल कर बेरुन मुल्क पहुंच गयी, तमाम मुमालिक दरख़्तों की बातें करने लगे उनके बारे में क़सीदे कसने लगे उनको मेहफ़ूज़ करने के क़वानीन बनने लगे।  यह सब देख कर कुछ शर पसंद अनासिरों को बोहोत हसद हुई और उन्होंने दरख़तों को बर्बाद करने काटने की मंसूबा बंदी कर डाली।

जब सब्ज़ हरे भरे दरख़्तों को काटा गया तो क़ुदरत का वबाल आया और उस मुल्क में बेपनाह बाढ़ और तूफ़ान जैसी कुदरती आफ़ात आने लगी।  तमाम इंसानी बस्तियां तबाह होने लगी।  अवाम भूख और प्यास की शिद्दत से मारे जाने लगे।  सूरज की तपिश ऐसी की तमाम गुजिश्ता रिकॉर्ड तोड़ डाले।सूरज ढाई नेज़े पर आ पंहुचा और तपिश से इंसानों का बदन झुलसने लगा।  

इस गहमा गहमी में एक फरिश्ता मासूम बच्चा जिसके एहले ख़ाना इस कुदरती वबा और तबाही में फ़ौत हो चुके थे।  गर्मी की शिद्दत से बेहाल साये की तलाश कर रहा था।  तभी उसको एक दरख़्त दिखा और उसने बोला बच्चे मेरी साया में थोड़ी देर बैठ जा और सुकून पा।   

चुनाचे फ़रिश्ते नुमा बच्चे ने ऐसा ही किया और वोह दरख़्त की साया के नीचे सो गया और सुकून पाया।   अब फरिश्ता नुमा बच्चा दरख़्त की ख़िदमत करने लगा जहाँ तक उस दरख़्त की साया थी उस हिस्से को साफ़ किया और उस दरख़्त की जड़ों में पानी डाल कर उसको तक़वियत फ़रहाम की। अब हर रोज़ सुबह बच्चा दरख़्त की साया के नीचे ख़ूब खेल कूद करता और शाम को घर लौट जाता।  एक लगाव एक मोहब्बत सी उस बच्चे को दरख़्त से होने लगी थी।   धीर धीरे बच्चा अपने बचपने को छोड़ कर जवानी की देहलीज पर क़दम रखने लगा। 

एक रोज़ उस नौजवान को भूख लगी और उसने दरख़्त की साया के नीचे बैठ कर बोला मुझे बोहोत भूख लग रही है मेरे पास पैसे भी नहीं हैं की कुछ खा लूँ।  दरख़्त ने अपनी टहनियां नीचे की जानिब झुका कर उस नौजवान से बोला लो मेरे फल खा लो और उनको तोड़ कर बाजार में फ़रोख़्त कर अपनी हाजत पूरी करो। 

चुनाचे उस नौजवान ने ऐसा ही किया और दरख़्त के फल से अपनी भूख मिटाई और सुकून पाया और उनको फ़रोख़्त कर के पैसे कमाए।   मज़ीद नौजवान को जिन्सी ख़्वाहिशात का एहसास होने लगा।  क्योंकि अब मासूम फरिश्ता नुमा बच्चा जवान हो चला था।  वोह दरख़्त की साया के नीचे उदास बैठा था और बोला मेरे को एक ख़ातून से इश्क़ हो गया है।  में उससे शादी करना चाहता हूँ लेकिन मेरे पास घर नहीं है।  दरख़्त ने कहा मेरी टहनियां और तना काट लो और उसका घर बनाओ और अपनी ज़रूरियात पूरी करो।  चुनाचे उस नौजावन ने उस दरख़्त की टहनियां और तना काट डाला और घर बनाया।  अपनी माशूक़ से शादी की बच्चे पैदा हुए।  

अब वोह नौजावन बूढ़ा हो गया था उसके तमाम बच्चे बड़े बड़े ओहदे पर फ़ाइज़ हो कर घर छोड़ कर चले गए थे।  उसकी एहलिया जिसके लिए उसने दरख़्त को काट डाला था वोह फ़ौत हो चुकी थी।  बूढ़ा शख़्स तनहे तनहा रह गया था, मौसम ने भी अपना मिज़ाज बदला और ख़ूब सर्द मौसम आया, सर्द हवा ऐसी की रगो में दौड़ता हुआ खून जमा दे।  बूढ़ा आदमी मायूस हो चूका था वोह अपने तमाम एहले ख़ाना या तो खो चूका था या कुछ उसे छोड़ कर बेहतर मुस्तक़बिल के लिए दूर चले गए थे।  बूढ़ा मायूस सर्द हवा से बचने के लिए उसी जगह पहुंचा जहाँ कभी गर्मियों में दरख़्त की ठंडी हवा उसको सुकून फ़रहाम करती थी।  उसका बचपन, जवानी और तिजारत उस ही दरख़्त के ज़ेरे साये परवान चढ़ी थी। 

लेकिन अब उस जगह दरख़्त नहीं था वोह पहले ही उस नौजावन ने अपना घर बनाने के लिए काट डाला था।  अब वहां दरख़्त के नाम पर महज़ एक ढूंठ ही बचा था।  बूढ़ा आदमी मायूस सर्द हवाओं से परेशान बैठा था की ठूँठ ने कहा ये बूढ़े शख़्स मेरे ठूँठ को तोड़ो आग जलाओ और अपने आपको सर्दी से मेहफ़ूज़ करो।  चुनाचे बूढ़े आदमी ने ऐसा ही किया और आग लगा कर अपनी हाजत पूरी की।

अब दरख़्त का जो आख़िर हिस्सा बचा था उसको भी उस इंसान ने काट डाला और अपनी हाजत पूरी की।   अब वहां ना तो दरख़्त बचा था और ना ही उसका कुछ नामो निशान।   लेकिन जड़ों से फिर एक नई शाख़ नमूदार होती है और फिर से वोह दरख़्त बनता है किसी और इंसान की हाजत रवाई के लिए फिर से नई इबारत लिखता है। 

कहानी का सार इस बात की तस्दीक़ करता है की दरख़्त इंसानी वजूद में कितना अहम किरदार अदा करतें हैं।  और दरख़्त बेलौस मोहब्बत करतें हैं।  अपना सब कुछ इंसान के लिए क़ुर्बान कर के भी उनको किसी से कोई गिला और शिकवा नहीं होता है।  हर इंसान की हाजत के लिए सदा दरख़्त ही काम आतें हैं।   

लेकिन अब यह इंसानों की उस बस्ती को सोचना है अगर दरख़्त ही नहीं होंगे तो उनकी हाजत रवाई कौन करेगा।  दरख़्त इंसान की ज़िन्दगी में अहम किरदार अदा करतें हैं।


सहाफी ज़ुबेर 

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