नूर
से मामूर सीना, मुश्क़ से बेहतर पसीना, देख लें हम सब मदीना …….
अज़ीज़
नाज़रीन,
जिस इस्लाम की ख़ुश्बू को फैलने से रोकने के लिए यहूद और ज़ाफ़रानी नबी सल्लम के उसवाये हसना को झूट और फरेबी हिकमत इख़्तेयार कर के अहले नास के दिलों दिमाग़ में वस्वसा डालतें हैं, लेकिन हर बार अपनी गन्दी सोच भारत और यहूद की सरज़मीन से उठने वाले गलीज़ धुँवे को अल्लाह के फ़रिश्ते वही पर ज़िबह कर डालतें हैं जहाँ से वोह गंदगी उठी थी। इस्लाम एक इंक़लाब है जो आ कर रहेगा। सुबह का सूरज अपनी सिम्त बदल सकता है लेकिन हिन्द में और तमाम आलम में इस्लाम का परचम बुलंद होने से शैतान तो क्या दुनियाँ की कोई ताक़त नहीं रोक सकती। जो होना है वोह तो हो कर रहेगा।
इस ज़िम्न में इस सहाफी ने अप्रैल २०१९ में उर्दू में “इन्क़लाब ज़िंदाबाद” और “मशाअल्लाह शुरू हो गई इन्क़लाब की जंग” उन्वान से दो नज़में लिखे हैं।
नाज़रीन
इस्लाम और उस पर अमल करने वालों के ख़िलाफ़ चाहे तमाम आलम की ताक़तें बदगुमानी फैलायें,
उनके इस्लामिक लिबास, चेहरे और रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी का मज़ाक़ बनाएं लेकिन जिस के पास
वोह हक़ीक़ी ख़ुश्बू पहुंच गई फिर वोह उसको इख़्तेयार करने से नहीं रुकता। चाहे तमाम आलम उसके ख़िलाफ़ हो जाए, कियोंके वोह शख्स
अब उस मोहब्बत और उस ख़ुश्बू के एहसास को महसूस कर चूका है। जहाँ एक जानिब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की हुकूमत
की तमाम आलम में तनक़ीद करने वालों की कमी नहीं देखी जाती है वहीँ दूसरी जानिब तालिबान
के इस्लामी ऊसूल और नबी सल्लम के उस्वाये हसना इन्साफ पसंदी को देखते हुए लोग उस हुकूमत
से मुत्तासिर हुए बिना नहीं रह सक रहे हैं।
एक अमेरिकी आला ओहदेदार ने तालिबान से मुतास्सिर हो कर इस्लाम क़ुबुल कर लिया
है। तालिबान हुकूमती ख़बरनामे ने इत्तेला देते
हुए बताया की एक अमेरिकी शहरी ने तालिबानी तर्जुमान ज़बीउल्लाह मुजाहिद की मौजूदगी में
इस्लाम मज़हब इख़्तेयार कर लिया है।
उस अमेरिकी शहरी का नाम क़ब्ल अज़ इस्लाम क्रिस्टोफर था, जिनको इस्लाम में आने के बाद मोहम्मद ईसा नाम दिया गया है। ईसा ने बताया की वोह कई सालों से अफ़ग़ानिस्तान में रह रहें हैं। और उन्होंने तालिबान को बोहोत नज़दीक से देखा और उनकी अख़लाक़ीयात से मुत्तासिर हो कर इस्लाम मज़हब अपनाया है।
ज़बीउल्लाह
मुजाहिद ने उनको शहादा पढ़ाया और उनको इस्लाम में दाख़िल किया। एक्सप्रेस ट्रिब्यूनल
की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ जब उन्होंने शहादा पड़ा और उनका नाम मुहम्मद ईसा दिया गया
तब उनकी चश्मे अश्कों से नम थे और वोह फुट फुट कर अपने गुजिश्ता गुनाहों पर मालिके
हक़ीक़ी के सामने रो पड़े।
नाज़रीन यह पहला वाक़िया नहीं है जब इस्लाम और उस पर अमल करने वालों के किरदार को देख कर उनसे मुनसलिक अवाम दाख़िले इस्लाम हुए। १५ अगस्त २०२१ को जब अफ़ग़ानिस्तान २० साल की ज़ाफ़रानी दहशत की गुलामी से आज़ाद हुआ था तब एक ब्रतानियाँ की ख़ातून सहाफ़ी की आप बीती भी खूब मीडिया की सुर्खियां बनी थी, और सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। उन्होंने अल ऐलानियाँ इस्लाम क़ुबूल किया था और एक सहाफ़ी इजलास में बताया था की उन्होंने तालिबान के मस्तूरातों के साथ हुस्ने सलूक और उनकी इज़्ज़त को देखते हुए इस्लाम क़ुबूल किया है।
जो
एक ग़ैर मेहरम की जानिब पूरी आखों से देखते भी नहीं थे। में तो उनकी क़ैद में थी जो चाहे कर सकते थे लेकिन
में जब तक उसकी क़ैद में रही हर वक़्त ख़ातून ही मेरी किफ़ालत को आती थी कोई मर्द ना आता
था। मेरी इज़्ज़त और जान तालिबान की क़ैद में
भी मेहफ़ूज़ रही।
तो खड़े हो फ़ौरन अदब से उठ के मोहम्मद आये मोहम्मद आये.........
Zuber
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