Saturday, 1 January 2022

हिन्द में कोहराम के साथ नए साल का आगाज़।

अज़ीज़ नाज़रीन

भारत ने अपना हर साल के आगाज़ पर कुछ अपशकुन या अनहोनी के रिकॉर्ड को बरक़रार रखा है।  और यह नाहीली, बदबख़्ती और मनहूसियत हुकूमत के फाराइज़ को अंजाम देने वाले उस हाकिम की है जो अपने आपको ख़ुदा तस्सव्वुर करने लग गया है।  और भूल गया की जिस नापाक इल्म के ऊपर वोह और उसके कारिंदे पोगातें हैं उस नापाक इल्म को दो अलफ़ाज़ तीन मिनिट में तबाह कर सकतें हैं बर्बाद कर सकतें हैं काट सकतें हैं उसी जानिब दो गुनी ताक़त से पलटा सकतें हैं जहाँ से वोह इल्म इंसानियत को ख़त्म करने के लिए किया जा रहा था।

नाज़रीन जम्मू कश्मीर के वैष्णो देवी मंदिर में रात २ बजे के क़रीब ज़बरदस्त इन्तेशार फ़ैल गया और इस अफरा तफरी में अभी तक तक़रीबन १२ अफ़राद जाहांबाक हो गए हैं।  जबकी २४ क़रीब ज़ख़्मी बताये गए हैं।  जिनमे से ११ शदीद ज़ख़्मी हैं। 

नाज़रीन एक बात वाज़े रहे और ज़हन नशीन कर लें की मोदी हो या योगी या और कोई शैतानी आमालियात का मर्कज़ जब तक अहले हक़ में एक भी ईमान वाला मौजूद है यह ज़ालिम क़ातिल दरिंदे किसी भी हक़ पसंद इंसान का बाल भी बीका नहीं कर सकते।   २०१९ से हर साल का आगाज़ एहतेजाज से होता था।  उससे क़ब्ल नए साल का आगाज़ जम्मू कश्मीर की आज़ादी के दीफ़ाई फ़ौजिओं के हमलों से होता था।  इस साल मोदी ने बोहोत कोशिश की कोई भी अनहोनी ना होने पाए।  तमाम हिन्द के मुस्तक़बिल के लिए मंदिरों मंदिर मारा फिरा, हर अफ़राद से गुफ्तगू ताके कोई भी अनहोनी ना होने पाए।इतना सब किया लेकिन अपनी हठधर्मी को बंद नहीं किया।  और जो शिद्दत पंसदों, दहशतगर्दों ने धर्म संसद में क़सम मोहीम का आगाज़ किया था उसके ऊपर ना तो एक लफ्ज़ बोला और ना ही उन दहशतगर्दों और उनकी दिल जोई करने वाली उस ज़ाफ़रानी तवाइफ़ को गिरफ्तार किया।  तुम फरेब फ़ैलाओगें, मीठी मीठी बातें करोगे और अपने दिलों में गंदगी रखोगे तो मालिके कायनात तो सब कुछ देख रहा है और जो तुम्हारे साथ नए साल के आगाज़ में होना है वोह तो हो कर रहेगा।  अब भुगतो तमाम साल तुम्हारे अपनों कीआमवात, लाशें, हादसे, तूफ़ान, बारिश, क़ेहर इलाही से।  इसमें में ख़ूब ज़ाफ़रानी मकान, महल, कोठीयां और दिगार आशियात भी टूटेगें। 

हरिद्वार में ज़ालिमों ने जंग का आगाज़ किया था और नस्लें ख़त्म करने की क़सम खाई थी।  बेवक़ूफ़ हैं, अरे जिन मुसलमानों की नस्ल को अबू जेहल जैसा ज़ालिम दरिंदा ख़तम नहीं कर पाया, जिन मुसलमानों की नस्ल को जादू का मर्कज़ और अज़ीम जादू के जानकार यहूद ख़त्म नहीं कर पाए, जिन मुसलमानों की नस्ल को तुम्हारे आबो अजदाद पृथ्वी राज चौहान, राणा प्रताप ख़तम नहीं कर पाए उन मुसलमानों की नस्ल को क्या तुम आज के छोकरे ख़त्म कर सकोगे।   हम किसी को छेड़ते नहीं हैं, और जो हमको छेड़े तो उसको छोड़तें भी नहीं हैं। 

यहीं ग़फ़लत और ग़लती २०१९ में ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर और लँगूरनियों ने की थी मोदी का उनके ऊपर इतना हव्वा हो गया था की इन्तेख़ाब को जंग का नाम दे दिया।   मक़सद उनका मुसलमानों को ख़ौफ़ज़दा करना था।  जबकी वोह इन्तेख़ाब ना तो मुस्लिम बमुक़ाबिल ज़ाफ़रानी हो रहे थे और ना ही किसी भी तंज़ीम की क़ियादत कोई मुस्लिम कर रहा था।   अगर मुख़ालेफ़ीन थे तो वोह सभी हिन्दू ही थे, राहुल, मुलायम-अकलेश, ममता, लालू फिर उस इन्तेख़ाब को धर्म युध्द का नाम कैसे दिया जा सकता था।

लेकिन जिस तरह की ज़हर अंगेशी और टीवी की ख़बरनामों को जंग का मैदान बताना, फिर पूरे फौजी लिबास में हथियारों के साथ एक जानिब मोदी आता है और दूसरी जानिब राहुल।  जब नतीजे का दिन था तब जब भी कोई मुख़ालिफ़ बीजेपी से हारता तब क्या बोला जाता की देखिये एक और दुश्मन का फौजी मारा गाया, किसी हल्क़े पर बीजेपी की जीत को बोला जाता फलां क़िला भी बीजेपी ने फतह किया।  लँगूरनियों ख़ास अंजना और स्वेता की उस भड़काऊ बयान बाज़ी पर आशुतोष ने नाराज़गी भी दर्ज करवाई थी।  वोह बोले की आप कैसे दुश्मन बोल सकती हैं और इस इन्तेख़ाब को जंग का नाम दे सकती हैं।  सभी भारतीय हैं जो हार गया वोह भी भारतीय था तो उसको आप कैसे दुश्मन बोल कर उसकी तोहीन कर रहीं हैं।  

लेकिन नाज़रीन इन लंगूर और लँगूरनियों का मुसलमानों की जानिब इशारा था और इनको जंग भी मुस्लिम अवाम से लेनी थी।  सो हमने भी पूरी तैयारी कर ली और आ गए मैदान में। फिर २०२० से हुआ जंग का आगाज़ और करोना में भारत में ७ लाख के क़रीब अफ़राद जहां बाक़ हुए सिवाए हादसात, कुदरती आफ़ात खुद्कशी में जो मारे गए वोह अलग। 

वही ग़लती इन धर्म संसद वालों ने की है इनको भी इनके शैतानी अमलियात पर बोहोत ही ग़ुरूर हो गया था जैसा लंगूरों की चूनौती मंज़ूर की थी वैसे ही इन ज़ालिम दरिदों शैतानों की चूनौती मंज़ूर की है।  हम २०१९ के उस इन्तेख़ाब के बाद से ही जंग में हैं और जब तक काफिर शिद्दत पसंद अपनी हार तस्लीम नहीं करते माफ़ी नहीं मांगते हाकिमियत के फाराइज़ किसी मुस्लिम नुमाइंदे के हाथ में नहीं देतें तब तक जंग चालू रहेगी।  जैसा की माज़ी में कहा जा चूका है मुस्लिम नुमाइंदों का नाम भी दिया जा चूका है।  पहली पसंद असदुद्दीन दूसरी आज़म खान तीसरी अकबरुद्दीन। 

जब जंग कर के थक जाओ और तुम्हारा हर बातिल तबाह कर दिया जाए हक़ के सिपाही तुम्हारी गर्दन पर फांसी का फंदा बाँधने लगें तब माफ़ी मांगने का कोई  फायदा नहीं।  तब तक तो जो फैसला मालिके कायनात ने करना था हो गया होगा।  जब फ़िरों तीनों जानिब पानी से घिरा और अपनी मौत को नज़दीक आते देखा तब रोया मूसा में तुम्हारे रब पर ईमान लाता हूँ में मुसलमान होता हूँ लेकिन तब तक देर को चुकी थी।  मूसा अलैहे सलाम बोले अब लाता है जब मौत तेरे नज़दीक आ चुकी है अब तेरा जिस्म आती दुनियां के लिए इबरत होगा, और अवाम तुझको देखेगा और उससे इबरत लेगा। 

Zuber

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