अज़ीज़ नाज़रीन,
जिस हिसाब से संघी दहशत, ज़ाफ़रानी महाज़ के शिद्दत पसंद हिन्दू और बीजेपी ने वतन भारत का नाम वाहियात, इंसानी हुक़ूक़ की खिलाफ़वर्ज़ी और हराम ख़ोरी (ज़िना बिल जब्र, गिरहो गर्दाना ज़िना) जैसे अमलों से रोशन किया है उसी ज़िम्न ने स्मगलिंग जैसे अमल भी भारत के मुँह पर ज़ोरदार तमाचा रसीद करतें हैं। इन तमाम वाहियात अमलों में ना सिर्फ संघी दहशतगर्द शामिल हैं बल्कि भारत की हुकूमत के वज़ीरों और फौज के सरबराहों के नाम भी आना शुरू हो गए हैं। वज़ीरे आज़म से ले कर वज़ीरे दाख़ला और फौज के चीफ तक इंसानी हुक़ूक़ की खिलाफ़वर्ज़ी और नस्ल कुशी जैसे आलमी जुर्म में शामिल होने के सबूत मिले हैं।
अज़ीज़
नाज़रीन इंसानी हुक़ूक़ की खिलाफ़वर्ज़ी के बाद तमाम जराइमों में स्मगलिंग भारत में होने
वाला दूसरा सबसे बड़ा जुर्म है। इस ज़िम्न
में तिलिंगाना के कस्टम डिपार्टमेंट के आला
ओहदेदारों ने हैदराबाद आलमी फ़िज़ाई अड्डे पर दुबाई से लौटे एक शख़्स के पास से २७१५.८००
किलोग्राम सोना ज़प्त किया है। जिसकी तिजारती
क़ीमत १.४० तक़रीबन २00 करोड़ के क़रीब बताई गई है।
ख़बर
के हिसाब से २१ जनवरी देर शाम हैदराबाद आलमी फ़िज़ाई अड्डे पर एक शख़्स ने अपने सामान
के साथ २ किलो से ज़्यादा सोने की चेन और सोने के पत्ते मेहफ़ूज़ कर के लाया था। जिसकी भनक कस्टम डिपार्टमेंट को मिली थी, उस शख़्स
के सामान की तफ्तीश दौरान यह आशियात बरामद की गयी। उसके बिल और माक़ूल हिसाब ना दे पाने के सबब उसको
हिरासत में ले कर मज़ीद तफ्तीश का आगाज़ कर दिया है।
नाज़रीन
वैसे जितने भी ज़ाफ़रानी हैं मोदी के इशारे पर और हूकूमते हिन्द की मिली भगत से सोने
की स्मगलिंग अमीर मुस्लिम मुल्क पाकिस्तान, दुबाई, ओमान और दीगर ख़लीज मुमालिकों से
करतें हैं। दुबाई में भारत का वोह ज़ाफ़रानी
कांसुलेट जनरल जिसको लीगल इम्युनिटी हासिल थी और अरबों खरबों रूपये के सोने की तस्करी
में शामिल था। फिर बवगतु रघुराम शेट्टी
उर्फ़ बी.आर. उडीपी केसा पकड़ा गया जिसके साथ मोदी के सांठ गाँठ के सबूत आलमी अदालत और तमाम ख़लीज मुमालिकों को पहले ही इस सहाफ़ी
की जानिब से फ़राहम किये जा चुके हैं। भटकल
का नाम सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम अक्सरियत की वजह से मुत्तासिब और ज़ाफ़रानी ज़ेहनियत के
ख़ाकी दहशतगर्दों ने बदनाम किया था। अब हिन्दू
अक्सरियत उडीपी के बारे में ऐसा क्यों नहीं करते जैसा भटकल के बारे में किया था। इस बी.आर.
उडीपी ने तो आलमी हल्क़े पर अपनी वालेदा की पूगी बजा दी। वालेदा मतलब
जी भारत।
हालाते हाजरा पर सहाफ़ी जुबेर का तब्सिरा।
उस
शातिर स्मग्गलर का नाम और ज़ात उसकी शिनाख़्त और किसी ख़ास तंज़ीम या संघ से ताल्लुक़ात
को जिस हिसाब से कस्टम ने मेहफ़ूज़ रखा है और ना तो सहाफियों को उसकी मज़ीद जानकारी दी
और ना ही अवाम के रू बारू आम किया है; उससे गुमान यह लगाया जा रहा है की वोह भारत में मौजूद
ज़रूर ही किसी ख़ास तंज़ीम और संघ से ताल्लुक़ रखने वाला डाकू होगा।
नाज़रीन
आप लोगों की इत्तेला और जानकारी के लिए बताता चलूँ की हैदराबाद १९९२-९३ तक सख़्त मुत्तासिब
और फ़िर्क़ावाराना ज़हर की ख़ेती के सबब तबाह और बर्बाद हो चूका था। हैदराबाद में आज़ाद भारत का पहला हुकूमती दहशतगर्द
वल्लभ पटेल का भारत की क़यादत में भारतीय दहशत फ़ोर्स का हमला भी हुआ था। पहली दहशतगर्द तंज़ीम संघ का मरकज़ी दफ्तर (हेडक्वार्टर)
भी हैदराबाद ही था। लेकिन फिर दो शेरों ने
हैदराबाद को अमन और फलाह के रास्ते पर ले जाने का बीड़ा उठाया। और तमाम ज़हरीले जानवरों
को और ख़ेती को तबाह कर दिया। नाज़रीन आपके
इल्म में इज़ाफ़े के लिए बताता चलूँ की जिस तरह आज़ाद भारत के पहले हूकूमती दहशतगर्द वल्लभ
पटेल ने हैदराबाद को ज़हरीले ज़ेहनियत के चलते तबाही मचाई थी इन दो शेरों की तबाही से
ना तो अवाम मुत्तासिर हुआ और ना ही गंगा जमुनी तहज़ीब और ना ही हैदराबाद की तहज़ीब और
तमद्दुन पर कोई आंच आई।
जो
ज़हरीले कीड़े हैदराबाद का नाम तब्दील करने की फ़िराक में थे उनका खुद का नक़्शा तब्दील
हो गया। ख़ुद हैदराबाद के हिन्दू और तमाम अक्सरियत
अवाम ने पुर ज़ोर तरीक़े से मुख़ालेफ़त की और उस ज़हर को फिर से हैदराबाद की पुर अमन फ़िज़ा
में घुसने की इजाज़त नहीं दी जिस निज़ाम को अल्लाह के वली सिफ़त नुमाइंदों ने हक़ के परचम
तले चलाने का बीड़ा उठाया है।
आज
की ताज़ा सूरते हाल यह है की तमाम अमन पसंद अवाम इस शहर हैदराबाद में अमन और सुकून से
रह रहें हैं। नहीं तो यह वही हैदराबाद है जो
दंगों, फसाद, फ़िरक़ावारना ज़ेहनियत के चलते जहन्नुम से ज़्यादा अज़ीयतनाक हो चला था। और इस अज़ीयत में ना सिर्फ मुस्लिम अवाम जल रहे थे
बल्कि हर वोह शख्स उस शिद्दत और तकलीफ को महसूस कर सकता था जो अमन का हामी और पैरोकार
था। क्योंकि अगर फ़िज़ा शहर या सूबे की खराब
होगी तो उसका ख़मयाज़ा सिर्फ और सिर्फ एक जमात को नहीं भोगना पड़ेगा बरक्स उसका कफ़्फ़ारा
या पेनल्टी तो मौजूद तमाम अवाम को देना होगा।
जैसा सूबे शुमाल में ज़हर बोया जा रहा है और काम के नाम पर सिफर वैसा ही ज़हर
किसी ज़माने में हैदराबाद में बोया जाता था।
वहां पर भी हर मस्जिद को तोड़ कर मंदिर तामीर की बातें की जाती थी लेकिन अवाम
के फलाही काम पर जब बात होती तो भाग खड़े होते।
लंगूरों ने वहां पर भी घुसने की कोशिश की लेकिन आज एक लंगूर मौजूद नहीं है सभी
को हलाक कर दिया गया। अब जो बचे हैं तो वोह
हक़ पसंद अभिसार, साक्षी, संदीप, रविश या प्रज्ञा जैसे अमन पसंद या हक़ के परचम के अलमबरदार सहाफ़ी
हैं।
नाज़रीन मादी आशियात की स्मगलिंग के बारे में तो आप सुन ही चुके होंगे। गुजरात का वोह ग़द्दार अडानी का बंदरगाह। फिर कैसे तमाम ज़ाफ़रानी हुकूमत और उसके ग़ुलाम लंगूर लँगूरनियाँ भारत की अज़मत को ताख़ में रख कर खामोश हो गए। अगर कोई बोला तो वही ग़द्दार सहाफ़ी अभिसार शर्मा, प्रज्ञा मिश्रा, रविश या साक्षी जोशी जैसे ही बोले। लेकिन वतन के वफादार लंगूर और लँगूरनियाँ बड़े बड़े चिपां ज़ी चिपां Zee तो पूरी तरह खामोश हो गए थे। और देश के ग़द्दारों को गोली मारो सालों को स्लोगन देने वाले वज़ीर तो ठण्ड में चले गए थे।
Zuber
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