Sunday, 2 January 2022

धर्म संसद की फ़ज़ीहत ना करते आया ना भागते।

अज़ीज़ नाज़रीन,

शुरू हुई हिन्दू दहशत की फ़ज़ीहत, अब क्या करेगा ज़न्खा समाज यती, वसीम, काली और उनकी बांदी ज़ाफ़रानी ख़ातून, जब मुस्लिम अवाम के दानिशवरों, मौलानाओं की जमात ने खुद एतमादी से क़तल होने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की है। 

शुरू हो गई आतिश, बैदार हुआ आदिल।   धर्म संसद में जो फैसला हुआ था की हमें ज़्यादा हिन्दू नोजवान नहीं चाहिए सिर्फ १०० गए इस जंग में जो एक एक हिन्दू  २- लाख मुसलमानों का क़त्ले आम करेगा और अज़्म करेगा की हम २० लाख मुस्लिम अवाम का क़त्ल करेंगें और इनकी नस्ल को ख़त्म करेगें तो हमारी जंग कामयाब है।  तभी इनकी नस्ले ख़त्म होंगी।  अब उनके इस धर्म संसद के फैसले पर मुस्लिम अवाम भी बढ़ चढ़ कर लब्बैक बोल कर अपने मज़हबी पेशवाओं की क़यादत में क़त्ल होने को घरों से निकल पड़ें हैं।   हिन्दू दहशत के गंजे नाग ने सर उठाते ही उसके ऊपर ओले पड़ना शुरू हो गए।   इससे क़ब्ल एक और मुस्लिम दानिश्वर और मुफ़्ती साहब ने इस यती के चेलेंज को क़ुबूल करते हुए इसको मुबाहिसे की दवात दी थी, जब इसने रसूले अरबी की शाने अक़दस में ग़ुस्ताख़ी की थी और क़ुरान की अज़मत को ललकारा था।  लेकिन यह भगोड़ा भाग खड़ा हुआ था।  

इस बार बरलवी शरीफ के सज्जादा और जानशीन मौलाना तौक़ीर रज़ा ने इस यती और तमाम हिन्दू दहशतगर्दों,  हुकूमत के नुमाइंदों, पेरा  मिलिटरी फोर्सेज सभी को मदू किया है की आएं और हमारा क़त्ले आम करें।   इस क़त्ले आम का आगाज़ जनवरी बरोज़ जुमा बाद नमाज़ होगा।   जिसमे पहली खेप २० हज़ार मुसलमानों ने अपनी जानों का नज़राना इन ख़ून के प्यासे रावणों को देने का फैसला किया है।  और यह क़त्ले आम यहीं नहीं रुकेगा हर जुमे को यह तादात बढ़ती जाएगी।  जब तक यह शिद्दत पसंद ज़ाफ़रानी क़तल करते करते थक नहीं जाते और बस नहीं करते मुस्लिम अवाम अपनी जानों का नज़राना पेश करता रहेगा।  अब देखना यही होगा की हिन्दू शिद्दत पसंद क़तल करते करते थक जाते हैं या मुस्लिम अपनी जानों का नज़राना देते देते थक जातें हैं।  जनखा कौन साबित होता है ज़ाफ़रानी या मुसलमानी।   

एक दम सही जा रहें हैं मुस्लिम मौलानाओं की जामात।   दर असल यह क़ुरान की तालीम और नबी सल्लम का दर्स है जिसकी वजह से हर महाज़ पर यह दहशतगर्द ज़लील और रुसवा हो रहें हैं।   जी हां नाज़रीन यह वही क़ुरान है जिसकी अज़मत यती जैसे ज़ालिम कम करतें हैं और यह तालीम उन्ही नबी की है जिनकी शान में ग़ुस्ताख़ी कर के हर शिद्दत पसंद तस्कीन पाता है।  अभी तो बोहोत से मरहलों पर इन शिद्दत पसंद ज़ाफ़रानियों को हार का मुँह देखना पडेगा।   आज १४०० साल बाद उस नबी की तालीम का वोह आलम है की दुश्मन चारों ख़ाने चित हो गया तो सोचों अगर यह शिद्दत पसंद १४०० साल पहले होते और उन नबी का दीदार अपनी आँखों से कर लेते तो उनके होश फ़ाख्ता हो जाते।  आपके अंदर सिफ़त ही इतनी थी आपका जिस्म सर से पैर तक सरापा नूर ही नूर था।  ऐसा गुमान होता था मानों सफेद चादर में लिपटा हुआ कोई नूर हो।   आपके दस्ते मुबारक यदे बैज़ा की चमक को फीका करते हुए।   आपका हर अमल सुबह सादिक़ से ले कर तो ग़ुरूब आफताब तक मोज़ेज़ा था। बोलना, चलना, खाना, मुस्कुराना, अल्लाह से इश्क़, तिजारत, इबादत, अज़वाज से मोहब्बत हर अमल एक मोज़ेज़ा था।

यही अमल सुलह हुदैबिया के दौरान नबी सल्लम ने यहूद मक्का से किया था,  जबकि उस वक़्त मुसलमान काफ़ी अच्छी हैसियत में थे चाहते तो जंग कर सकते थे।  लेकिन बड़ी तादात में ख़ून रेज़ी, इंसानी अमवात और तबाही को रोकने के लिए सुलह हुदैबिया किया गया।   लेकिन आज मक्का का क्या आलम है।   नबी की तालीम पर अमल करते हुए कोई भी शख़्स ख़्वाहा मुस्लिम या ग़ैर मुस्लिम रुसवा या ज़लील हो ही नहीं सकता।  क्योंकि नबी सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं भेजे गए थे बल्कि वह तो आलमे  इंसानियत के लिए तशरीफ़ लाये थे।  और उनको रेहमतुल लील आलामीन बोला गया।  फिर उनकी बताई हुई तालीम पर जो अमल करेगा वोह कैसे रुसवा हो सकता है।  रुसवा और ज़लील दुश्मन ही होगा।      

अब आगाज़ होगा इन धर्म संसादियों के हिम्मत और इम्तेहान का, या तो करो या मरो, तीसरा इख़्तियार (विकल्प) मौजूद ही नहीं है इनके आक़ा के जैसा भागने का फरारी, भगोड़ा।   अगर हिम्मत पस्त हो जाए और हाथ पैर धूजने लगें कांपने लगें तो माफ़ी मांग लेना और तस्लीम करना की तुम लोग निहायत ही कमज़ोर लोग हो जो सिर्फ और सिर्फ विकास पैदा करने के लिए मुस्लिमानों के नाम का सहारा लेते हो।  दर असल तुम लोग तो होहिजड़े”।   

आज के बाद किसी भी मुस्लिम के रास्ते में आने की हिम्मत मत करना।    


Zuber

No comments:

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...