अज़ीज़
नाज़रीन,
जिस बात का ज़िक्र यह सहाफी हर वक़्त मन्ज़रे आम पर करता है फिर वही होता है। हालात तो वैसे ही हो रहे है जिसको २०१९ में "का" और एन आर सी के वक़्त कही थी अभी इन पुलिस वालों और शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम को मुस्लिम दिख रहें हैं लेकिन आगे यह लोग हिन्दू अवाम को भी हलाक करने से गुरेज़ नहीं करेगें। जो भी इक़्तेदार में बैठे ज़ाफ़रानी हाकिमों से सवाल करेगा या अपना हक़ मागेगा वोह इनका दुश्मन होगा और वही हो रहा है।
नाज़रीन
जामियां मिलिया इस्लामियां और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जिन बेगुनाह तालिबे इल्मों
पर ख़ाकी दहशत टूटी थी अब वही हालात हिन्दू
तालिबे इल्मों के साथ हुए हैं। अल्लाहाबाद
में हॉस्टल के अंदर घूस के पुलिस ने जो दहशत मचाई है वोह देखते ही बनती थी।
पुलिस
ने जिस बेदर्दी से मुस्लिम तालिबे इल्मों को सिर्फ और सिर्फ उनके मज़हब और हुकूमत से
सवाल करने के जुर्म में मारा था वही रवय्या अल्लाहाबाद में पुलिस का हिन्दू तालिबे
इल्मों के ख़िलाफ़ देखने को मिला। पुलिस के अमल
और इन्तेज़ामियाँ का तालिबे इल्मों के ऊपर बेदर्दाना लाठी चार्ज इस बात का सबूत है की
हुकूमत में बैठे ज़ाफ़रानी ज़हन ना मज़हब देखते हैं और ना ही अवाम की हक़ की बात सुनते हैं। जो इन ज़ाफ़रानी हाकिमों के ख़िलाफ़ उठेगा वोह मारा
जाएगा। अभी तो हिन्दू तालिबे इल्मों के ऊपर
पुलिस और इन्तेज़ामियाँ का क़ेहर टूटा है, जल्द ही जो बीजेपी, संघ या शिद्दत पसंद हिन्दू
होंगे और बिलफार्ज उन्होंने मोदी, योगी, अमित या बीजेपी से हक़ की बात को सुनंने को
बोल दिया तो वोह भी हो जाएगा इन हाकिमों का दुश्मन नंबर एक।
बीजेपी की इस तरह की शिद्दत और दहशत इस बात की तस्दीक़ करती है की जो लोग सोच रहे हैं की अरे बात मुस्लिम अवाम की है हम क्यों बोले तो ऐसा नहीं है
आज
हम हैं कल तुम्हारा नंबर भी आएगा।
यह
ज़ालिम का फलसफा है अगर ज़ुल्म
के लिए कोई नहीं मिला तो इनका अपना मारा जाएगा।
जामियां मिलिया इस्लामियां और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के ख़ाकी दहशतगर्द हमले पर अगर तमाम अवाम एक सुर में बीजेपी के ख़िलाफ़ हो जाता तो तभी हुकूमत गिर जाती। लेकिन भारत के अवाम को तो खुद ही अपनों को गवाने की आदत है। अब हालात ऐसे हो गए हैं की हक़ मांगने पर लाठियां पड़ती हैं। हॉस्पिटल में मरीज़ को दाख़िल करते वक़्त अवाम डरता है कहीं योगी जी नाराज़ ना हो जाएँ। ऑक्सीजन की सिलेंडर मांगने वाले कई मरीज़ और उनके ेहले खाना या तो अब इस दुनियां में नहीं या तड़प तड़प के जीने को मजबूर हैं।
किसी
को मीडिया से बात करने की इजाज़त नहीं अपने दिल की बात कहने की इजाज़त नहीं सभी जगह पहरा
है मानों भारत फिर से ग़ुलाम हो चूका है। अगर
यही हिम्मत और शुजात २०१७ में नहीं २०१८ में नहीं २०१९ में भी नहीं २०२० में दिखाई
होती और तमाम भारत का अवाम एक सुर में हुकूमत के ख़िलाफ़ बगावत करता तो हालात इतने पेचीदा
नहीं होते।
Zuber

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