नाज़रीन,
जिस
हिसाब से जम्मू कश्मीर में बदइंतज़ामी देखी गयी है और हादसे में मरने वालों की तादात
फील वक़्त २० तक पहुंच गई है बरक़्स मरने वालों की तादात सैकड़ों या हज़ारों में हो सकती
है। जहाँ देखो इंसानी जूते और चप्पलें पड़े
हुए दिखाई दे रहे हैं।
नाज़रीन
वक़्त एक ऐसा तमाचा है जो इंसान को जब पड़ता है तो उसकी असलियत, दिलों में भरी गंदगी उसकी औक़ात सब कुछ दिखा
देता है। नाज़रीन आज बरसों से जम्मू कश्मीर
की हुकूमत अपनी क़यादत में अम्बरनाथ यात्रा का एहतेमाम करती थी। उस सालाना यात्रा में तो २० और २५ लाख ज़ायरीन होते
थे। लेकिन ऐसी बदनज़मी कभी भी देखने को नहीं
मिली। जो महज़ २ लाख के हुजूम में मरकज़ की जानिब से देखने को मिली है. कश्मीर का मुस्लिम अवाम ज़ायरीनों को
अपने कन्धों पर बिठा कर खुशी खुशी उनके मज़हबी अक़ीदे के हिसाब से ज़्यारत करवाता था। लेकिन यह इन ज़ाफ़रानियों के दिलों दिमाग़ में भरी
हुई गंदगी ही थी की हम हमारे रुपए पैसे का इस्तेमाल किसी मुस्लिम को नहीं होने देंगें। बस फिर किया था आ गया हिटलर का जाहिल चनकिया जिसने
जम्मू कश्मीर की कयादत मरकज़ के ज़ाफ़रानी हाकिम के हाथ में सौप दी। जाहिल है ना, आगे के हालात देखता नहीं है। इस गंजे ताड़ी पार को बस चुल्लू भर पानी ही दीखता
है। क़लील वक़्त (Short
Term)
पालिसी असली दानिशमंद वोह जो दूरअंदेश (Long
Term)
नताईज के बारे में सोचे और असली बसीर वोह जो २० साल आगे के हालात देख सके।
नाज़रीन सहाफ़ी को उत्तर प्रदेश का कोविद १९ में बाबा की बदनज़्मी याद आ गई गंगा में लाशें तेर रही थी कुत्ते चील कव्वे उन लाशों को नोच रहे थे फिर भी अमित शाह जैसा ज़ालिम दरिंदा क़साई उत्तर प्रदेश की पब्लिक रैली में रायता फैला कर आता है. मुस्लिम अवाम के ख़िलाफ़ अवाम के ज़हन में मज़ीद ज़हर की मिक़्दार देता है.
नाज़रीन फिर अगर कोई दानिशमन इनको इनकी की हुई ग़लती
पर कुछ कहता है तो वोह पाकिस्तानी, ग़द्दार, जिहादी हो जाता है। अब ऐसे लोगों को ज़रा लगने दो और ठोकरें। जिनके ज़ेहन इतने मुत्तसिब और ज़हरीले कर दिए गए
हैं की उनको मुस्लिम माश और नस्ल बर्बाद करने की होड़ लग गई है। तो इन ज़ेहनी मुफ़लिसों को एक बात वाज़े कर देना चाहता
हूँ तुम्हारे सोचने और करने से कुछ नहीं होगा वही होगा जो मेरे खुदा का फैसला होगा। कोविद १९ में तब्लीग़ पर गलतबयानी उसके ऊपर सब्ज़ी
फरोश, फल फरोश, छोटे और मझोले मुस्लिम कारोबारियों पर संघ के दहशतगर्दों का क़ेहर सिर्फ
इसलिए की उन गरीब मुस्लिम अवाम के ज़ारियाये माश ही तोड़ दो अपने आप यह क़ौम टूट जाएगी। लेकिन यह गलतफहमी थी संघ की बेजीपी की और हर शिद्दत
पसंद हिन्दू की, जिस क़ौम को शैतान नहीं तोड़ सका उस क़ौम को तुम जैसे चंद जाहिल और दहशतगर्द
क्या तोड़ पायेगें। फिर हर कामिल मुसलमान का
ईमान है हर अगर कोई तकलीफ अल्लाह की जानिब से आई है तो उसमे दो सूरतें हैं एक या तो
यह उसके गुनाहों का कफ़्फ़ारा है या फिर उसका इम्तेहान।
अगर
किसी बन्दे से कुछ गुनाह हो गया और वोह तकलीफ में मुब्तेला हो गया तो यह उसके गुनाह
की सज़ा है। फिर अगर कोई मोमिन मासूम है कोई
गलती नहीं हुई कोई गुनाह नहीं हुआ फिर भी उसको तकलीफ पहुंची तो यह उसका इम्तेहान है। रब्बे कायनात उस बन्दे से अपने इश्क़ का इम्तेहान
लेना चाहता है। अगर बंदा ऐ मोमीन हर इम्तेहान
पर सबर से काम करता है हर मुसीबत को अल्लाह की मशीयत समझ कर क़ुबूल करता है तो उसकी
नेमतों में इज़ाफ़ा होता है। यह हमारा ईमान है।
फिर
जो ज़ालिम हुक्मरान हैं ज़ुल्म करतें हैं नाइंसाफ हैं हाकिमे वक़्त होते हुए अपने ओहदे
का नाजाइज़ इस्तेमाल करतें हैं तो उसका कफ़्फ़ारा उनको और उनकी रियाया के देना होगा। यहीं इन्साफ का तकाज़ा है और मालिके कायनात का निज़ाम।
Zuber
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