इल्म के नूर से चश्मे हुए रौशन
इल्म आया ज़ालिम भागा फ़ौरन।
ज़ुबैर
अज़ीज़ नाज़रीन,
वैसे
तो इल्म की एहमियत पर सहाफी कई मज़मून शाया कर चूका है, ताहम गर दौरे ज़ालिमियत में मुस्लिम मर्द और दुख्तराने मिल्लत को ज़िंदा रहना है तो इल्म का हासिल करना लाज़िम कर
लो। इल्म की ताक़त से अपना हक़ लेने की जद्दो जेहद करने की हिम्मत और क़ुव्वत पैदा होती
है। इल्म की ताक़त से इंसान में नए नए फलसफे,
मिंतक़ और गुफ्तगू में उज्जत, जिरह और बेहेस
करने की सलाहियत आती है।
A curse (Shrap) that will never leave you……any where.
नाज़रीन यहाँ यह सहाफ़ी वाज़े करना चाहता है की इल्म की दौलत से वही शख़्स फ़ैज़याब होता है, जिसको इल्म लेने की ख़्वाहिश और आरज़ू होती है। नहीं तो ऐसे भी तालीम साज़ जाहिल भरे पड़े हैं जो होते तो B.Tech, M.Tech (साइंस दान), जर्राह (डॉक्टर), सहाफ़ी, अदलिया में बैठे जज या वकील, इंजीनीर प्रोफेसर राकेश लेकिन अव्वल नंबर के जाहिल होते हैं।
नाज़रीन तालीम या इल्म हासिल करने के बाद इंसान में अच्छे और बुरे को समझने की सलाहियत आती है। अक़ल आती है और उसका दिमाग़ रौशन हो जाता है।
अब जो लोग हिन्द में बड़ी बड़ी डिग्रीयां B.Tech, M.Tech, सहाफ़ी, ले कर भी एक जाहिल जैसा काम करतें हैं, एक चौकीदार के नक़्शे क़दम चलते हैं और अपने नाम के आगे फख्र से चौकीदार लिखतें हैं उसपे ग़ुरूर महसूस करतें हैं। जर्राह (डॉक्टर) एक जानवर का पख़ाना पेशाब खाते पीते हैं और उसके फायदे बतातें हैं, बजाये एलोपेथी से इलाज करने के करोना का इलाज पख़ाने और पेशाब से करने की वकालत करतें हैं। साइंस दान एक जानवर के पख़ाने को एटम बम की ताक़त वाला बोलतें हैं।
फिर ऐसे पड़े लिखे जाहिलों के बारे में यही बात कही जा सकती है की इनके पास डिग्री तो आ गयी लेकिन ज़हानत नहीं आई। और ज़हानत आती है ख़ुद रातों को जाग कर किताबों का मुताला करने से, इल्म हासिल करने से, ना की डिग्री हासिल करने से। फिर ऐसे डिग्री जीवी तो नक़ल कर के पास हो जातें हैं। या फिर किसी तंज़ीम के रसूख़ और बड़े ओहदेदार की सिफारिश से डिग्री हासिल कर लेते हैं। एक बड़े ओहदेदार की सिफारिश डिग्री तो दिलवा सकती है लेकिन ज़हानत नहीं। और कितना ही बड़ा ओहदेदार क्यों ना हो उसके अंदर यह सलाहियत नहीं की एक गधे को आला नसल का जंग में इस्तेमाल होने वाला अरबी घोडा या एक लंगूर-लँगूरनी को आला ज़हन सहाफ़ी बना सके। अगर आशीष को दे दना दन, सूसू तिहाड़ी, अंजन में लगा कंजन, रूह बिक गई, स्वीटा हो गई साफ़ में सहाफत की ख़ुसूसियात आएगी तो वोह किताबों का मुताला करने से आएगी ना की ज़ाफ़रानी चाटुकारिता से आएगी।
वही
भारत में हो रहा है जो देखने में आ रहा है।
एक १२वी फ़ैल जिस्म की नुमाइश करने वाली नचौड़ी वज़ीर तालीम मुंतख़िब की जाती है। हो सकता है यह ओहदा देने वाला हम सूबा किसी ज़ामाने
में इसके ज़िम्नी जाल में अटक गया होगा। फिर
उसी ग़ैर मुनासिब ग़ैर ज़रूरी वाहियात रिश्ते को ११ साल बाद उस ख़ातून ने भुनाया। लेकिन अब बहू के वोह लटके झटके वोह नज़ाकत कहाँ बची
अब तो गैस सिलंडर को भी झेलना पड़ रहा है।
नाज़रीन उमूमन यह देखने में आया है की ज़ाफ़रानी ऐ.बी.वी.पी. के गुंडे कॉलेजेस, यूनिवर्सिटीज में तालीम लेने नहीं बल्कि ख़ुराफ़ात और दहशत मचाने जातें हैं। जब इम्तेहान आतें हैं तो उस्ताद को धौंस, डपट कर के नक़ल कर के पास हो जातें हैं। जो उस्ताद इनकी धौंस और दहशत में नहीं आया उसका होता है क़त्ल। उज्जैन के माधव कॉलेज के प्रोफेसर सबरवाल बेहतरीन मिसाल हैं उस क़त्ले आम की जो ऐ.बी.वी.पी. के दहशतगर्दों ने पीट पीट कर कुर्सी से बाँध कर उनको उस हद तक पीटा की उनकी मौत वाक़े हो गयी।
ऐसे ही यूनिवर्सिटीज में दहशत मचा कर निकले हुए दहशतगर्द बेरूपिये कभी प्रोफेसर राकेश के भेस में कभी डॉक्टर संबित के भेस में और कभी तेजस्वी सूर्या के भेस में ज़ाफ़रानी दहशत के पीछे छुपे हुए वोह काली भेड़ें होतें हैं जिनके पास तालीम की ज़हानत और इल्म के चिराग़ की रौशनी तो होती नहीं बल्कि दहशत की तलवार और क़लम होती है।
जिससे वोह अवाम और समाज को ख़ौफ़ज़दा करते रहतें हैं।
लेकिन जब इनके सामने कोई असल तालीम साज़ या उनके सर का उस्ताद आ जाता है जो इनकी काली करतूत कॉलेज के ज़माने से जानता है तो भाग खड़े होतें हैं।
FARARI
ऐसे ही भगोड़ों की कुछ सियासी तंज़ीमों ने फौज तैयार कर रखी है जो हर मुद्दे पर या तो झूठी, फरेबी बेहेस करतें हैं, हर मुद्दे पर झूट फैलातें
हैं या जंग में अपनी हार देख कर भाग खड़े होते हैं। और ऐसे फरेबी, झूठे और
मक्कार भगोड़ों को भगाने वाले कोई और नहीं असली तालीम साज़, हक़ पसंद सियासतदान, दानिश्वर
या रूहानी शख़्सियत होती हैं।
Zuber
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