Thursday, 21 September 2017

तारक मेहता का उल्टा चश्मा सीरियल बेन होना चाहिये भाग-२



भाग-१ से जारी

पत्रकार जुबेर अपने पहले लिखे हुए लेख और उसमें दिए हुए कुछ सटीक तर्कों  को आगे बढ़ाते हुए विश्वास के साथ फिर लिख रहे हे की तारक मेहता का उल्टा चश्मा सीरियल बेन होना चाहिए.  जैसा की मेरे पहले लेख में मेने बताया हे की किस तरह से ये धारावाहिक सांप्रदायिक माहौल ख़राब कर रहा हे और इससे पहले वाले लेख में सलीम नामक लड़के और उसकी मुस्लिम टीम का ज़िक्र किया हे.  आगे जब हिन्दू लड़की के परिजन पुलिस के पास अपनी शिकायत लेके पहुँचते हे तो पुलिस उस सलीम नामक युवक तथा उसकी मुस्लिम टीम का सपोर्ट करती हे तथा हिन्दू लड़की के परिजनों को ज़लील करती हे.  जो सच्चाई से एक दम परे हे.  और ऐसी झूटी बाते दिखा कर डायरेक्टर महोदय की मानसिकता का पता चलता हे के वो किस चालाकी से एक वर्ग विशेष के लिए हिन्दू समाज के मन में ज़हर भर रहे हे.  जैसा दिखाया गया हे वैसा होता नहीं हे.  पुलिस कभी किसी मुस्लिम को सपोर्ट नहीं करती अगर ऐसा होता तो अख़लाक़, पेहलू खान, जुनेद के कातिल जेल में होते और तथा कथित गौ हत्या के इलज़ाम में मुजरिम जेल से बहार.


जिस तरह की साम्प्रदाइक मानसिकता के साथ डाइरेक्टर महोदय चीज़ो को गलत डंग से पेश कर रहे हे तो उसका प्रभाव समाज पे क्या होगा वो एक विद्वान, पत्रकार या शिक्षित इंसान ही समझ सकता हे परन्तु कॉमन भारतीय तो उसी पे विशवास करेगा जो दिखाया गया हे.


२०१४ से पहले ये धारावाहिक ऐसा साम्प्रदाइक सोच वाला नहीं था बल्कि ये गन्दी, आतंकी और साम्प्रदाइक सोच २०१४ के बाद बनी हे.  जब खूखार आतंकी और उसका संघटन बीजेपी ने देश के संसद पे ज़बरदस्ती प्रजातंत्र की हत्या कर के कब्ज़ा किया.  २०१४ से पहले ये धारावाहिक साम्प्रदाइक सौहार्द को मज़बूत करने के एपिसोड पेश करता था.


अब्दुल को ईद पे जाने के लिए सोसाइटी के सभी वर्ग पेसो का इंतज़ाम करते हे. फिर किसी कारण वंश वो अपने घर नहीं जा पाता तो उसकी पत्नी, पीता और माता जी को बम्बई बुलवाया जाता हे तथा अब्दुल और उसके परिवार का सत्कार किया जाता हे.  उनके पीता जी को दाढ़ी और टोपी में और पत्नी व माता जी को बुर्के में दिखाया गया हे. फिर पीता और अब्दुल का सत्कार सोसाइटी के मर्द और महिलाओ का सत्कार सोसाइटी की महिलाये करती हे.


लेकिन ऐसी भाई चारे वाली सोच आतंकिओ को कैसे हज़म होने लगती और २०१४ के बाद से सीरियल ने साम्प्रदाइक मोड़ ले लिया.  जब मोदी ने अपनी शपत विधि से पहले तारक मेहता की समूची क्रू मेंबर की तारीफ की थी और उन सभी को न्योता भेजा था तभी इस पत्रकार का माथा ठनका था की अब सीरियल साम्प्रदाइक रंग लेगा.


एक इंसान को अपनी सोच और विचार किसी के अधीन नहीं रखना चाहिए. अगर आतंकिओ और बन्दुक के डर से तारक मेहता के डायरेक्टर ने  अपनी सोच में तब्दीली की हे तो ऐसा आदमी किसी और दबाव में आके भारत विरोधी सोच के ऊपर भी काम कर सकता हे. अगर पहले डायरेक्टर की सोच साम्प्रदाइक सौहार्द कायम करने की थी तो २०१४ के बाद साम्प्रदाइक कैसे हो गई.

निष्कर्ष

१.            धारावाहिक का डायरेक्टर अपनी सोच एक समान नहीं रख सकता और उसकी सोच समय के साथ बदलती रहती हे और आतंकिओ के दबाव में साम्प्रदाइक हो जाती हे. जिससे भारत के साम्प्रदाइक ताने बाने को ठेस पहुँचती हे तो ऐसे धारावाहिक को बेन करना उचित होगा.

२.           जो डायरेक्टर सरकार या आतंकिओ के दबाव में आ के अपनी परम्परा, साम्प्रदाइक सौहार्द की सोच, गंगा जमुनी तहज़ीब बदल सकता हे वो आतंकिओ के दबाव में आ के कुछ भी कर सकता हे. तो ऐसे धारावाहिक को बेन करना ही उचित होगा.

३.            कोई और कारण इस धारावाहिक को बेन करने में जो मान्यवर उचित समझे.

जुबेर एहमद खान
पत्रकार

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