Monday, 11 September 2017

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के फैसले का पत्रकार जुबेर ने किया सुवागत.

भोपाल में ट्रिपल तलाक़ पे मुस्लिम पर्सनल लॉ की बैठक में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का खैरमकदम किया हे परन्तु ये निर्णय लिया गया हे के ये प्रक्रिया वेध है और ये किसी भी सूरत से असवैधानिक नहीं है.  ट्रिपल तलाक़ यानि तलाक बिद्दत इस्लामिक शरीयत का एक हिस्सा हे और इसे रद्द करने का अधिकार किसी भी संस्था या सरकार को नहीं हे.  साथ ही बोर्ड ने ये साफ़ किया हे की इस्लामिक शरीयत में मदाखलत करने का हक़ किसी को नहीं हे.


बोर्ड ने तलाक बिद्दत के खिलाफ एक जन जागरूकता अभियान शुरू करने का निर्णय लिया हे. और मुस्लिम युवाओ में तलाक बिद्दत से किसी भी महिला को अलग न करने के लिए जागरूकता पैदा करेगा.


इस पत्रकार का ये मानना हे के मोदी सरकार जानबूझ कर मुस्लिम शरीयत से जुड़े हुए मुद्दों पे ज़्यादा तवज्जो दे रही हे.  मोदी सरकार को मुस्लिम महिलाओ या मुस्लिम समाज से सहानुभूति नहीं हे परन्तु वो भारत में एक भगवा कानून लाना चाहती हे. उसमे कुछ ज़मीर फरोश मुस्लिम तंज़ीमे जिनको भगवा आतंकिओ से माली इमदाद मिलती हे मिले हुए हे. गौ वध पे कानून बनाया फिर गोवा में तो गौ वध चालू हे और गौमांस किसी भी तरह से प्रतिबंधित नहीं हे.  दूसरी बात ट्रिपल तलाक में मोदी सरकार ने इतनी भावुकता दिखाई तो इससे जिन महिलाओ को ट्रिपल तलाक हो गया हे उनके भरण पोषण के लिए काहे को भावुकता नहीं दिखाई. 


अभी ट्रिपल तलाक पे मोदी सरकार भावुक हो कर सुप्रीम कोर्ट की एक सांविधानिक पीठ को मसला रेफेर करती हे जिसको महिलाओ के हक़ की लड़ाई करार देते हे फिर बकराईद पे अभी तक गाय, ऊंट की कुर्बानी पे हिंदुत्ववादी संघटन उत्पात मचाते थे इस साल बकरो और भैस की कुर्बानी पे भी उत्पात मचाया गया हे. तो हर वो मसला जो मुस्लिम समाज से जुड़ा होगा उसपे मोदी सरकार और हिन्दू आतंकिओ को एतेराज़ होगा. बकरो की कुर्बानी को वर्जित क़रार देने के पीछे उनकी ये दलील थी के ये जीव हत्या हे तो में उन सभी भगवा आतंकिओ से पूछना चाहता हूँ के क्या तुम गणपति वित्सर्जन और रावण दहन के बाद किसी न किसी जीव (बकरा, मुर्गा, भेस) की हत्या कर के उसका सेवन नहीं करते हो.  क्या तुम्हारे मंदिरो में किसी जीव की बलि प्रथा का रिवाज नहीं हे. अरे तुम्हारे साधू संत सिद्धि पाने के लिए जानवर की क्या मानव की बलि करवाते हे.


मुस्लिम शरीयत को सेबोटाज करने में हिन्दू या भगवा आतंकी प्रत्यक्ष सामने नहीं आते बल्कि मुस्लिम ज़र खरीद गुलाम और उनकी तंज़ीमों को आगे करते हे. ऐसे मुस्लिम लोग मुनाफ़िक़ हे जो इस्लाम और मुसलमानो को इज़ा पहुंचाने का काम करते हे. भगवा आतंकिओ का ऐसा करने से दो मकसद हल होते हे पहला के वो भगवा मीडिया 'आजतक, ज़ी न्यूज़, इंडिया न्यूज़' और उनके भगवा आतंकी समर्थित पत्रकारों के सामने बैठ के छाती ठोक के कहते हे के हम नहीं कह रहे ये तो इनके खुदके समाज की तंज़ीमे कह रही हे. दूसरा मकसद इन भगवा आतंकिओ का ये हल होता हे के मुसलमानो में निफ़ाक़ डालना और अगर इस्लामिक जिहाद (पाक युद्ध) की स्थिति बनती हे तो हम इन ज़मीर फरोश मुस्लिम तंज़ीमों के नुमांइदों को आगे कर देंगे ताके हमारे हिन्दू आतंकी युद्ध की तपिश से बचे रह सके.


जिस तरह से उच्चतम न्यायलय एक मोदी भक्त की हैसियत से धड़ा धड़ मुस्लिम समाज के खिलाफ निर्णय दे रहा हे चाहे वो हिन्दू आतंकिओ की मुस्लिम बहुल इलाको में ब्लास्ट के केस में बेल हो या वंजारा और अन्य आतंकिओ को बाइज़्ज़त बरी. फिर याकूब मेमन की फ़ासी हो या ट्रिपल तलाक़ इन सभी मामलो में मुसलमानो को गुनहगार की हैसियत से देखा गया हे. उससे तो बाबरी मस्जिद का निर्णय भी मुस्लिम समाज के खिलाफ जाता हुआ दिख रहा हे.  अल्लाहाबाद हाई कोर्ट ने ज़मीन तीन भागो में बाट दी थी जिसका के कोर्ट को कोई हक़ नहीं था क्योके ये ‘पार्टीशन सूट’ नहीं था बल्कि ‘टाइटल सूट’ था इसके ऊपर इस पत्रकार ने अक्टूबर २०१० में एक आर्टिकल लिखा था

ZUBER JOURNALIST: Once again Indian Judicial System fails to deliver... zuberahmed.blogspot.com/2010/10/once-a


मुसलमानो को अपने हक़ के लिए जागना होगा और हर उस मुस्लिम का सोशल बहिष्कार करना होगा जो इस्लाम, शरीयत और मुस्लिम समाज को इज़ा पहुंचने का काम कर रहे हे.

जुबेर अहमद खान
पत्रकार

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