नाज़रीने गिरामी,
मालिके कायनात की लाठी बेआवाज़ है लेकिन जब पढ़ती है तो नाइंसाफों मुँह से हगने वालों क़ातिलों के या तो चूतड़ सुर्ख कर देती है या उसको हलाक कर देती हैं। हिन्द में ऐसी ज़िंदा मिसालें "ऊपर वाले के यहाँ देर है लेकिन अंधेर नहीं" बोहोत सी देखने को मिल रहीं हैं। ख़ास २०१४ के बाद से तो शिद्दत पसंद काफ़िरों, बीजेपी वालों, संघी दहशतगर्दों और ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर-लँगूरनियों को इतनी लाठियां पड़ी हैं की लँगूरनियाँ उस पिटाई की अज़ीयत और जलन के चलते बरहना (नंगी) घूम रहीं हैं। और लंगूरों ने मुँह से खाने के बजाये हगने का आग़ाज़ किया है। यह उनकी तकलीफ का सबूत है।
अब सिलसिलेवार बताता हूँ जब जब इन लंगूर लँगूरनियों, बीजेपी वालों और शिद्दत पसंद काफ़िरों ने इस्लाम, मुसलमान, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, तालिबान के बारे में ऊल जलूल बका कुछ ही अर्से के बाद उनके ऊपर वैसे ही हालात हो गए की तालिबान की हिमायत करने पर मजबूर हो गए। ऐसी पड़ती है मालिके कायनात की लाठी की चूतड़ सूर्ख हो जातें हैं। अब जर्राह के पास जा कर दिखा भी नहीं सकते।
१. नज़रिने गिरामी जिस तालिबान को ज़ाफ़रानी लंगूर-लँगूरनियाँ बदनाम करते थे रूढ़िवादी, धकियानूसी १४०० साल की परंपरा निभाने वाले आज उसी तालिबान की हिमायत और फलसफे को केरला के हिन्दू एझावा गुट बरादरी और बीजेपी के लिए नर्म रुख रखने वाले सियासत दान वेल्लापल्ली नतेसन ने स्कूल कॉलेजेस यूनिवर्सिटीज में तुलबात और तालिबे इल्मों के लिए मुख्तलिफ क्लास रूम की हिमायत की है। वोह लड़के और लड़कियों के एक क्लास रूम में बैठ कर तालीम लेने के ख़िलाफ़ हैं। उनके हिसाब से एक साथ बैठ कर तालीम लेने वाली तहज़ीब भारतीय सक़ाफत की ख़िलाफ़वर्ज़ी करती हैं। यह तहज़ीब मग़रिबी और अमीरिकी है हमें उसका हिस्सा नहीं बनना चाहिए। उन्होंने बरोज़ इतवार (Gender Neutral Policy) के लिए ख़िताब करते हुए एक सहाफी इजलास में हुकूमत से मुतालबा किया की स्कूल कॉलेज में मर्दों और ख़वातीनों के लिए मुख़तलिफ़ क्लास रूम का एहतेमाम किया जाए।
अब चलिए बतातें हैं तब किया हुआ था जब तालिबान ने अवामी ज़राये आमदो रफ़्त, तालीमी इदारों, दफ्तरों में मस्तूरातों और मर्दों के लिए अलहदा इन्तेज़ामात किये थे। तब लँगूरनियाँ बरहना हो गई थी और तालिबान को कोसने लगी थी। यह तो क़दामतपसंदी सोच है, मस्तूरातों को दबाने की हिकमते अमली। १४०० साल वाली क़दीमी मेरास है। हालांकि लँगूरनियों को उसी वक़्त अपने ब्लॉग मज़मून में धो डाला था। उनको मेने उसी वक़्त जूते मारे थे। अगर इतना ही बूरा लग रहा है तो बॉम्बे जैसे अज़ीम शहर में लेडी स्पेशल लोकल क्यों चल रही है। तुम भारत के लोग तो अपने आपको बोहोत ही जदीद और तालीमी आफ़ता बोलते हो। फिर हर बस में लेडी सीट क्यों चाहिए। ठीक है अभी बंद कर दो लेडी स्पेशल लोकल और हर लोकल में लेडीज डब्बा हटा दो फिर देखो हर लँगूरनी आग मूतेगी उनको महिला हमदर्दी दिखेगी।
२. आज जो रूदाली गेंग अंकिता के क़ातिल के ऊपर बेवा रोना (विधवा विलाप) कर रही है और कड़ी सज़ा की मांग कर रहें हैं तो में कहना चाहता हूँ की अंकिता के क़ातिल को भी वैसी ही सज़ा मिले जैसी की बिल्क़ीस बानो के इज्तेमाई अस्मतदरी करने वालों, उसकी ३ साल की बेटी और एहले खाना के ७ अक़ारिबों को मौत के घाट उतारने वालों को मिली थी। अगर वोह तमाम हिन्दू दहशतगर्द संस्कारी थे और शाहरुख़ भाई भी संस्कारी हैं। फिर अकेले शाहरुख ने एकेली लड़की को जलाया है वहीँ ११ हिन्दू दहशतगर्दों के जुर्म में ८ क़तल जिसमे ३ साला मासूम और ५ माह की हामेला के साथ इज्तेमाई अस्मतदरी शामिल है।
३. जब इमरान ख़ान अज़ीम इस्लामिक
सल्तनत पाकिस्तान के वज़ीरे आज़म मुंतखिब हुए थे और पहले हूकूमती दौरे पर अमेरिका गए
थे। तब लँगूरनियों ने उनके लिए अदना दर्जे
की ख़बरों को शाया किया था। यह वैसा ही था जैसा
की हिन्द में असदुद्दीन को इंतेखाब से दूर रख कर ज़ाफ़रानी तंज़ीम को फायदा पहुंचाने के
लिए लंगूर (राजदीप) और तमाम लँगूरनियाँ क़ौमी चैनल पर अदना दर्जे की ऐसे बदज़ुबानी बोलते
थे (वोट कटुआ, फ़िरक़ापरस्त, कट्टरपंथी सोच) ताके वोह ज़लील हो कर इंतेखाब से बरतरफ़ हो
जाएँ।
फिर जब मोदी की ज़लालत बेरुन मुल्कों में होती है तब इन लंगूर और लँगूरनियों में ख़ामोशी छा जाती है। ज़ीरो बटे सन्नाटा। जब जर्मनी में एक ख़ातून के पास घूस रहा था तब वहां के आला ओहदेदारों ने अपनी तरफ खींच लिया। फ्रांस में कैमरे के सामने आना चाहता था तो फ्रांस के वज़ीरे आज़म उसके सामने आ गए और उसको पोशीदा कर लिया। अभी दो माह क़ब्ल जापान में गया और जापान के वज़ीरे आज़म के साथ आ रहा था फिर बड़े ही गर्मजोशी से अमेरिकी सदर की जानिब हाथ बढ़ाया उन्होंने नज़र अंदाज़ कर दिया और जापानी सदर से हाथ मिलाया।
फिर जहाँ तक वोट कटुआ का सवाल है उसके ऊपर लंगूर ख़ास राजदीप को पहले ही धो डाला है। जब हैदराबाद और बिहार के इंतेखाब में ज़ाफ़रानी तंज़ीम को कुछ भी हाथ नहीं लगा। और हैदराबाद में ज़ाफ़रानी तंज़ीम ने वोट काटे केसीआर और बिहार में नितीश के। रहा सवाल मजलिस का तो बिहार में ५ मुंतखिब हो कर आये थे और हैदराबाद में मेहफ़ूज़ रहा मजलिस का क़िला।
तो
बताने का मक़सद वही है हर उस मुद्दे पर जिसपर यह फ़िरक़ापरस्त, ज़हीरीली सोच, ज़ाफ़रानी शिद्दत
और लंगूर-लँगूरनियाँ इस्लाम, मुसलमानों, तालिबान, पाकिस्तान, कश्मीर और मजलिस को झूठ
फरेब के साथ बदनाम करते थे, मालिके मुतलक़ की लाठी ऐसी पड़ेगी की इनके चूतड़ या तो लाल
हो जायेगें या फिर मुँह से हगने वाला ही हलाक हो जाएगा।
जिस तरह से कोविद १९ के बाद हिजाब ना पहनने पर फाइन लगता था वैसे ही हिजाब की मवाफ़ेक़त में यह शिद्दत पसंद और ज़ाफ़रानी आयेगें। हालात वैसे ही होंगें।
Zuber
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