नाज़रीन गिरामी,
इससे क़ब्ल १५ अगस्त को लिखे मज़मून की सच्चाई साबित हो रही है और मोदी के घर घर तिरंगा और आज़ादी का अमृत महोत्सव के नताइज मिलना शुरू हो गए हैं। जैसा की मेने मेरे मज़मून में कहा था।
नाज़रीन हाल ही में गुजरात हिन्दू दहशतगर्दाना हमले के तमाम ११ दहशतगर्द बरी कर दिए गए। यह हिन्दू शिद्दत पसंद ना सिर्फ मुसलमानों के क़त्ले आम में मुलव्विस थे बल्कि उस हामला ख़ातून की इज्तेमाई अस्मतदरी, उसकी ३ साल की बच्ची को दिवार पर सर पटक कर हलाक करने के लिए भी ज़िम्मेदार थे। हालांकि इन दहशतगर्दों को अदलिया ने इनकी दरिंदा सिफ़त जुर्म के लिए उमर क़ैद दी थी। लेकिन जैसा मेने बोला है की इंडिआ में आज कल ज़ाफ़रानी हुकुम चल रहा है। तो अदालत के हुकुम के ऊपर ज़ाफ़रानी हुकुम क़ाबिज़ हो गया। इन दरिंदों, क़साइयों, शैतानों, आतंकवादिओं को बजाये ज़ाफ़रानी सज़ा देने के उनको बरी कर दिया गया। यही है मोदी और ज़ाफ़रानी जदीद इंडिया। अब मेरा सवाल उन तमाम ना सिर्फ मुस्लिम अवाम से है बल्कि उन सेक्युलर हिन्दू जमातों से भी है जो मोदी के बहकावे में आ कर वतन से मोहब्बत, घर घर तिरंगा मोहीम का हिस्सा बने थे। जिस देश में क़त्ले आम करने वाले, दहशत गर्द हमला करने वाले दरिदों को इसलिए बरी कर दिया जाता है क्योंकि वोह सब अक्सरियत जमात से थे और जिनके ऊपर दहशतगर्द हमला हुआ था वोह अवाम अक़लियती हैसियत रखते थे। फिर इन सब मुद्दों का गुजरात इंतेखाब में ज़ाफ़रानी तंज़ीम भरपूर फायदा उठाएगी और हिन्दू तुष्टिगुण, हिन्दू वोट बैंक की सियसत को फरोग देंगी। तो क्या अब इंसाफ़, अदालतें, हुक़ूक़े इंसानी, इंसान की जान का फैसला भी फ़िर्क़ा, मज़हब देख कर होगा।
फिर यह वतन से मोहब्बत कहाँ हुई यह तो वतन के साथ ग़द्दारी हो गई। जिस देश में क़ानून की बालादस्ती नहीं, इंसानी जान की कोई क़ीमत नहीं, इंसानी हुक़ूक़ की कोई क़ीमत नहीं, कोई जमहूरी निज़ाम नहीं तो ऐसे वतन जमुहरियत का लबादा ओढ़ कर अपने आपको दुनियां का सबसे अज़ीम जमूरियत बोले तो अच्छा नहीं लगता है। अब तो इंडियन हुकूमत और मोदी इन्तेज़ामियाँ को खुल कर आलमी बरादरी के सामने आना चाहिए और बेख़ौफ़ बोलना चाहिए हम अब जम्हूरियत नहीं रहे बल्कि हिटलरशाही या हुकुम शाही वाले देश हो गए हैं। जहाँ किसी भी शक़्स ने राजा (मोदी) के हुकुम की ख़िलाफ़वर्ज़ी की या राजा के ख़िलाफ़, हुकूमत के ख़िलाफ़ कुछ भी बोला तो होगा उसका सर तन से जुदा। जैसा की किम जोग की हुकूमत में होता है। अवाम को पकड़ कर उसकी आँखों पर पट्टी और हाथों को पीछे बाँध कर सर के पीछे से गोली मार दी जाती है। यहाँ तक की उस अहले ख़ाना की मस्तूरातों और मासूम ३ से ले कर १० साल के बच्चों तक को उसी तर्ज़ पर हलाक कर दिया जाता है।
में तो कभी भी १९९२ के बाद से इंडिया की मोहब्बत का हामी नहीं रहा रही सही कसर गुजरात २००२ और मुज़्ज़रनगर २०१३ हिन्दू दहशतगर्द हमलों ने पूरी कर दी। जो थोड़ी बोहोत मोहब्बत बाक़ी थी उसको सख्त नफ़रत में तब्दील कर दिया था। लेकिन मेरा सवाल तो उन मुस्लिम अकीदतमंदों से है जो इंडिया फर्स्ट के नारे को बुलंद करतें हैं और हर वक़्त तिरंगे की अज़मत इंडिया की मोहब्बत की बात करतें हैं अगर इतना सब करने के बाद भी उन्ही के साथ ऐसी नाइंसाफी ज़ुल्म और शिद्दत हो रही है तो उन मुस्लिमानों से में बेहतर हूँ जो पाकिस्तान की मोहब्बत को अपने दिल में सजाये बैठा हूँ। और हर मुद्दे पर इस्लाम फर्स्ट का दर्स देता हूँ।
फिर गुजरात का मुसलमान बल्कि हर ख़ौफ़ज़दा मुसलमान बोहोत बड़ा मुनाफ़िक़, ज़ाफ़रानी और मोदी का ग़ुलाम है। इनको अगर मोदी बोलेगा की मेरे को नबी अख़िरुज़्ज़म्मा तस्लीम करो नहीं तो सर तन से जुदा। तो यह सब बोल उठेगें लब्बेक मेरे आक़ा आप ही हैं हमारे नबी अख़िरुज़्ज़म्मा। नबी सल्लम की हुरमत और नामूस फिर इनके नज़दीक मोदी से कमतर हो जाएगी। तभी तो हर उस अमल में सरे फेहरिस्त रहतें हैं जिसको करने का हुकुम मोदी देता है। क्या ज़रुरत थी घर घर तिरंगा मोहीम का हिस्सा बनने की। हमको तिरंगे से कोई बैर नहीं है और ना ही हम किसी भी परचम की बेहुरमती करते हैं। बल्कि हम तो यह कह रहें हैं की कोई भी हुकुम बिलफ़र्ज़ अगर अच्छी बात का ही है और उसको शैतान, दरिंदा, क़ातिल, दहशतगर्द, जल्लाद दे रहा है तो उसको नहीं माना जाए। क्योंकि वोह शैतान का एक हरबा होता है अच्छी बात कर के तुमको अपने शैतानी जाल में फ़साने की एक साजिश।
अब कहाँ हैं वोह देवबंद के मौलाना जिनके मदरसे के तालिब तिरंगा ले दौड़े थे। कहाँ गए जामियत के मेहमूद और जमात हिन्द का वोह मुनाफ़िक़ ग़द्दार एहमदिया सुहेब क़ासमी। इससे क़ब्ल भी मोदी के आते ही नरोदा पाटिया, गुलबर्ग सोसाइटी के तमाम ज़ाफ़रानी दहशतगर्द जेल से बहार आ चुके हैं। जहाँ गुलबर्ग सोसाइटी में ९७ मुस्लिम अवाम को ज़िंदा जला दिया और नरोदा पाटिया में कम से कम २०० मुसलमानों को काट डाला था फिर भी सभी ज़ाफ़रानी दहशतगर्द बहार आ गए। वहीँ अहमदाबाद में छोटा सा ब्लास्ट हुआ जिसको सुतली बम बोल सकतें हैं और कुछ ३ अफ़राद मारे गए थे लेकिन ३९ मुस्लिम अवाम को फांसी पर टांग दिया।
इंडिया से मोहब्बत का क्या नतीजा हुआ मेरा सवाल सिर्फ मुस्लिम अवाम से नहीं है बल्कि हर उस अवाम से है जो इंसाफ़ पर यक़ीन रखता है और जो जुर्म के ऊपर सज़ा देने की बात करता है ना की मज़हब को देख कर सज़ा या जज़ा। खैर किसी भी मुस्लिम का यह तसव्वुर नहीं है की वोह किसी भी ज़मीन को वालेदा का दर्जा दे या उसकी परस्तिश करे। लेकिन मेरा सवाल तो उन हिन्दू अवाम से है जो भारत को अपनी माता मानते हैं। अगर कोई देरिदा, शैतान रावण आ कर तुम्हारी आखों के सामने तुम्हारी माता का चीर हरण करेगा और उसकी अस्मत लूट लेगा तो क्या तुम ऐसे ही खामोश रहोगे। अगर तुम्हारा खून अपनी माता की अस्मत लूटते देख कर भी नहीं खोल रहा है तो समझ जाओ की तुमको बदिया बकरा (जनखा या हिजड़ा) बना दिया गया है। नहीं तो ऐसे दरिंदे को जो तुम्हारी माता (भारत) की अस्मत लूट रहा है उसको हलाक कर डालो। और यह बीजेपी वाले, संघी दहशतगर्द, शिद्दत पसंद हिन्दू उनका हर अमल भारत माता की इज़्ज़त लूटने जैसा होता है। तभी हर मुद्दे पर वतन के साथ वफादारी की सारंगी बजाते रहतें हैं और अपने आपको इंडिया का सबसे बड़ा वफादार होने की होड़ में लगे रहतें हैं। इण्डिया के असासे फरोख्त कर दिए इंडिया की अवाम के दस्तूर की धज्जिया उड़ा दी इंडिया में इंसाफ़ का क़तल कर दिया मतलब भारत माता की अस्मत लूट ली। फिर भी भारत के सबसे बड़े वफादार और तिरंगे की अज़मत समझने वाले सिर्फ और सिर्फ बीजेपी वाले संघी और शिद्दत पसंद हिन्दू ही हैं।
Zuber
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