Sunday, 21 August 2022

हमारे लिए रेहमत, तुम्हारे लिए ज़ेहमत

 क़ेहरे इलाही है तुम्हारे लिए आस्मां की बारिश

हमारे लिए रेहमत तुम्हारे लिए दहकते अंगारे

साबित हुई आस्मां की बारिश 

 

नामूस-ए-रिसालत की हाजत अब दो रकत के मुल्लों की नहीं

एक ख़ुतबा गाह पर हुआ अश्कबार ते दूजे ने कहा

गुस्ताख़ को माफ़ कर दो सर तन से जुदा की अब हाजत नहीं।    

 

उनकी हुरमत पर जब उठे हर्फ़ तो

रब्बे काबा को भी आया जलाल

फिर चाहे वोह उनमे से हो या हम में

सब पर आएगा रब का ज़वाल

 

रहमतों की बारिश है यह उनको 

जिन्हे नामूस की आती है करना हिफ़ाज़त

हम दस्तार नहीं देते, तुम माफ़ करने की

करते हो हिमायत

 

यह जंग अब ना ख़ुतबा वालों की है

ना माफ़ी बाज़ों की है

उनकी हुर्मत तक जब पहुंच गई

जुबाने गुफ़्तार, रब्बे काबा ने उठा ली है तलवार

 

अब आसमान की जानिब ना देखो

अब तो वहां से बरसते हैं अंगार। 

 

आतिशे नूर है वोह हमारे लिए

तुम्हारे लिए वोह शोलों की है बारात 

 

बोहोत हुई अब हमारी क़त्ले अस्मत

फैसला कुन होगी इस जंग में तुम्हारी हार।  

 

सहाफ़ी ज़ुबेर

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