Saturday, 27 August 2022

अल निकाह मिनसुन्नती

अज़ीज़ नाज़रीन, 

आज आप हज़रात के दरमियान निकाह जाइज़ अमल में उसकी रूहानियत और उसकी तरीक़ेकार हिकमते अमली पर रौशनी डालता हूँ।  नाज़रीन जिस हिसाब से इस्लामिक सक़ाफ़त और उसकी रूहानियत को दुश्मने इस्लाम बदनाम करते हैं उसका मख़ौल उड़ातें हैं लेकिन अपने गिरेबान में ज़र्रा बराबर तव्वज्जो नहीं करते की उनके मज़हब में कितनी कमियां हैं।  उसी हिसाब से अगर तो कोई ग़फ़लत का मारा मुसलमान गुनाह कर रहा है बदकारी कर रहा है बदफ़ैली में मुब्तेला है तो उससे इस्लाम की तालीम वैसी हो जाती है ऐसा नहीं है।  वोह बदकारी बदफाहशी का मुर्तकिब वोह अकेला फर्द होगा ना की इस्लाम इसके लिए ज़िम्मेदार है।  

आज इस्लाम के ऊपर जो ४ बीबियों की तोहमत लगाई जाती है यह वही गलीज़ और गन्दी ज़ेहनियत है जिनको अपना नेफ़ा सही तरह से बाँधना नहीं आता और ओमूमन इस्लाम का नाम आते ही जो मुँह से ग़लाज़त खाते पीते हैं वही ख़ारिज करना शुरू कर देतें हैं।  और यह बदनामी भी उन्ही मुसलमानों की वजह से होती है जो २-२, ३-३ या ४-४ बीबियां तो कर लेते हैं लेकिन उनके हुक़ूक़ की अनदेखी करतें हैं।सबके साथ एक जैसा हुस्ने सुलूक नहीं करते, अपनी अज़वाज और नस्ल में इंसाफ़ नहीं करते।  

जबकी अल्लाह क़ुरान में १ या २ या ३ या ४ बीवियां रखने की इजाज़त देता है लेकिन साथ ही शर्त भी रखता है।  सबके साथ एक जैसा बर्ताव रखो और अगर खदशा है की तुम अपनी बीवियों में इंसाफ़ नहीं कर सकोगे तो तुम्हारे लिए बेहतर है १ ही बीवी रखो। 

दूसरी बात किसी मोमीन की दिल आज़ारी शिर्क के बाद सबसे बड़ा गुनाह है।  फिर बग़ैर बीवी की इजाज़त के जो लोग दूसरा तीसरा और चौथा निकाह करतें हैं वोह कितने बड़े जुर्म के मुर्तकिब होंगे।  आज जो संघी ४-४ बीविओं के फलसफे पर उंगली उठाते हैं तो वोह उन जैसे मुसलमानों की वजह से जो औरत की मर्ज़ी और उसकी इजाज़त लिए बग़ैर उसका दिल तोड़ कर उससे चोरी छूपे दूसरा निकाह कर लेते हैं।और फिर दूसरी के आते ही पहली को घर से धक्के मार कर निकाल दिया जाता है। 

जहाँ तक निकाह का सवाल है इस्लाम में दोनों फ़रीक़ों की आपस में बाहमी रज़ामंदी ज़रूरी है। जिसमे उमर की कोई क़ैद नहीं है।  दोनों में से कोई कितना भी बड़ा या छोटा हो निकाह किया जा सकता है।  हाँ लेकिन निकाह के वक़्त दोनों का आक़िल और बालिग़ होना ज़रूरी हैं।  इस्लामिक हिसाब से अगर एक लड़की को हेज़ आना शुरू हो गया तो वोह बालिग़ तस्सव्वुर की जाएगी।  ऐसे ही अगर लड़के को एहतलाम होना शुरू हो गया तो वोह बालिग़ है। 

निकाह के लिए किसी क़िस्म की तहरीरी निकाहा नामा की कोई हाजत नहीं है।  अगर दो फ़रीक़ दिल से एक दुसरे को क़ुबूल करतें हैं और इजाब क़ुबूल की गवाही दो गवाह किसी बुज़ुर्ग को देतें हैं की हमने सूना है की दोनों ने एक दुसरे को क़ुबूल कर लिया हैं तो निकाह हो गया।  रहा सवाल मैहर का तो वोह लड़की का हक़ होता है वोह निकाह के पहले अपने शोहर से ले ले या निकाह के बाद ले।  अब लड़की लड़के की मिलकियत हो गई और उसकी पूरी ज़िम्मेदारी लड़के के ऊपर आ गई।  वलीमा की ज़िम्मेदारी लड़के के कन्धों पर होती है।   जो सुन्नत है और ज़रूरी भी।  कियोंके लड़के का घर आबाद हुआ है तो वोह अब अल्लाह का शुक्र अदा करे और अपने एहबाब को क़राबत वालों को मिस्कीनों को दवत दे।

लेकिन जदीद दौर में और हालात को देखते हुए अगर निकाहनामा तहरीर कर लिया जाए तो अफ़ज़ल है।

इस मुद्दे पर फिर से पाकिस्तान की जानिब देखता हूँ।  जी हाँ नाज़रीन यह वही पाकिस्तान है जिसको बदनाम करने के लिए हिन्द का हूकूमती ग़ुलाम मुसलमान कोई कसर नहीं छोड़ता है।  जिस पाकिस्तान को जमीयत के मौलाना बोलतें हैं की उसकी वजह से आज तमाम आलम में इस्लाम बदनाम हो रहा है और हिन्द का मुसलमान पाकिस्तान के मुसलमानों से अफ़ज़ल है। 

पाकिस्तान में एक २४ साल के नमाज़ी परेहज़गार शख्स की शादी हुई, वोह इतने परेज़गार और इंसाफ़ पसंद थे की उनकी आरज़ू को देखते हुए उनकी पहली अहलिया ने उनकी दूसरी शादी करवा दी फिर दोनों ने मिल कर तीसरी और तीनों ने मिल कर चौथी शादी करवा दी।  सब बीवियों से बच्चे हैं और वोह शख्स पहले नौकरी करते थे अब उनका अपना खुद का कारोबार है जो खूब वसी हो चूका है।  दूसरी बात चारों बीवियां एक साथ रहती हैं जबकी सबके लिए उन्होंने अलहदा महल बना रखे हैं।  तमाम बच्चो के लिए एक जैसी सरमायाकारी, कर दी है।  इंसाफ़ का पैमाना ऐसा की कोई भी बीवी या उसकी नस्ल ख्वाब ख्याल में भी नहीं सोच सकती की उनके साथ कुछ उनका शोहर या वालिद नाइंसाफ़ी करेगा।      

कहने का मक़सद वही है जिस पाकिस्तान को हिन्दू हुकूमत के इशारे पर बदनाम किया जाता है ज़रा वहां जा कर उन परहेज़गारों से मिला जाए।  वहीँ दूसरी तरफ जामियत जिन मुसलमानों को पाकिस्तान से अफ़ज़ल बोलती है उन्ही उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की बदकारी बदफ़ैली की वजह से शरीयत के ट्रिप्पल तलाक़ के क़ानून को एक काफिर शिद्दत पसंद ज़ालिम दरिंदा सिफ़त राजा ने बदल दिया।  अब दूसरी तलवार ४ बीवियों के फलसफे पर लटक रही है। 

बताने का मक़सद वही है किसी एक फर्द की बदकारी का इस्लाम से कोई मतलब नहीं है।  इस्लाम तो सही और दुरुस्त दर्स दे रहा है नबी की हदीस मुसलमानों को गुमराही से नेकी की जानिब माइल करने की बात बताती हैं लेकिन मुसलमान उसपर अमल नहीं कर रहे तो बदनामी उस मुसलमान की होना चाहिए ना की पूरी क़ौम की और इस्लाम की। 

जुबेर

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