अज़ीज़ नाज़रीन, तमाम मज़मून का मुताला करें।
हूकूमते हिन्द की जानिब से मुस्लिम अवाम पर बर्बरियत, ज़ुल्म, शिद्दत और दहशत की आवाज़ें अब महदूत नहीं रह गई है बरक़्स आलमी सतह पर चीख़ बाज़ों की चीख़ों को सुना जा रहा है।
कश्मीर हो या आसाम, शुमाली सूबा हो या मरकज़ी दारुल खिलाफ दिल्ली सभी चीख़ बाज़ों की आवाज़ को पाकिस्तान जैसा मुस्लिम हमदर्द और मुसलमानों का वाहिद हमसाया आलमी सतह पर फ़रोग़ दे रहा है।
अमेरिका, एउरोपियन यूनियन, ओ.आई.सी. के बाद बरतानिया के ऐवान में कश्मीर में इंसानी हुक़ूक़ की सख्त खिलाफ वर्ज़ी और कश्मीरी अवाम के साथ भारतीय बर्बरता, क़त्ले आम पर तफ्सीली गुफ्तगू और बहस की गयी।
बरतानिया हुकूमत अब कश्मीर को मुतनाज़ा मानती है। अमेरिका, एउरोपियन यूनियन, ओ आई सी के बाद शायद बरतानिया वाहिद ऐसा मुल्क होगा जिसने कश्मीर को मुतनाज़ा तस्लीम किया है। आलमी और बेरुन मुल्क इक़दाम देख कर भारत की हुकूमत बोखला गई है। बरतानिया ने अपने सिफारती बयान में कहा है की मसला ये कश्मीर पर हूकूमते हिन्द संजीदा नहीं है। इस मसले को हल करने के लिए भारत और पाकिस्तान को बात चीत करना चाहिए।
बरतानिया की हिकमते अमली से भारत तिलमिला गया है, इसलिए नहीं की मसला ऐ कश्मीर आलमी तनक़ीद का मुद्दा बना बल्कि जैसा की हर बार होता है ईज़ा पेट में होती है दिखावा सरदर्द का।
भारत ने अपने खफा होने की वजह कश्मीर पर मुबाहिसे को नहीं बल्कि ऐवान में दौराने बेहेस भारत के नरेंद्र मोदी नामी शख्स के खिलाफ़ अदना दर्जे की ज़ुबान का इस्तेमाल किया गया था।
इसके अलावा भारत के ख़फ़ा होने की दूसरी वजह गुजरात २००२ के दंगों का ज़िक्र, बेहेस में किया गया।
अब भारत की तिलमिलाहट और बोखलाहट खुल कर वाज़े हो चुकी है, की कश्मीर, २००२, मुज़्ज़फ़्फ़रपुर दंगे, हिन्दू दहशत की ऐसी दुखती हुई नब्ज़ है जब उन को मज़ीद कही भी, दुनियां के किसी भी हिस्से से दबाया जाएगा तिलमिलाहट भारत में और उसके गुलाम जाएफरानी लंगूर-लँगूरनियों से साफ़ दिखेगी।
भारत अपने आपको दुनियां का अज़ीम और सबसे बड़ा जमुहरियत मानता है, लेकिन यह भूल गया की ज़ुबानी जमा खर्च से कोई सबसे बड़ा नहीं हो जाता।
वोह सक़ाफ़त और बड़े होने के गुण किसी भी वतन और इंसान को अदना या आला बनातें हैं।
भारत में आये दिन जमुहरियत का क़तल हो रहा है।
अमन से एहतेजाज करते हुए अवाम ख़ास मुस्लिमों पर पुलिस की गोलियां चलाई जाती हैं।
मज़हबी इन्तेहापंसदी हिन्दू अवाम में कूट कूट कर भर दी गई है।
हाल ही के अमेरिका दौरे पर जो ज़लालत और बेइज़्ज़ती मोदी की हुई है शायद तारीख के सफों में वोह सियाह लफ़्ज़ों में दर्ज हो चुकी होगी। नायब सदर कमला हेरिस ने भारत, मोदी और हिन्दू दहशत पर दुशाले में लपेट कर ऐसे ऐसे जूते मारे हैं की हर संघी, मोदी, बीजेपी की और ज़ाफ़रानी लंगूर-लँगूरनियों की तबियत हरी हो गई होगी। फिर भी अगर लंगूर और लँगूरनियाँ मोदी मोदी मोदी करतें हैं तो करते रहें। इन लोगों को जाहिल ही तस्सव्वुर किया जाएगा, अब पड़ा लिखा आला तालीमी अफ़्ता पकड़ कर पीटता थोड़ी है, दुशालों में ऐसी मार मारता है की समझने वाला समझ जाए की इशारा किस की जानिब है। यह तमाम ज़ाफ़रानी, बीजेपी वाले और लंगूरों की जमात वोह गधे हैं जिनके ऊपर किताबें तो लाद दी गई लेकिन उनके अंदर ज़हानत और इल्म नहीं आया।
नाज़रीन भारत के वज़ीरे आज़म लाख बड़ी बड़ी बातें कर लें की हम दुनियां के सबसे बड़े जमुहरियत है लेकिन हक़ीक़त को कैसे बदलेगें। कश्मीर को भारत अपना तस्लीम करता है लेकिन कश्मीरी अवाम पर ज़ुल्म, बर्बरियत, क़त्ले आम, कश्मीरी बच्चियों के लिए क्या ज़ेहनियत थी उस ७० साल के हरामखोर ज़ईफ़ वज़ीरे दरिंदा की। ऐसे ही आला ओहदों पर फ़ाइज़ नाजाइज़ ज़ईफ़ ज़ेहनियत ही मुस्लिम बच्चिओं के साथ भगवा जुर्म करने की तरग़ीब देतें हैं। भारत के ज़ुल्म की वजह से हर कश्मीरी के क़ल्ब को टटोला जाए तो वोह भारत के ज़ुल्म, बर्बरियत, क़त्ले आम के खिलाफ़ दिखेगा।
यहाँ तक की अब बात कश्मीर तक महदूत नहीं रह गई है, बरक़्स जो ज़ुल्म की दास्ताँ भारत की भगवा हुकूमत लिख रही है उससे तो ना सिर्फ कश्मीर बल्कि हिन्द की तारिख तब्दील होगी।
और कश्मीर की आज़ादी की नहीं अब तो तमाम हिन्द की आज़ादी की बात होगी।
यूं पी में मौलाना कलीम सिद्दीक़ी नाजाइज़ गिरफ्तारी किस जमुहरियत का हिस्सा है।
उसके ऊपर ऊल जलूल झूठे इलज़ाम की मौलाना साहब जादू टोना करते थे।
जादू टोना शैतानी अमलियत करना इस्लाम की रूह से हराम है।
अब यहाँ दो बातें होती है अगर एक सच्चा मौलाना है नमाज़ी परेहज़गार है, शरे का पाबंद है तो वोह कोई भी काम ग़ैर शराई नहीं कर सकता या कोई भी काम ऐसा नहीं करेगा जिससे की उसका मालिके हक़ीक़ी नाराज़ हो।
और अगर कोई भी शख्स ऐसा काम करता है जो इस्लाम की रूह से हराम है तो वोह अल्लाह के एहकाम पूरे नहीं कर सकता।
कियोंके अल्लाह उसको अपने नेक काम करने की हिदायत ही नहीं देगा, जब तक वोह अपने माज़ी के गुनाहों की तौबा नहीं कर लेता।
तो मौलाना साहब पर जादू टोना, शैतानी अमलियात के झूठे इलज़ाम लगना किस जमुहरियत का हिस्सा हैं।
आसाम में मुसलमानों पर गोलियों की बौछार करना फिर हलाक शुदा मुस्लिम अफ़राद पर उस संघी आतंक का उस मुस्लिम की लाश को कूद कूद कर मारना क्या इंसानी हुक़ूक़ की खिलाफ़वरज़ी नहीं है।
वैसे भी यह एक अक़वामे मुताहिदा का आलमी क़ानून है जब दो मुमालिकों के दरमियान जंग हो तो हलाक़ हुए फ़ौजिओं की जसत (लाशों) की बेहुरमती ना की जाए और उनको उनके अक़ीदे के हिसाब से सुपुर्दे नार या ख़ाक किया जाए।
और हिन्द तो इतना बड़ा इंसानी हुक़ूक़ का पैकर है की फौजियों पर नहीं बल्कि निहत्ते इंसानों की लाशों की बेहुरमती कर रहा है फिर दुहाई की हम इंसानी हुक़ूक़ के सबसे बड़े परोकार हैं।
लानत है, लानत है, लानत है।
कुल मिल कर इस मुद्दे का लब्बू लुबाब यह निकल कर आ रहा है की अब कश्मीर पर बात तो होगी लेकिन वोह कश्मीर तक महदूत नहीं रहेगी। बल्कि अब १९४७ के बाद उन तमाम आज़ाद मुस्लिम रियासतों की भी बात होगी जिनको भारत ने ज़ुल्म, शिद्दत मचा कर बंदूक के ज़ोर पर अपने अंदर मिला लिया था।
ऐसी १५ मुस्लिम आज़ाद रियासतें थी जूना गड से ले कर हैदराबाद और नवाब जावरा से ले कर भोपाल उन तमाम रियासतों पर भी बात होगी।
हमें एक और पाकिस्तान चाहिए नहीं तो पाकिस्तान की सरहदों की तोसीह। ।।पाक विस्तार।।





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