Thursday, 2 September 2021

ज़ाफ़रानियों और लंगूरों से होने लगी अदलिया ख़फ़ा।


आज कल अदलिया ज़ाफ़रानी दहशत, नाइंसाफी से सख़्त ख़फ़ा दिख रही है।  जंतर मंतर में हुए दहशतगर्द मश्क और १५ अगस्त यौमे आज़ादी के मौक़े पर, भारत को दहलाने, खून से लाल करने क़त्ले आम करने जैसे अज़्म के ऊपर अदलिया पहले ही अपना फैसला सूना चुकी है, और तमाम दहशतगर्द सलाखों के पीछे पहुंच गए हैं।  साल २०२० में जिस हिसाब से हिन्दू दहशत से दिल्ली देहल उठी थी, ताहम पुलिस की कारगरदेगी के ऊपर अदलिया का हाल ही में आया हुकुम क़ाबिले तारीफ है।   

इस बार अज़ीम अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियों को बरहना कर के थ्रीड डिग्री ट्रीटमेंट दिया है।   जी हाँ नाज़रीन जिस अंदाज़ में ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियों ने तब्लीगी जमात पर बरहना रक़्स किया था उस मीडिया रिपोर्टिंग को ले कर सुप्रीम कोर्ट बेहद ख़फ़ा है। 

अदालत ने इस मामले पर फ़िरक़ावराना ज़हर घोलने और इस मुद्दे को मुत्तसिब रंग देने पर सख़्त तनक़ीद की है।  चीफ जस्टिस एन वी रमन ने इस मुद्दे पर ज़ाफ़रानी मीडिया के आउटलेट्स की रिपोर्टिंग पर नाराज़गी ज़ाहिर की है।  मज़ीद अदालत ने पुछा मुझे यह नहीं समझ आ रहा है की हर मुद्दे को मुत्तसिब रंग और मज़हबी जामा क्यों पहनाया जा रहा है। 

सी जे आई कुछ मीडिया के सहाफियों की जानिब से तब्लीगी जमात पर ना ज़ेबा कलेमात, निहायत ही अदना दर्जे की बदज़ुबानी और तोहीने मज़हबी पेशवा (मौलाना) पर दाख़िल दरख़्वास्त की समात कर रहे थे।  सी जे आई ने मज़ीद कहा मुझे समझ नहीं आ रहा है यह क्यों हो रहा है और क्यों हर मुद्दे को फ़िरक़ावाराना रंग दिया जा रहा है। 

सीजेआई ने मज़ीद कहा ऐसा लगता है वेब पोर्टल किसी के क़ाबू में नहीं हैं।   जिसके जो समझ में आता है वोह चलाता है।   उनकी कोई जवाबदेही नहीं है।  अदालत ने ज़ाफ़रानी मरकज़ से सवाल किया, क्या आपके पास इसका कोई हल है।   आपके पास इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और अखबारों के लिए तो बेहतर एहतेमाम है लेकिन वेब पोर्टल के लिए भी कुछ करना होगा।  

अदालत ने कहा कि न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी (NBSA) ने 2021 के क़वानीन को चैलेंज करें, क्योंकि ये क़वानीन मीडिया को आज़ादाना और अवाम के हुक़ूक़ के दरमियान बैलेंस नहीं करतें हैं।  

हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल तमाम दरख़ास्त पर ६ हफ़्तों के बाद समात होगी।

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