अज़ीज़ नाज़रीन,
हक़ का एक और ज़ोरदार तमाचा ज़ाफ़रानी तंज़ीम भारतीय जनखा पार्टी के मुँह पर रसीद हुआ है। यह की त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बरोज़ मंगल अपने उत्तराखंड के वज़ीरे आला के ओहदे से इस्तीफा दे दिया है। नाज़रीन अब ज़रा पिछले साल इस मार्च - अप्रैल वक़्त को देखतें हैं, तो यही उत्तराखंड के वज़ीरे आला थे जो संघी दहशत और ज़ाफ़रानी लंगूर लँगूरनियों के वसवसों, साजिशों का शिकार हो कर तब्लीग़ी जमात पर तोहमत तराशी कर रहे थे। झूट फरेब फैला रहे थे उत्तराखंड में एक ही रोज़ में १५०० जमाती करोना वबा से मुत्तासिर पाए गए। इतना ही नहीं ऊल जलूल क़ानून बनाने की वकालात कर बैठे थे। इन महाशय के ऊपर इस सहाफी ने कई कमेंट तब आज तक में दिए थे। और अब नतीजा भी मिल गया। इनकी कुर्सी गई जिसके ऊपर बोहोत ही पोंगाते थे।
त्रिवेंद्र सिंह रावत ने शाम बेबी प्रसाद मौर्य से मुलाक़ात की और अपने ओहदे से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद सिंह ने एक सहाफी इजलास को ख़िताब किया, लेकिन फिर वही बेकार की लायानी बातों में वक़्त को बर्बाद किया और हक़ बात बताना ही भूल गए। उन्होंने यह तो बताया की वोह लम्बे वक़्फ़े से बीजेपी में रह कर सियासत कर रहें हैं और गुजिश्ता ४ सालों से वज़ीरे आला के ओहदे पर फ़ाइज़ है, उन्होंने मज़ीद कहा की वोह तवक़्क़ो भी नहीं कर सकते थे की सूबे की क़यादत उनको मिलगी। जब इतना सब ठीक ठाक चल रहा था तो पस्ती और ज़वाल की क्या वजह थी। यह बताना वोह भूल गए।
नाज़रीन में बताता हूँ उनके पस्ती की क्या वजह थी गुजिश्ता साल
मार्च अप्रैल में यह वही त्रिलोक सिंह थे जिन्होंने मरकज़ निज़ामुद्दीन और तब्लीग के
ऊपर लांछन लगाए थे और झूठी सच्ची बातें सहाफी इजलास में कही थी। उत्तराखण्ड में २५०० जमातिओं को गिरफ्तार किया
गया है वोह करोना वबा फैला रहे थे और साजिश में मुलव्विस थे। इतना ही नहीं मौलाना साद साहब पर भी टीका टिपडी
की थी। बस हो गया वाटोला।
नाज़रीन इस बात को नक़्श और ज़हन नशीन कर लें जिस जिस अफ़राद ने
मुस्लिम हक़ तलफी की है मुस्लिम अवाम के साथ ना इंसाफ़ी की है उसकी मौत उसके पीछे पीछे
भाग रही है। उसको दौड़ा दौड़ा कर एनकाउंटर किया
जाएगा। जैसा की खाकी दहशत १९९३ के बाद मुस्लिम
अवाम को झूठे सच्चे केसेस में मुलव्विस कर के पहले बोलते थे चल भाग और पीछे से भागते
हुए मुस्लिम बेगुनाह नवजवान को गोली मार देते थे। #ख़्वाजा यूनुस
नाज़रीन जैसा की तवक़्क़ो की जा रही है अभी तो और बड़े बड़े फैसले होना बाक़ी हैं। जिसमे इन्साफ की साफ़ तौर पर तस्दीक़ होते हुए देखी जा सकती है। जिस जिस ने दिल्ली दहशगर्द हमलों की इब्तेदाह की थी "गोली मारो" नारों से और जिस जिस ने दहशत फैलाई थी उनका तो एनकाउंटर होगा और ज़रूर होगा।
लगता है मोदी इन्तेज़ामियाँ गोली मारो सालों के फलसफे पर काम कर रही है। और अगर नहीं किया तो आलमी सिफारती दबाओ के आगे करना होगा। जिस जिस ने मुस्लिम अवाम को मौत के घाट उतारा है अब उनकी बारी है। चाहे वोह कपिल मिश्रा हो या रागिनी तिवारी या कोई और। कोई और का मतलब समझ गए ना। कोई भी हो मारा जाएगा। चाहे वोह किसी ख़ास सूबे का वज़ीरे आला हो या मरकज़ी वज़ीर अगर कुछ भी ग़लत किया है तो सज़ा भोगने को तैयार रहे।
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