हक़ और इन्साफ की जंग में हर एक मुनाफ़िक़ और ग़द्दार को शिकस्त देने के लिए बारी इलाह अपने मक़बूल और पसंदीदा बन्दों का इन्तेख़ाब कर ही लेता है। हर दौर में ज़ालिमों, ग़द्दारों, क़साइयों को जो झूठी सच्ची फरेबी बातों पर आला अदालत का वक़्त और पैसा बर्बाद करतें हैं ऐसे फरेबी झूठी अनासिरों को उनकी ही ज़ुबान में जवाब देने कोई हक़ वाला इन्साफ वाला खड़ा होता है। हक़ और इन्साफ की जंग लड़ने वाले वकीलों में भानुशाली, मेहमूद पराचा के साथ साथ अगर प्रशांत भूषन का नाम नहीं लिया तो यह उनके हक़ और इन्साफ के लिए जद्दो जेहद और इन्साफ की जंग की तौहीन होंगी। ऐसे हक़ पसंद वुक्ला का इन्साफ, क़ानून और दस्तूर के दायरे में किया हुआ अमल ही उस मुनाफ़िक़ के ज़ख्मों पर नमक रगड़ने का काम करेगा, जो झूटी और फरेबी बात पर अदालत का वक़्त बर्बाद करता है।
ऐसे ही आतिशी मुद्दे पर प्रशांत भूषन फिर से मुनाफ़िक़ों को अंगार लगाने आ पहुंचे हैं। ताज़ा मामले में उनका रोहिंगिया मुहाजरीनों के हक़ के लिए क़ानूनी जंग लड़ना उस ग़द्दार के ज़ख्मों पर सख़्त नमक रगड़ने के लिए काफी है। उन्होंने आला अदालत में दरख़्वास्त (पेटिशन) दायर की जम्मू की जेल में हिरासत रखे गए १५० से ज़ाइद रोहिंगिया को रिहा किया जाए और उनकों मुल्क बदर करने से रोका जाए।
जिस तरह से संघी दहशत, शिद्दत पसंदों ने उस ग़द्दार के आला अदालत झूठी और फरेबी बातों
पर गुमराह करने जैसे अमल को सोशल मीडिया पर वायरल किया था,
अब प्रशांत भूषन का नाम हक़ और इन्साफ के सोशल मीडिया पर ट्रेंड
होने लगा है। ट्वीटर पर बरोज़ हफ्ते (सनीचर) सुबह ११ बजे तक
प्रशांत भूषन को लेकर ७००० से ज़्यादा ट्वीट्स किये जा चुके थे।
प्रशांत भूषन को संघी, शिद्दत पसंद काफिर, बीजेपी वाले और उसका वोह हमख़याल मुनाफ़िक़ ज़बरदस्त गाली गलोच और
बूरा भला बोल रहा है। लेकिन यह उनके लिए कोई
नई बात नहीं है ऐसे वोह पहले भी देख चुके हैं।
जब जब हक़ और इन्साफ की जंग का उन्होंने परचम बुलंद किया है तब तब ना इन्साफ,
ग़द्दार, क़ातिलों ने उनको बूरा भला बोला है।
यह बात तो ते है अब प्रशांत भूषन आला अदालत में एक एहम नाम तस्लीम किये जातें हैं और वोह पाली नरीमन, मरहूम राम जेठमालानी की फेहरिस्त से आगे पहुंच चुके हैं। फिर जिस मुद्दे पर प्रशांत जैसे वकील पैरवी करेगें तो सुप्रीम कोर्ट को भी बोहोत ही मोहतात रह कर फैसला देना होगा। क्योंकि इससे पेश्तर प्रशांत के कई केसेस में सुप्रीम कोर्ट मुतनाज़ा और एक तरफा फैसले को आलमी और क़ौमी सहाफियों ने बरहना कर दिया था। जब जब हक़ और इन्साफ की जंग में सुप्रीम कोर्ट ने इन्साफ का क़त्ले आम किया है और मुक़ाबिल अगर जिरह करने वाले वकील प्रशांत भूषन थे तो अदालत के फैसले की धज्जिया सहाफियों ने उड़ा कर रख दी थी।
भाजपा ने उस ग़द्दार को हाल ही में होने वाले एहम इन्तेख़ाब को देखते हुए खड़ा किया था और ऊल जलूल पेटिशन दायर करवाई थी लेकिन अब रोहिंगिया का मसला उसका तोड़ होगा।
यह बात तो ते है आने वाले दिनों में ज़ाफ़रानी महाज़ हर क़िस्म के गुनाह बदकारी हरामख़ोरी के साथ इन्तेख़ाब को मुतासिर कर जीतने की हिकमत करेगी। लेकिन अगर अवाम तालीमी आफ़ता है, ज़हीन हैं तो वोह गुजिश्ता ७ सालों की मुल्क की हालत पर ग़ौर कर के ही वोट करेगें। जिस उत्तर प्रदेश को कब्रस्तान और शमशान, ईद दिवाली, के नाम पर फ़िरक़ावाराना कर दिया था आज उस सूबे की क्या हालत है। आमवात है की रुकने का नाम ही नहीं लेती हैं। जुर्म, क़त्ल, डाका ज़नी, ज़िना बिल जब्र, गिरोह गरदाना ज़िना, फ़िरक़ावाराना ज़ेहनियत और ऐसे तमाम मामलों में भारी इज़ाफ़ा हुआ है जिसको रोकने की कस्मे खा कर साधू महाराज गद्दी नशीन हुए थे।
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