ब्रतानियाँ में मुक़ीम पाकिस्तानी एक्टर रिज़वान अहमद अपनी फिल्म 'साउंड ऑफ मेटल' (Sound Of Metal) के लिए ऑस्कर अवॉर्ड में बेस्ट एक्टर के लिए नामज़द किये गए हैं। रिज़वान अहमद को ऑस्कर के लिए नामजद होना पाकिस्तान के लिए एजाज़ है, क्योंकि वोह तमाम आलम में पहले मुस्लिम एक्टर हैं जो ऑस्कर के लिए नामज़द हुए। पाकिस्तान और मुस्लिम नाम आने से हिंदुस्तान के कई मुनाफ़िक़ों, मक्कारों और मुल्हिद ख़ातूनों को अंगार लग गई है। अगर यही कोई हिंदुस्तानी कारगरदेगी करता तो मुबारकबाद का तांता लग जाता है। यही गंदगी और ख़बासत जो भरी है इन काफिरों के ज़ेहनों में उसको खुरच खुरच के निकालना पडेगा। सऊदी अरब में ख़ास मक्का और मदीना में उस दहशतगर्द मुसलमानों और इस्लाम से दुश्मनी रखने वाले शिद्दत पसंद कनाडा के शहरी की पहली फिल्म रिलीज़ होती है तो भारत में खुशिया मनाई जाती हैं। वहीँ पाकिस्तानी एक्टर ने कुछ अच्छा किया तो अंगार लग रही है।
पाकिस्तान और पाकिस्तानी हर महाज़ में सदा से भारत से दो क़दम आगे हैं। अब भले ही शिद्दत पसंद हिन्दू, संघी और बीजेपी वाले इस बात को तस्लीम ना करें और पाकिस्तान का मज़ाक़ बनाएं लेकिन हक़ीक़त से कैसे मुँह छुपायेगें। फौजी कारगरदेगी, इन्साफ, खेल कूद, माशी तरक़्क़ी, तालीम, ज़हानत, मुतमईन अवाम। इस ज़िम्न में एक और तरक़्क़ी पाकिस्तान के नाम के साथ जुड़ गई है।
यह बात तो साबित हो चुकी है की जितनी ज़हानत पाकिस्तानी अवाम
में है उतनी ही जहालत भारत के अवाम में है।
भले ही भारत का अवाम अपने आपको आला तालीम आफता तस्लीम करता रहे और पाकिस्तानियों
का मज़ाक़ बनाये लेकिन भारत के अवाम की मिसाल उस गधे के जैसी है जिसके ऊपर किताबें तो
लादी गई हैं लेकिन ज़हानत उसमे नहीं आई। उसको
तो वही गधा हम्माली और ग़ुलामी करना है। अगर भारत के अवाम
में ज़हानत होती तो तमाम आला तालीमी आफता डॉक्टर्स, इंजीनियर्स, ओ.एन.जी.सी. के डायरेक्टर्स, सहाफी, एम.बी.ऐ.,
बी.टेक, एम.टेक, मुसन्निफ़, शायर अपने अपने नामों के आगे फ़ख़्र से चौकीदार नहीं लगाते। दूसरी बात एक शख़्स के तमाम सियाह कारनामे अवाम
के सामने नुमाया हो गए फिर भी उसको इन्तेख़ाब में लाया गया। अब आज अंधेरों में आंसू बहा रहें हैं। ऐसी गधों वाली ज़हानत से पाकिस्तानी जाहिल पंचर बाज़ (रफ़ीक पंचरवाला) लेकिन ज़हीन
अच्छे जो एक ही झटके में दिखा देतें हैं की हम ज़हीन हैं,
और एक क़ाबिल पड़े लिखे शख़्स को वज़ीरे आज़म मुंतख़िब करतें हैं।
यही फ़र्क़ होता है अपनी मेहनत पर इल्म हासिल करने में और जालसाज़ी, साजिश, चीटिंग कर के पास होने में। तालीम से इंसान तरक़्क़ी, टेक्नोलॉजी, फलसफे, मिंतक़ की जानिब सोचता है, वहीँ चीटिंग कर के पास हुआ चौकीदारी कर उसके शाना बा शाना ताली बाजाता है थाली पीटता है और फूल बरसाता है।
हिंदुस्तान की तारीख़ गवाह है उसकी इब्तेदाह तो टुकड़ों टुकड़ों
से हुई थी। अगर मुग़ल और मुस्लिम बादशाह नहीं आतें तो अभी तक तमाम शिद्दत पसंद इक़्तेदार
के लिए एक दुसरे का ख़ून ख़च्चर कर रहे होते, फिर मुस्लिम बादशाहों मुगलों ने तमाम टुकड़े जम (मिला)
कर एक मुल्क बनाया और उसको नाम दिया हिन्दुस्तान। मुस्लिम बादशाह इक़्तेदार में थे,
चाहते तो कोई भी इस्लामिक नाम दे सकते थे। उसके बाद झूटन खाने के जैसे कोई भी साधू या गुलाम
हाकिम उस नाम को बदलने की कवायत करता फिरता, लेकिन उन्होंने अपनी रियाया के जज़बात की क़द्र करते हुए उसका
नाम हिंदुस्तान दिया क्योंकि उनकी मिलकियत में भी उस वक़्त हिन्दू अक्सरियत थी और किसी
भी हिन्दू को तलवार के ज़ोर पर मुस्लिम नहीं बनाया गया था। जैसा की ज़ाफ़रानी हुकूमत में होता है,
तलवार गर्दन पर रख कर बोला जाता है बोल जय जय…………. नहीं तो काट डालेगें। इतना ही नहीं तलवार रख कर हिन्दू बनाया जा रहा
है, जो कमज़ोर
है बेबस है वोह तो उनसे डर जाते हैं लेकिन जो सख़्त हैं अपने मज़हब पर ही चलते हैं।
एक छोटे से किस्से के साथ अपनी बात ख़तम करूँगा। एक आला तालीमी आफ़्ता तस्सव्वुर किया जाने वाला भारतीय चौकीदार डॉक्टर, चौकीदार इंजीनीर, चौकीदार एम.बी.ऐ. जैसा और एक जाहिल तसव्वुर किया जाने वाला पाकिस्तानी जा रहें थे। अब आला तालीमी भारतीय भक्त के पैर में कुछ गंदगी लगी। उसने उसको हाथ से छूआ और चखने की कोशिश की दूसरी रिवायत में आता है नाक पर लगा कर सूंघा। वोह मेला था। तो अपने आपको बोहोत ही अक़लमंद समझना बेवक़ूफ़ लोगों की अलामत है "जाओ आज बादल हैं पाकिस्तानी तुमको नहीं देख पाएंगे हमला कर दो" ऐसी सोच तीन जगह मेला लगाती है। एक पैर में दूसरा हाथ में और तीसरा मुँह में या नाक में।
वहीँ अनपढ़ जाहिल तसव्वुर किया जाने वाला पाकिस्तानी (पाकिस्तानी पंचरवाला) जाता है और उसके पैर में गंदगी लगती है तो वोह उसको वहीँ पैर से कुचल कर मसल कर रगड़ कर आगे बढ़ जाता है। और ऐसा कर के वोह एक ही जगह लगाता है। जबकि भारतीय तीन जगह मेला लगाते हैं।
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