अज़ीज़ दीफाई फौजियों,
आज का ख़िताब ख़ास आप लोगों के लिए वक़्फ़ है और उसपर अमल दरकार
है। जिस तरह के हालात हिन्द में चल पड़ें हैं
और २०१४ के बाद जिस तरह का बरहना रक़्स दहशतगर्दों ने भारत में मचाया है वोह तारीख़ की
किताबों में सियाह अलफ़ाज़ में दर्ज हो चूका है।
जून २०१४ में पूना के कंप्यूटर टेक मोहसिन शैख़ की पहली हूजूमी दहशत से शहादत
से ले कर जान-फेब २०२१ में किसानों पर जदीद झलियावाला बाग़ और गोली बारी तक तमाम ज़ुल्म,
ज़ाफ़रानी दहशत, फ़िरक़ापरस्ती सब कुछ दर्ज हो चूका है।
अज़ीज़ फ़ौजिओं इन सब मामलात में ज़ाफ़रानी हुकूमत और दहशतगर्द उतने ज़िम्मेदार नहीं है जितने की ज़ाफ़रानी लंगूर-लँगूरनियाँ, और उनकी ज़ेहनी दहशत। क्योंकि दहशतगर्दों ने इन लंगूर-लँगूरनियों को ही फ़रोख़्त कर लिया था, फिर जो कुछ भी सियाह सफ़ेद होता उसपर यह तमाम लंगूर ख़ामोशी इख़्तेयार कर लेते थे। वहीँ कुछ भी झूटी सच्ची फरेबी ख़बर यह दहशतगर्द इस्लाम, मुस्लिम, पाकिस्तान, कश्मीर, फलस्तीन की निस्बत से चलाने को कहते तो उसको बढ़ा चढ़ा कर मिर्च मसाला तैयार कर के हर रोज़ की ब्रेकिंग न्यूज़ बना लंगूर-लँगूरनियाँ अवाम की ज़ेहनी दहशत मचा डालते थे।
मुसलमानों, मस्जिदों, मदरसों, पाकिस्तान, कश्मीर के ख़िलाफ़ महज़ ७ सालों में जितना झूट फरेब पर मब्नी ज़हर
और आलूद इन लंगूरों ने हिन्दू अवाम के ज़ेहनों में भरा था शायद उतना तो आज़ादी के ७०
सालों में भी नहीं भरा गया होगा। हिन्दू अवाम
के ज़ेहनों में फ़िरक़ापरस्ती थी लेकिन वोह खुल के बहार नाही आती थी। और जो कोई
भी शिद्दत पसंद था वोह अपनी ज़हनों की ख़बासत और नजासत अवामी हल्क़े में खारिज नहीं कर
पाता थ। और अगर उसने ऐसी कोई भी झूटी सच्ची बातों को किसी सहाफी इजलास में खारिज किया
या अपने ज़ेहनी फुतूर को अवामी हल्क़े में दिखाने की कोशिश की तो फ़ौरन उसके ऊपर अमल दरपेश
होता था।
लंगूर-लँगूरनियों के भरे हुए उस ज़हर का नतीजा क्या हुआ,
जो हिन्दू मुस्लिम सदियों से एक हम साये के जैसे एक दुसरे के
सुख दुःख के हामी होते थे वही एक दूसरे के दुश्मन बन गए। इस नफ्सा नफ़्सी में फायदा किस का हुआ,
ज़ाफ़रानी तंज़ीम और उससे जुड़े हुए संघी,
शिद्दत पसंदों का। एक
आम भारतीय जो २०१४ के बाद इन लंगूर लँगूरनियों की ज़हर अंगेशी में आ कर नया नया संघी
बना था उसका तो वाटोला हो गया। क्योंकि अगर
आज पेट्रोल, डीज़ल,
गैस, सब्जी भाजी, दाल दलीया,
मॉस मच्छी मॅहगी हुई है तो वोह सिर्फ मुस्लिम अवाम के लिए थोड़ी
हुई है वोह तो सभी के लिए हुई है। अगर आज
नौकरी से मुलाज़िम निकाले गए है तो वोह सिर्फ मुस्लिम थोड़ी बल्कि आम हिन्दू भी निकाले
गए। वैसे भी संघी ज़हर तो मुस्लिम अवाम को
पंचार बाज़ बोलता था। उनकी तो पंचर की दूकान
अभी भी अच्छी चल रही है और अब तो पेट्रोल डीज़ल मेहगा होने से खूब चलेगी। बर्बादी किस की हुई आम हिन्दू की हुई। जो भी हिन्दू खलीज मुमालिकों में काम करते थे,
मग़रिबी मुमालिकों, अमेरिका में काम करते थे तिजारत थी उनमे से कमो बेश ६० फीसद
निकाल दिए गए या बेरोज़गार हो गए।
ज़ाफ़रानी लंगूर लँगूरनियों ने कश्मीर और कश्मीरियों के ख़िलाफ़
इतना ज़हर भर दिया था की हर दूसरा कश्मीरी भारत में दहशतगर्द लगने लगा। इस मुद्दे पर २०१५ के आस पास अंग्रेज़ी में एक मज़मून
लिखा है। और यही बात कही है कभी गलती से बॉम्बे
में लोकल के अंदर कोई आम कश्मीरी सीधा साधा नौकरी की तलाश में आया और बोल दे में कश्मीरी
हूँ तो तमाम अवाम ख़ौफ़ज़दा हो जाता है फ़ौरन पुलिस आ जाती है तहक़ीक़ात शुरू हो जाती है। वहीँ उल्फा या आसाम लिबरेशन आर्मी का कोई हक़ीक़ी
दहशतगर्द लोकल में सफर करे और बोले में आसाम से हूँ तो अवाम पर उसका कोई असर नहीं होता
है। पत्थर बाज़ दहशतगर्द बोल बोल के तमाम सूबे
और वहां की अवाम को बर्बाद कर दिया।
फिर जो हक़ीक़ी सवाल हुकूमत से हूकूमती नुमाइंदों से करने चाहिए
थे हर मुद्दे पर मुख़ालिफ़ों से सवाल।अरे हुकूमत
मुखालिफ थोड़ी चला रहे हैं, वोह तो ज़ाफ़रानी महाज़ चला रही है। लेकिन
कहीं हक़ीक़ी सवाल करने पर भाजपा का वोट बैंक कमज़ोर ना पड़ जाए तो सवाल होते थे मुख़ालिफ़ों
से और हर मुद्दे को मुख़ालिफ़ों की जानिब मोड़ दिया जाता है की वोही हुकूमत को काम नहीं
करने दे रहें हैं। ऐसा पेश किया जाता था की
तमाम कारगरगेदी मुख़ालिफ़ों की है। हुकूमत तो
अपना काम अच्छे से कर रही है।
आज महज़ ७ सालों में
भारत की जो हालत है उसके लिए महज़ ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियाँ ज़िम्मेदार हैं। यह लोग सहाफी नहीं बल्कि दहशतगर्दों के सिलीपर सेल
के जैसे काम कर रहे थे। हर मुद्दे पर दहशतगर्दों
को मेहफ़ूज़ करना और हक़ पसंद इंसान को ही क़त्ल करने की क़वायत और ख़बर चलाना। माहौल ऐसा बनाना की एक हीरो ज़ीरो हो जाए और जो दहशतगर्द
है वोह सदन में पहुंच जाए। फिर भी अपनी ५६
इंची छाती चौड़ी कर के बोले की महात्मा का खून गोडसे ने सही किया था।
आज भारत के जो हालात हैं उसके लिए सिर्फ और सिर्फ ज़ाफ़रानी लंगूर
और लँगूरनियाँ ज़िम्मेदार है, अगर उन्होंने अपने फ़र्ज़ के साथ ग़द्दारी ना की होती और वक़्तन
फा वक़्तन हुकूमत को उसके किये हुए ग़ैर ज़रूरी फैसलों पर कटघरे में खड़ा किया होता जो
डेबिट झूटी सच्ची बातों पर की जाती थी बजाये उसके असली और ज़रूरी मुद्दों पर हूकूमती
नुमाइंदों से की जाती तो आज वतन के हालात कुछ और होते।
दीफाई फ़ौजिओं तुम्हारे ऊपर लाज़िम है की हर लंगूर और लँगूरनियों
को गिरफ्तार करो और उसका सर क़लम कर दो। असल
में यही गद्दार, और दहशतगर्दों
के मुहाफ़िज़ और उनकी बोली बोलने वाले ऐसे अनासिर हैं जो कभी भारत के हो ही नहीं सकते। इनका क़त्ल तुम्हारे ऊपर हलाल है। क्योंकि इनको पैसा दे कर दहशतगर्दों की जानिब से
खरीदा जाता था, अगर वक़्त
पर ही यह लोग वतन के साथ ग़द्दारी करने के किसी भी अमल का इंकार करते और हक़ीक़ी खबरे
बताते तो आज भारत के हालात कुछ और होते।
लेकिन इन्होने पैसों में बिक कर वही खबरे चलाई जो दहशतगर्दी
को फ़रोग़ देती थी। कुछ अच्छे और साफ़ दिल सहाफी भी ज़ाफ़रानी मीडिया में
मौजूद हैं। जो अपने फ़र्ज़ के साथ ग़द्दारी नहीं
करते और हक़ खबरे बताते हैं, ऐसे सहाफियों को दिल से सलाम है। जैसे
आज तक पर मौजूद साहिल जोशी, सईद अंसारी।
इनकी मोहब्बत मुल्क और भारतीय फौज से भी फरेबी और झूठी है अगर
इनकी मुल्क और फौज की मोहब्बत के दरमियान दहशतगर्द आ गए तो इनकी ज़ुबान से सच्चाई के बजाये
दहशतगर्दों के लिए मीठे अलफ़ाज़ निकलेंगे भलें ही फौज की इज़्ज़त और वक़ार पर बात क्यों
ना आ जाए। एक स्वेता सींग पुलवामा के बाद पाकिस्तान
से जंग में फौज की खूब हौसला अफ़ज़ाई करती थी, फौजी कपडे पहन कर फौजी चौकियों की नुमाइश भी खूब करती थी ऐसा
दिखाती थी की वही अकेली फौज की हमदर्द है बाक़ी सब बेकार। फिर वही हमदर्दी नफरत में बदल गई जब चीन ने घुसपैठ
की अब बारी फौज की हिमायत की नहीं थी बल्कि आतंकवादिओं को बचाने की थी। क्योंकि अब इज़्ज़त आतकवादिओं की उतरने वाली थी।
फिर क्या था दहशतगर्दों और फौज की मोहब्बत
में बाज़ी दहशतगर्द ले गए और फौज हो गई निकम्मी नाकारा।
किसी ने मोदी सरकार पर चीन की घुसपैठ पर सवाल उठाया तो यही स्वेता सिंह तिलमिला
उठी और बोलती है की अगर चीन की जानिब से घुसपैठ हुई है तो उसमे सरकार कहाँ से ज़िम्मेदार है बल्कि फौज ज़िम्मेदार है फौज
ने अपना काम अच्छे से नहीं किया अब मोदी जी थोड़ी सरहद पर जा कर चीन से जंग करेगें वोह
तो फौज का काम है। वह क्या बात है। बालाकोट हो तो मोदी की कारगरदेगी,
घुसपैठ हो तो फौज निक्कम्मी।
कुल मिला कर इन लंगूर लँगूरनियों का वतन के साथ ग़द्दारी, दहशतगर्दों से मिली भगत, हर दहशतगर्दाना हमले के बाद असली दहशतगर्द को मेहफ़ूज़ करने मतलब सुबूतों को मिटाने का जुर्म साबित हो चूका है। पैसे और गिफ्ट ले कर न्यूज़ चलाने का जुर्म भी बनता है और इन सब की सज़ा है मौत। फ़ासी या गर्दन क़लम की जाए। जितना नुकसान इन लंगूर लँगूरनियों ने मुल्क का किया है उतना तो शायद दहशत से भी नहीं हुआ होगा।
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