Wednesday, 3 March 2021

दहेज़ एक लानत

आपसे गुज़ारिश है पूरे मज़मून का मुताला करें।

अज़ीज़ाने मिल्लते इस्लामियां और क़ौम के नवजवान बच्चों।   

आज का मौजूं बेहद संगीन मुद्दे 'दहेज़ की लानत' पर मुश्तमिल है, जिसको यह सहाफी क़ौम के नौवजवान बच्चों से मुख़ातिब हो कर अपनी अज़वाजी ज़िन्दगी के कुछ पहलुओं के साथ आप हज़रात से साँझा करना चाहेगा।       

नाज़रीन आज का मौजूं भारी दिल के साथ लिखने पर मजबूर हूँ, अहमदाबाद में जो कुछ भी हुआ उस हादसे और उसकी कैफियत देख कर इस सहाफी के पास अलफ़ाज़ नहीं हैं जिनको अपने क़लम की रोशनाई से रोशन कर सके।  ऐसे हादसात ज़र क़ौम और मिल्लत में होतें हैं तो उसकी तलाफ़ी क़त्तई नहीं हो सकती।  उसकी दो वजूहात हैं, एक वोह बच्ची अब वापिस लौट के नहीं आ सकती और जो ख़ुदकशी जैसा आख़िर क़दम उसने उठाया अब वोह ना उठाया जैसा हो नहीं सकता।   और इन दोनों गुनाहों का कफ़्फ़ारा अब उस नामर्द शौहर, उसके वाल्देन और दिगर अफ़राद को देना होगा।

नाज़रीन आज को दौरे हाजरा में उम्मते मुस्लिमा में शादी को एक ऐसा मुश्किल अमल बना दिया है जिसकी वजह से कई बच्चियां अपने घरों में बैठी हैं।   फ़िज़ूल की रसूमात, लायानी बातें उसके लिए बच्ची के वाल्दैन जद्दो जेहद में लगे होतें हैं।  पहले वोह ज़रूरी है नहीं तो निकाह नहीं होगा।  यह क्या बात हुई।  ज़रूरी निकाह है जिसके लिए महज़ दो गवाह लड़की की जानिब से और दो लड़के की जानिब से और उसकी तस्दीक़ करने वाला कोई आलिमे दीन इजाब क़ुबूल की गवाही दे सके, तमाम माज़ी के गुनाहों को माफ़ करवा कर अल्लाह से निकाह के ख़ैर होने, मुस्तक़बिल में ख़ुशहाल ज़िन्दगी की दुआ करे, बस हो गया निकाह।   अब मर्द और औरत एक दुसरे पर हलाल और जाइज़ हैं।  तो बात वही है, ज़रूरी क्या है निकाह, ना की ग़ैर ज़रूरी लवाज़मे लबादे जो हमने इख्तियार किये हुए हैं.  जहाँ तक उपटन या हिना का सवाल है तो उसको लगाने में कोई हर्ज नहीं, क्योंकि पहली दफ़ा दो मुख़्तलिफ़ जिस्म आपस में मिलेंगे तो बदबू की वजह से दोनों के दरमियान किसी किस्म की बदगुमानी ना आना चाहिए.  दूसरी बात पाकी और साफाई का हुकुम हमारे नबी की सुन्नत है. तो ऐसा करना जाइज़ है. हर अमल को करने में नियत वही सुन्नत वाली होना चाहिए।  

लेकिन हो क्या रहा है आज के दौर में लड़के वालों की जानिब से एक लम्बी फेहरिस्त लड़की के वाल्दैन को थमा दी जाती है।  दहेज़ तो एक अलग मसला है, कमों बेश तमाम खानदान के अफ़राद के लिए अहेर इख़राजात का ज़िक्र होता है।  जो लड़की के वालिद को करना होता है।  एक बाप ने अपनी जवान लड़की तुम्हारे हवाले कर दी यह क्या किसी दहेज़ और दुनियां के असासे से कम कीमती है।  उस बच्ची के सामने तमाम आलम के असासे कमतर होना चाहिए, जो आपके निकाह में आ गई।  जो बच्चियां पड़ी लिखी हैं क्या उनकी पढ़ाई लिखाई का फायदा अब उसके वाल्दैन को होगा या शोहर और उसके एहले ख़ाना को होगा।    फिर दहेज़ दान किसलिए। 

नाज़रीन यह सहाफी अपनी ज़िन्दगी के कुछ पल आप हज़रात के साथ बांटना चाहेगा।  अल्लाह की हिकमत बन्दे को देर से समझमे आती है।   लेकिन अल्लाह के हर काम में कुछ ना कुछ मस्लेहत होती है। ०५ मई १९९७ में जब इस सहाफी का निकाह ते होना क़रार पाया था, तब वोह पूरी तरह से दुनयावी दाढ़ी मुंडा एक आम इंसान की तरह सोच रखने वाला बन्दा था।  तालीम अपनी जगह है लेकिन निकाह से क़ब्ल अल्लाह ने हिदायत दी और निकाह शरे से हुआ।  बेपनाह खर्चा करने और तमाम रिश्तेदारों को बुलाने की ख़्वाहिश को अल्लाह ने महदूत किया और चाह कर भी तमाम रिश्तेदार ना आ सके और महज़ दो भाई एक बड़ा एक छोटा दो बेहेने और उनके खाविंद एक वालिद को ले जा कर निकाह किया एक सुन्नत और अदा हो गई। अल्लाह ने उस सादगी के निकाह का वोह अजर दिया की ८ साल बाद इस सहाफी को अपने पीरो तरीक़त के तुफैल रूहानी फैज़ मिला।  आज हालात एक दम अलहदा हैं। 

दूसरी किस्सा जब मेरे बड़े फ़रज़न्द का पहला क़ुरान ख़तम हुआ तब भी पीरो मुर्शिद आये हुए थे, और घर पर नशरा रखा था।  अब बच्चे के क़रीबी अज़ीज़ अक़ारिब फोटो शूट करने, फूल हार पहनाने, मिठाई खिलाने पर ज़्यदा तवज्जो दे रहे थे।  मुर्शिद ने टोंका और कहा यह ज़रूरी नहीं है, ज़रूरी है हमारे पास से बच्चे को क़ुरान की आयात पढ़वाई जाए जिसका के वोह हक़दार है।  फिर उन्होंने बच्चे को अपने पास बिठा कर 'इक़रा बिसमे रबुकल लज़ी ख़ल्क़' यह आयत पढ़वाई और अल्लाह से उसके बेहतर मुस्तक़बिल के लिए दुआ की और कहा अब खिलाओ मिठाई और करो हार फूल वग़ैरा।    

कहने का मक़सद वही है आज माशरे में जो ग़ैर ज़रूरी चीज़ें हैं वोह तो हमने इख़्तेयार की हुई हैं, ऐसी लायानी, ग़ैर ज़रूरी चीज़ें हमारे लिए पहला नंबर रखती हैं।  और जो अल्लाह और उसके रसूल के एहकाम हैं, जिनको पहला नंबर होना चाहिए उनको दुसरे और तीसरे दर्जे में कर दिया है।  फिर हम खुद ही शिकवा करतें हैं की हमको दुसरे दर्जे का शहरी बनाने की साजिश हो रही है।  अरे तुमने जब अल्लाह और उसके रसूल के एहकाम को दुसरे और तीसरे दर्जे पर फ़ाइज़ कर दिया तो तुम्हारे साथ भी वैसा ही होगा।   ज़ालिम तरीन बादशाह और हाकिम तुम्हारे ऊपर मुसल्लद कर दिए जायेगें।   

कुल मिला कर यह सहाफी एक नतीजा अखज़ करता है, लड़की वालों से दहेज़ दान और दिगर इख़राजात और आशियात की तवक़्क़ो वही इंसान करता है जिसको अपने बाजूवे क़ुव्वत पर यक़ीन नहीं होता की वोह बोझ उठा पायेगा।   असली मर्द वोह जिसका यक़ीन इतना पुख्ता और कामिल हो की सेहरा की तप्ती हुए रेत में जा कर रहे और उसको ज़रखेज़ हरा भरा नखलिस्तान बना डाले।   जब एक मर्द मोमिन का इतना पुख्ता यक़ीन होता है तब उस यक़ीन को पूरा करने के लिए अल्लाह के फ़रिश्ते उसकी ग़ैब से मदद करतें हैं।  जो काम दुनियां वालों के लिए बोहोत ही कठिन होता है वोह ऊपर वाले के लिए बिलकुल आसान होता है।   दूसरी बात अल्लाह को अपना काम करवाने के लिए, अपनी बात बन्दों तक पहुंचाने लिए लिए किसी दुनयावी या इंटरनेट की हाजत नहीं होती है। जब अल्लाह को हक़ की आवाज़ बुलंद करना होती है तो फ़िज़ाओं को हवाओं को हजर शजर में वोह क़ुव्वत और ताक़त फ़राहम करता है तमाम चरिन्द परिन्द मख्लूक़ अल्लाह के हक़ की आवाज़ के पेकर होतें हैं। 

किस्सा अल मुख़्तसर मुस्लिम नौजवनों से यही गुज़ारिश करूंगा की निकाह एक दम आसान करो ताके ज़िना कठिन होता जाए।   जबकि हो क्या रहा है ज़िना तो आसान होता जा रहा है जो नाजाइज़ है गुनाह है और निकाह कठिन पर कठिन जो जाइज़ है और हलाल है।  जब तुम हलाल काम को कठिन कर रहे हो तो फिर तुम्हारे ऊपर भी कठिन दिन होंगे।  जाइज़ काम को आसान करो गुनाह को कठिन करो तो तुम्हारे साथ मामले भी वैसे ही होंगे।  

अल्लाह की रस्सी मज़बूती से थाम लो, नबी सल्लम के बताये हुए तरीक़े पर चलो ज़ालिम ऐसा फ़ना होगा भाग जाएगा जैसा शैतान लाहोल से भागता है।   इस सहाफी के ऊपर तीन जान लेवा हमले हूए एक तलवार-चाकू से दूसरा बंदूक से और तीसरा फ़ासी की क़ावायत लेकिन तीनों में ज़र्रा बराबर ईज़ा या ज़ख़्म तक नहीं हुआ और अल्लाह ने अभी तक मेहफ़ूज़ रखा है। 

Zuber

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