अज़ीज़ नाज़रीन,
साल २०२१ वैसे तो मोदी, भारतीय जनखा पार्टी और शिद्दत पसंद हिन्दू समाज के लिए सख़्त दिन ले कर आया था, जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने एकम जनवरी को ही कर दिया था। उसके ऊपर मोदी महाराज की हठधर्मी और हिटलर शाही मज़ीद हालात को पेचीदा करती चली गई। लेकिन इस बार मुक़ाबला कमज़ोर मुस्लिम सामाज से नहीं था बल्कि बहादुर किसानों से था जो ज़मीन का सीना चीर कर अपनी मर्ज़ी का बीज बोना जानते हैं तो हुकूमत के फैसले को कैसे तब्दील नहीं कर सकते। जो किसान रिज़्क़ रोटी उगाना जानते हैं वोह वक़्त पड़ने पर उनके हाथ से रोटी छीनने वाले के हाथ काटना भी जानतें हैं। और यही भारत का इतिहास भी है, जब जब किसी ज़ालिम दुष्ट दरिंदे ने किसानों के हाथों से रोटी या उनकी ज़मीन छीनने की कोशिश की है उन्होंने अपने हालों को पिघला कर तलवार बनाई और ज़ालिम का मुक़ाबला किया है।
नाज़रीन जब किसान एहतेजाज अपने ऊरूज पर पहुंचा भी नहीं था और मोदी इन्तेज़ामियाँ गफलत में थी और किसानों ने तमाम टोल प्लाज़ा फ्री कर दिए थे तभी इस सहाफी ने बोला था की हुकूमत चलाने की ज़िम्मेदारी किसानों को देना चाहिए। अभी तो एहतेजाज है और तमाम टोल फ्री कर दिए गए। अब लाल क़िला गुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद हुआ। जल्द ही किसानों को उस ताजिर से क़िले को अपने क़ब्ज़े में ले लेना चाहिए जिसको मोदी इन्तेज़ामियाँ ने दो साल पहले फ़रोख़्त कर दिया था।
किसानों को एक एक ज़ुल्म का बदला लेना होगा जो इन लोगों ने अवाम पर किये हैं। हर ना इंसाफ़ी, बेजा क़त्ल, मस्तूरातों के साथ ज़िना बिल जब्र और गिरोह गरदाना ज़िना तमाम ज़ुल्म का बदला लेना होगा हर ज़ालिम को अपना हिसाब देना होगा।
इतना तो ते है अब बात महज़ बिल के वापिस लेने या ख़तम करने तक महदूत नहीं रह गई। अब तो बात हुकूमत से मोदी को दस्तबरदार करने की आ गई है। और जल्द कुछ बड़ी बड़ी बातें होने जा रहीं हैं।
में सहाफी जुबेर तमाम जर्राह, तबीबों, शिफा खाने में काम करने वाली नर्सों, इंजीनयरों से गुज़ारिश करूँगा की दिल्ली की जानिब अपना रुख़ करें। ख़ास जर्राह और नर्सों की सख़्त ज़रुरत पड़ने वाली है। अपने ज़ख़्मी भाइयों का शिफा खाने में इलाज करना होगा। ये जंग किसी ख़ास मज़हब या सियासी नुमाइंदे की नहीं है। बल्कि यह जंग हर उस हिन्दुस्तानी की है जो अपने हक़ के लिए इन ज़ालिमों से लड़ रहा है। हर उस भाई की है जिसकी बेहेन की आबरू इन ज़ाफ़रानी संघी और बीजेपी वालों ने लूट ली। हर उस इंसान की है जिसके साथ हक़तल्फ़ी हुई। हर उस ताजिर की है जिसकी तिजारत हुकूमत के बेतुके और बेहूदा फैसलों की वजह से बर्बाद हो गई। हर उस इंसान की है जिसकी माश को अडानी और अम्बानी जैसे अजगरों ने निगल लिया।
हर उस सरकारी ओहदेदार की है जिसकी कंपनी सरकार ने निजी हाथों में दे कर उसको बेरोज़गार
कर दिया। आज हुकूमत के ज़ेरे इंतज़ाम तमाम असासे
और सरमाये निजी हाथों (अडानी, अम्बानी) की कठपुतलियां हैं।
अगर इस वक़्त आप खामोश रहे और किसानों का साथ नहीं दिया तो आपको मौत की आगोश में जाने से कोई नहीं रोक सकता। मोदी इन्तेज़ामियाँ तो खुद अपने वतन के अवाम को गोली मारती है, फौजियों की लाशों पर सियासत करती है। उसके कारिंदे और बीजेपी वाले भारत के ऊपर सर्जिकल स्ट्राइक करने की बात करतें हैं, बम धमाका करने की बात करतें हैं।
सोचो, बोहोत देर हो जाए और आपके हाथ सिर्फ पछताने के सिवा कुछ ना रहे तो अच्छा है किसानों का साथ दो। यह सुनहरा मौक़ा है, इसे हाथ से ना जाने दो।
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