Friday, 15 January 2021

ताला बंदी के मुज़िर असरात।

अज़ीज़ नाज़रीन,

इस सहाफी का कोई भी मज़मून या खबरनामा उसकी दुरुस्त तहक़ीक़ात और तफ्तीश के बाद ही शाया किया जाता है।  और इस सहाफी की तहक़ीक़ात, तफ्तीश ९८% मुस्तक़बिल में दुरुस्त और सही साबित होती है।   माह नवंबर २०२० को इस सहाफी ने एक मज़मून होशियार अवामे हिन्द, नई तर्ज़े ज़िन्दगी के लिए, उन्वान के साथ शाया किया था।   उस वक़्त भी जो तहक़ीक़ात इस सहाफी के सामने आई थी वोह बेहद ख़ौफ़नाक और डराने वाली थी।  जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अवाम को आगाही के साथ साथ साथ कुछ ख़ास हिदायत के साथ शाया किया था।  जिस हिसाब से हिन्द में जुर्म और खून करने जैसे अमल की बाढ़ आ गई है उसका इल्म इस सहाफी को दौरान तहक़ीक़ात और रिसर्च पहले ही हो चूका था।  यह बात वाज़े है की जुर्म तो अभी और बढ़ने वाले हैं।   पुलिस को अपना नुमाया किरदार अदा करना होगा।  मुस्तक़बिल में पुलिस और हुकूमती नुमाइंदों को अपने काम पर ज़्यादा तवज्जो और ज़िम्मेदारी से करने की ज़रुरत दर पेश होगी। 

नाज़रीन जुर्म की आज ऐसी सूरते हाल हो गई है की एक पान के बीड़े या बीड़ी सिगरेट की वजह से खून हो रहे हैं।   ख़ास शुमाली हिन्द जिसमे शामिल हैं, हिमाचल, हरयाणा, उत्तर प्रदेश से ले कर मध्य प्रदेश, दिल्ली, बिहार में जुर्म की जैसे आंधी आ गई है।   दूसरी ख़ास बात जो ज़ेहननशीन करने की है वोह यह की इन तमाम सूबों जहाँ पर जुर्म परवान चढ़ रहें हैं उनमे बीजेपी की हुकूमत है।   अगरचे राजिस्थान को अलहदा कर दिया जाए तो तक़रीबन तमाम शुमाली भारत में ज़ारफानी हुकूमत है।   दिल्ली में जुर्म क़त्ले आम बढ़ रहें हैं तो उसकी वजह मरकज़े वज़ारत खाना है।  क्योंकि दिल्ली की इन्तेज़ामियाँ और पुलिस वज़ीरे दाखला के ज़ेरे क़यादत काम करता है।  

तीसरी और ख़ास वजह मरकज़ की २२ मार्च २०२० को तमाम भारत को क़ैद करने की अहमक़ाना हिकमते अमली है।   तमाम फ़िज़ाओं, रेल, रोड, दुकानें, अदालतें यहाँ तक की मंदिर मस्जिद के साथ साथ बैतूल खला और दीवाने ख़ास दीवाने आम तक क़ैद कर दिए।  ऐसी अहमक़, जुनूनी और वाहियात  हिकमते अमली के पीछे की सोच क्या थी अभी तक वाज़े नहीं हो पाई है।   क्योंकि अगर मरकज़ करोना वबा को ऐसा कर के ख़त्म करना चाहता था तो उस हदफ़ को तो भारत हासिल नहीं कर सका।   वहीँ पाकिस्तान में उनके पड़े लिखे ज़हीन वज़ीरे आज़म इमरान खान ने तमाम पाकिस्तान को बा इक वक़्त क़ैद करने के बजाये टुकड़ों में ताला बंदी की, कुछ को चालू रखा और कुछ को बंद किया।   इबादत गाहा पूरी तरह से चालू थी।   उसका असर यह हुआ की जिस जंग को जीतने की भारत कोशिश कर रहा था ताली बजा कर, चिराग़ रोशन कर के फूल बरसा कर उसको पाकिस्तान ने जीता।   और अक़वामे मुत्तहिदा की आलमी सेहत तंज़ीम से भूरी भूरी तारीफ हासिल की।  

उस जुनूनी अहमक़ के फैसलों को पूरा करने के लिए तमाम बॉलीवुड हस्तियां, अवामी शख़्सियत, मीडिया के लंगूर और लँगूरनियाँ यहाँ तक साधू संत और मुस्लिम ज़र ख़रीद मौलानाओं की वोह टोली जो बजाये किसी भी अहमक़ काम पर मरकज़ या सूबे के सरबराह से सवाल करने के उसकी ग़ुलामी में ही अपनी बक़ा देखतें हैं, सब लग गए एक क़तार में और शुरू हो गए थाली बजाने, दीपक जलाने।   रहा सवाल फूल बरसाने का तो फ़ौजिओं की लाशों पर वज़ीरे आज़म ने फूल बरसा दिए।   क्योंकि जिस वक़्त कश्मीर में कुछ ५ या ७ भारतीय फौजी मारे गए थे उसी शाम मोदी जी ने फूल बरसाओ लाहिया कार अमल का ना सिर्फ एलान किया बल्कि दिल्ली से कश्मीर तक तमाम शुमाल में अपने फ़िज़ाई तय्यारे से फूल बरसा कर यह ज़ाहिर कर दिया की वोह किस जानिब हैं।   और उनका क़ल्ब किस के लिए धड़कता है।   उनके इस अमल पर इस सहाफी ने आज तक, Hindustan Times और नव भारत पर फ़ौरन ट्वीट्स किये थे। जिसका जवाब दानिशमंदों ने वज़ीरे आज़म से चाहा था और इस सहाफी के ट्वीट को वाजिब क़रार कर के मोदी के ऊपर खूब लानत मलामत की गई थी।   यह बात अलहदा है की ऐसी ख़बरें संघ और बीजेपी के रसूख की वजह से अवामी डोमेन में नहीं आ पाती हैं।   लेकिन तारीख़ को कौन है जो तब्दील कर सकेगा।   कोई भी उठ कर मोदी के फूल बरसाओ प्रोग्राम और कश्मीर में फ़ौजिओं की हलाकत का दिन देख सकता है।  

ख़ैर वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन एक बात आईने की तरह शफ़्फ़ाफ़ है की मोदी की अहमक़ाना सोच और जुनूनी फितरत की वजह से आज भारत का नौजवान जुर्म के रस्ते पर गामज़न है।  तालिबे इल्मों की तालीम पर क़ैद लगाना कहाँ तक जाइज़ है।   यह वही सोच है जो अलीगढ़ मुस्लिम, जामियां मिलिया इस्लामिक और जवाहर लाल यूनिवर्सिटी के तालिबे इल्मों और रिसर्चर्स से हद दर्जे का बुग्ज़, कीना और हसद रखते हैं।  क्योंकि इन दारुल उलूम (यूनिवर्सिटीज) के तालिबे इल्म हर उस मुद्दे पर हुकूमत हो या बादशाह सवाल करने का माद्दा रखतें हैं, जिसमे मज़हब, क़ौम और मिल्लत की हक़तल्फ़ी होती है।  

मोदी जी भारत को जदीद रंग देना चाहते थे सो उन्होंने दे दिया, आज के जदीद भारत में कुछ भी मेहफ़ूज़ नहीं बचा।  हूकूमती इदारे फ़रोख़्त कर दिए गए, जम्हूरी इदारे ग़ुलाम बना लिए गए, अगर कुछ मेहफ़ूज़ बचा है तो वोह है छोटी सी छोटी बात पर क़तल, बैंक, हुकूमती और निजी इदारों में लूट, डाका, मस्तूरातों के साथ ज़िना बिल जब्र, गिरोह गरदाना ज़िना।  

अगर आज के जदीद भारत में अगर कुछ मेहफ़ूज़ है तो वोह है "जुर्म" "CRIME" और संघी "दहशत"

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