Wednesday, 27 January 2021

जमुहरियत में टकराव दलील है तानाशाही हुकुम।

अज़ीज़ नाज़रीन,

२६ जनवरी किसान दिन को जो कुछ भी हुआ वोह ज़ाफ़रानी ज़ालिम तानाशाह की हठधर्मी साबित करता है।  आज किसान कमो बेश ६ महीनों से एहतेजाज कर रहें हैं, लेकिन ज़ालिम, खून की प्यासी हुकूमत अपना तानाशाही रवैया जो २०१४ से इख़्तेयार किया हुआ है उसको छोड़ने को तैयार ही नहीं है। 

कारवां ऐ ट्रेक्टर पुर अमन तरीक़े से तमाम टोल क्रॉस करता हुआ जैसे ही हुदूदे दिल्ली पंहुचा, खाकी दहशत ने उनपर हमला कर दिया।   यह वही खाकी दहशत है जो मरकज़ी दहशतगर्द अमित शाह के इशारे पर इंसानों का शिकार और उनके सर क़लम करती है।  और रोड पर लिटा कर तलवारों लाठियों से मुस्लिम बच्चो को पीट पीट कर वन्दे ......... और भारत .......... की जय जैसे दहशतगर्दाना नारे लगाने पर मजबूर करती है।  इतना ही नहीं उनको पीट पीट के हलाक भी कर देती है।    यह बात आईने की तरह शफ़्फ़ाफ़ है की किसान अपने हदफ़ पर पुर अमन तरीक़े  से बढ़ रहे थे, इतना ही नहीं अवाम का भरपूर ताऊन उनको मिल रहा था, कही फूल बरसाए जा रहे थे कहीं हौसला अफ़ज़ाई की जा रही थी. लेकिन दहशतगर्द हमलों ने हालात को  पेचीदा कर दिया। असल मुजरिम इन्तेज़ामियाँ और पुलिस है. 

नाज़रीन ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर ख़ास लँगूरनियाँ बरहना हो कर अपने ज़ाती आज़ा दिखा कर ख़ुद अपनी इज़्ज़त आबरू नीलाम कर रही हैं और पोशीदा ख़ाकी पैरहन को दिखा कर उसकी नुमाइश करवा कर अपनी बदनामी।   इन ज़हन फरोश लँगूरनियों को ३०० पुलिस वालों के ज़ख्म तो दिख गए लेकिन कितने किसान ज़ख़्मी हुए उसका कोई हिसाब किताब नहीं है।  पुलिस की गोली में कुछ किसानों के जहांबाक होने की भी ख़बरें हैं।   फिर ऐसे हालात पुलिस ने पैदा किये थे काहे को शदीद लाठी चार्ज किया  गया, काहे को गोलियां चलाई।  फिर इन पुलिस वालों की गोलियां सिर्फ मज़लूम अपने हक़ के लिए जद्दो जेहद करने वाले अफ़राद के ऊपर ही क्यों बरसती हैं। यही पुलिस दिल्ली में २०२० में हुए हिन्दू दहशतगर्द हमले में काहे को एक कमज़ोर ज़नख़ों की मानिंद बर्ताव करती हुई दिख रही थी।  अगर वक़्त पर दिल्ली पुलिस ने हिन्दू दहशतगर्दों को गोलिओं से भून डाला होता तो उस वक़्त १५० मज़लूम लाशें नहीं गिरती, और ना ही मस्जिदें, मज़ारात की बेहुरमती होती और ना ही क़ुरआन जलाये जाते।  

यही पुलिस अगर बग़ैर किसी तास्सुब के काम करती तो मनसौर में मस्जिद के ऊपर भगवा फहराने वाले और बवाल करने वाले हिन्दू दहशतगर्दों में से १०-१२ को गोली मार के हलाक कर देना था।  क्योंकि वोह बग़ैर किसी उज्र और जाइज़ मांग के बेजा बवाल कर रहे थे। 

किसानों के एहतेजाज पर तमाम लँगूरनियाँ अपने ज़ईफ़ आशिक़ की बेइज़्ज़त्ती पर आग बबूला हो रहीं हैं, जैसे की इनको कामख्या मंदिर में जा कर अपने ज़ाती आज़ा की नुमाइश करने की इजाजात नहीं मिली है। लेकिन में उन तमाम लँगूरनिओं से पूछना चाहता हूँ जो अपने ज़ईफ़ कमज़ोर, जनखे आशिक़ की जी हूज़ूरी कर रहीं हैं क्या कभी उन्होंने किसानों की बात को इतनी ही शिद्दत और साफ़ दिल से अपने आशिक़ के रू बरू रखने की हिम्मत की थी।   अगर तानाशाह ज़ुल्म नहीं करता तो हालात इतने पेचीदा होते ही ना।   

एहतेजाज इसीलिए तो किया गया था की ज़ुल्म हो ही ना।  जब तुम ज़ुल्म करोगे तो एहतेजाज के लिए भी तैयार रहो।  

बरहाल जो कुछ भी हुआ उसके लिए सिर्फ और सिर्फ हुकूमत का तानाशाही और अड़ियल रुख़ ज़िम्मेदार है जो जमुहुरित के लिए ज़हर है।    और यह जंग लम्बी चलने वाली है, और यह जंग अपने हक़ और इन्साफ की मांग को ले कर है ना की इक़्तेदार के लिए की जा रही जंग है।   जबकी इक़्तेदार के लिए इस जंग की शुरूवात तो लँगूरनियों ने २०१९ के इंतेखाब ख़त्म होने बाद तास्सुरात में और नताइज के वक़्त ही कर दी थी।   इंतेखाब ख़त्म होने के बाद किस तंज़ीम को कितनी सीटें मिलेगी हर उस प्रोग्राम को जंग का नाम देना फिर राहुल को घोड़े पर सवार तलवार भाला हाथ में लिए दुसरे घोड़े पर तानाशाह ज़न्खा कमज़ोर आदमी लँगूरनियों का आशिक़ उसके भी हाथ में तलवार भाला और वोह गधे पर सवार।  नताइज के वक़्त जब बीजेपी का कोई भी नुमाइंदा जीतता और मुख़ालफ़ीनों का हारता तो क्या बोला जाता था दुश्मन का एक और फौजी ख़तम।  फिर जो मरहला पहले कांग्रेस, सपा, बसपा या और किसी सियासी तंज़ीम के हाथ में था उसको बीजेपी ने जीता तो क्या बोला जाता था दुशमन का एक और क़िला फतह किया।  तो वतन के मुख़ालफ़ीनों के खिलाफ ज़हर तो लँगूरनिओं ने भरा था।      

आज किसानों के हाथ में भाले और तलवार देख कर लँगूरनियाँ बवाल मचा रहीं हैं उन्होंने तो २०१९ में ही तलवार भाले से जंग की शुरूवात कर दी थी।   बाक़ायदा जंगी टोपी पहने हुए दोनों सिपहसालार फिर अब इतना बवाल मचाना इस बात की दलील दे रहा है की इन लँगूरनियों को कमज़ोर आदमी ज़न्खे से जो खुशी चाहिए थी वोह नहीं मिली और वोह अपनी जिस्मानी और जिन्सी ख़्वाहिशों को मुत्मइन नहीं कर पाई।   तो जब किसानों का जूनून और जोश देखा तो जिस्म की दर्जे हरारत गर्मजोश हो गई अब चाहती हैं की किसानों को ब्लैकमेल कर के उनके साथ थोड़े से बदकारी कर ली जाए।   

पिछले ५ सालों से कोविद -१९ वबा के आने तक तमाम दुनियाँ में मारा मारा फिरा जुनूनी आदमी लेकिन जब किसी भी मुल्क ने कुछ भी ख़याल ना किया ना तिजारत में और ना ही हथियारों की फ़राहम करने में तो आ गया अपनी औक़ात पर अब बात करता है आत्मनिर्भर भारत बनायेगें।  लेकिन कैसे, ऐसे बनाओगे आत्मनिर्भर भारत, जो किसानों का हक़ मार कर ताजिरों को दे, जो लँगूरनियों को अपने पती से अलग कर के बरहना हो कर ज़हन फरोशी के दलदल में धकेल दे।   ऐसा आत्मनिर्भर भारत आपको ही मुबारक हमें हमारा दूसरों पर निर्भर भारत दे दो जहँ ६५ रूपये पेट्रोल था और ५०  रूपये डीज़ल।  जहाँ बकरे का गोश्त ३५० रूपये और गाये बैल का ८० रूपये, जहाँ मुर्गी का गोश्त १२० रूपये और साग भाजी २० रूपये।  जहां दाल दलीय ८० रूपये चावल गेहूं २५ रूपये।     

भारत के हर उस अवाम से गुज़ारिश है, जो हक़ और इन्साफ की इस जंग में हक़ के साथ है इन्साफ का साथ देना चाहता है जिसके साथ हक़तल्फ़ी हुई जिसका हुकूमत की गफलत और गैर ज़रूरी फैसलों से कुछ भी बूरा हुआ वोह किसानों का साथ दें।  

में तो किसानों के साथ हूँ क्या आप हैं।  

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