Tuesday, 12 January 2021

हाथ पैर तोड़ डाले।

 अज़ीज़ नाज़रीन,

आज ३ ख़ास ख़बरों को ले कर आप हज़रात के सामने आया हूँ।   पहली खबर एक और भारतीय जनखा पार्टी का दहशतगर्द श्रीपद नायक मौत की जंग लड़ रहा है।   उसके हाथ पैर तोड़ डाले और उसकी लुगाई जहन्नुम रसीद हो चुकी है।   इससे पेश्तर २०१९ में उसके बाद २०२० में जब एक मुस्लिम नौजवान का हरयाणा में हवाई आरा मशीन से हाथ काट डाला था, उसके बाद इस सहाफी ने यही कहा था अब से हर शिद्दत पसंद काफिर, हर संघी हर बीजेपी वाला हरयाणा में हाथ पैर से माज़ूर कर दिया जाएगा।   ख़ैर हरयाणा ना सही गोवा सही।  जब तक जनखा पार्टी के आला ओहदेदारों वज़ीरों को मौत के घाट उतारा नहीं जाता नीचले और कम अक़्ल अक़ीदत मंद राहे रास पर आने वाले नहीं हैं।   तारीख़ में इस चीज़ का हिसाब किताब रखना २०१४ के बाद हादसात और खून रेज़ी में कितने भारतीय जनखा पार्टी के वज़ीर जहन्नुम रसीद हो चुके हैं। 

दूसरी खबर साधू के सूबे से है जहाँ एक और ख़ाकी आतंकिनी को फ़ासी दे दी गई है।   इससे पेश्तर बुलंदशहर में आरजू पवार को फ़ासी दी गई थी, जो की एंटी रोमियों सकॉट टीम की सरबराह थी और मुस्लिम नौजवानों को बेजा परेशान करती रहती थी।   उसकी फ़ासी के बाद शुक्रन का एक मज़मून लिखा है और उसकी फ़ासी की ख़बर की इत्तेला तमाम उम्मते मुस्लिमा को दी गई थी।  उसकी फ़ासी के फ़ौरन बाद उसके आशिक़ कांस्टेबल ने भी ख़ुदकशी कर ली थी वोह शादी शुदा था।  

यह सब मामला कुछ हतमी मरहले तक पहुंच पाता और साधू जैसे ज़ालिम दहशतगर्द, क़साई, दरिंदे, जल्लाद शैतान को अपनी ग़फ़लत और गलती का एहसास हो पाता की ११ जनवरी २०२१ को एक और फ़ासी को अंजाम दे दिया गया।  इस बार लखनऊ के मोहनलाल कोतवाली में तैनात ज़नाना सिपाही उर्मिला वर्मा की लाश फ़ासी के फंदे से लटकती मिली है।  उर्मिला की लाश बरोज़ इतवार देर रात उसके कमरे में फांसी से लटकती पाई गई थी।   ख़ातून उर्मिला फैज़ाबाद की रहने वाली थी यह वही फैज़ाबाद है जिसका नाम तब्दील करने के पीछे साधू पड़ा हुआ था।   उर्मिला डायल ११२ में काम करती थी।  

तीसरी और ख़ास बात यौमे जमुहरियत के हवाले से जो आप हज़रात से कहना चाहता हूँ।  नाज़रीन जिस अंदाज़ में २०१४ के बाद दहशतगर्दों ने हमारे ऐवान, आला अदालत, सदरे जमुहरिया, इन्तेख़ाबी मामुरिया, फौज अलग़रज़ हर एक आईनी इदारे को दहशतगर्दों ने या तो अपनी तलवार के ज़ेरे साये गुलाम बना लिया या उसका क़त्ल कर डाला है तो अब हर मोहज़्ज़ब अवाम को हक़ है की हर उस क़ौमी तेहवार की खिलाफ़वर्ज़ी या मुख़ालेफ़त करे जिसमे दहशतगर्दों की नुमाइंदगी हो।   

फिर खुशी और सौग दिखावे के आशियात नहीं होतें हैं उनका एहसास होना ही काफी होता है।   अवाम का चेहरा और उसके अमल खुशी और ग़म का एहसास करवा देतें हैं।  फिर उस एहसास को ज़ाहिर कीजिये, अगर आपके जमुहरियाई हक़ छीने जा रहें हैं और हुकूमत तलवार गर्दन पर रख कर आप लोगों को ख़ुशी का मुज़ाहेरा करने को कहती तो ऐसे ग़ुलामो वाली खुशी से तो बेहतर है इज़्ज़त वाली मौत को गले लगा लिया जाए।   

इस साल योमे जमूरियत की कोई खुशी नहीं बनाई जाए,  क्योंकि इन ज़ालिम भेड़ियों जल्लाद दहशतगर्दों ने मुल्क के हर अवाम के साथ धोखा किया है।  हर अवाम के दस्तूरी हक़ को पामाल किया है।  जब जमूरियत ही नहीं बची तानाशाही या हूकूमशाही आ गई तो किस जमुहरियत की ख़ुशी बना रहे हो।  नोट बंदी की थी उससे अदना (छोटे) और मझोले ताजिरों की गर्दन काट डाली, रहा बेहद बड़े ताजिर अडानी अम्बानी उनके तो वारे न्यारे हो गए।   नई सिम कार्ड की कंपनी को उस काले धन से क़ायम कर डाला।उसके बाद "का" और एन आर सी जिसके चलते पाकिस्तानी अफगानी और बंगलादेशी हिन्दू भारत में आ कर मुक़ीम हो गए इससे जो मुक़ामी हिन्दू, जैन, बोध, सिख, किच्चन अवाम थे उनकी ज़बरदस्त हक़तल्फ़ी हुई।  नतीजा क्या हुआ अब उन बाहरी हिन्दू अवाम के ऊपर तशद्दुत होने लगी जोधपुर में एक ही खानदान के ११ पाकिस्तानी हिन्दु अफ़राद को मौत की नींद सूला दिया गया।   

हर रोज़ की बढ़ती ख़ून रेज़ी, क़त्ले आम, बदनज़्मी, बदअमनी, ख़ाना जंगी को देखते हुए पाकिस्तानी हिन्दू अवाम को उनका मुल्क भारत से ज़्यादा पुर अमन और पुर सुकून लगा।   फिर जो हिन्दू भारत को एक अमन पसंद मुल्क तसव्वुर कर के हिजरत कर चुके थे वोह वापिस पाकिस्तान चले गए।   वतन वापसी की दलील उन्होंने भारत में बढ़ते हुए ख़ूनी जंग, जराइम, मस्तूरातों के साथ जुर्म को बताया।  और इस बात को तस्लीम किया की पाकिस्तान में काफी अमन है हम अमन की तलाश में भारत गए थे की हमारी नस्ले पुर अमन माहौल में परवान चढ़ेंगीं लेकिन जब भारत का खुद का अवाम हिन्दू, मुस्लिम, सिख, बोध, दलित ही सुकून से नहीं हैं तो भारत किसी बाहरी अवाम को सुकून फ़राहम करेगा ऐसा तवक़्क़ो करना नाहेली और अहमक़ाना सोच है।   

किसानों की ज़मीन हड़पने का क़ानून बनाया जिसकी ज़द में वोह तमाम किसान आ गए जिनके पास ज़मीने थी।   हुकूमत की ऐसी हिकमते अमली का दस्तूर में कहीं भी ज़िक्र नहीं है।  और यही जमुहरियाई क़त्ल है।   जब अवाम से उनका जमुहरियाई हक़ ही छीन लिया गया तो किस बात की खुशी बनाते हो। 

नाज़रीन जिस अंदाज़ में भारत में दहशतगर्दों ने डाका दाल कर बंदूक और तलवार के ज़ोर पर संसद पर क़ब्ज़ा किया था ठीक वैसा ही अमेरिका में ट्रम्प के मुवाफ़िक़ों ने किया है।   उस हमले में कुछ ४ अमेरिकी मारे गए थे और भारत के ऐवान पर क़ब्ज़े में हज़ारों लाखों मारे जा चुके हैं और आगे भी जारी रहने के इमकान हैं।   दोनों ही मुमालिक अपने आप को अज़ीम जमूरियाई मुमालिक तस्सव्वुर करतें हैं लेकिन हुक़ूक़ और इंसानी जान की कोई क़ीमत नहीं है।   दोनों ही मुमालिक सख़्त तरीन दहशतगर्दों के ज़ेरे साये काम करतें हैं, अमेरिका यहूद और भारत हिन्दू दहशत से मुत्तासिर हैं।  अमेरिका यहूद दहशत के ज़ेरे साये काम करता है और भारत हिन्दू दहशत के ज़ेरे साये।   जमूरियत से इन दोनों मुमालिकों का दूर दूर से कोई सारोकार नहीं है।    फिर जब जमूरियत ही नहीं है तो केसा योमे जमूरियत और किस बात की ख़ुशी। 

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