Thursday, 28 January 2021

नहीं हुआ लाल क़िला आज़ाद; ट्रेक्टर्स में घूस गए थे दहशतगर्द।

अज़ीज़ नाज़रीन 

२६ जनवरी किसान दिन को लाल क़िले पर जो कुछ भी हुआ उसमे ज़ाफ़रानी दहशत और हुकूमत की मिली भगत सामने आई है।  मक़सद महज़ किसान एहतेजाज को कमोज़र कर के ताजिरों के बाद किसानों को बर्बाद और ख़त्म करने की साजिश है।  कुल मिला कर ग़ुलाम क़िला अभी तक ग़ुलाम ही है।  उसके ऊपर झंडा फहराने वाला कोई किसान नहीं बल्कि बीजेपी का दहशतगर्द दीप सिध्धू है जो सनी देओल का ख़ासम ख़ास माना जाता है।  इस दहशतगर्द दीप सिध्धू ने लोकसभा २०१९ में सनी देओल के लिए जमकर इन्तेख़ाबी मोहीम में हिस्सा लिया था।    

ज़ाफ़रानी ज़हर, साजिशी दीप सिध्धू सनी देओल के एहले ख़ाना में अहम हैसियत रखता है।  लाल क़िले पर किसानों की पीठ में ज़ाफ़रानी छुरा घोपने के बाद  अब हेमा मालिनी, सनी देओल और कई जनखा तंज़ीम के बड़े ओहदेदारों के ऊपर बिजली गिरने के इमकान हैं। नाज़रीन लाल क़िले पर हमला दूसरा पुलवामा कह सकतें हैं।  पुलवामा में हूकूमते तानशाह को अपनी कुर्सी जुंबिश करती हुई दिख रही थी तो उसने फ़ौजिओं को मौत के घाट उतार दिया वहीँ पास किये हुए क़ानून में जुम्बिश दिख रही थी तो क़िले में कुछ किसानों को मौत के घाट उतार दिया।   कुल मिला कर बीजेपी का क्या गया, कुछ नहीं पुलवामा में इलज़ाम पाकिस्तान पर लाद दिया और क़िले में ज़िम्मेदार किसान हो गए.  जबकी दोनों ही हमलों में असली मुजरिम अभी तक क़ानून के शिकंजे से बहार है. अब पुलवामा पर ना कोई सवाल होता है और ना कोई तब्सिरा, क्योंकि अब तो पुलवामा से बड़े बड़े मसले सामने आ गए. फिर अगर किसी ने पुलवामा की हक़ीक़त जानने की कोशिश की तो हो गया वोह ग़द्दार, पाकिस्तान का साथी और तमाम लंगूर लँगूरनियों की टीम के साथ ट्रोल फौज के हाशिये पर आ जाता है.  

जैसा की आम तौर पर इन ज़ाफ़रानी दहशत की रिवायत और मामूल है की गले लग कर पीठ में खंजर उतारते हैं, या कब गले लग कर आपकी गर्दन उतार देंगें आपको पता भी नहीं चलेगा।   जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने कई मज़मूनों में किया है और क़िले में भी वही हुआ जैसे की अलफ़ाज़ इस सहाफी के होतें हैं। गले लग कर भाई बन कर मुहाफिज़ बन कर साथ देने आएं हैं ऐसा बोल कर कब आपके गले को काट डाला पता भी नहीं चला।  बोहोत मोहताद रहने की ज़रुरत है।  किसानों के साथ हुई साजिश में वज़ीरे दाख़ला से ले कर पुलिस इन्तेज़ामियाँ सब की मिली भगत थी.  जान बूझ कर वज़ीरे दाख़ला ने हालात को पेचीदा होने दिए और पुलिस इन्तेज़ामियाँ एक नपुंसक की तरह कमज़ोर कड़ी के जैसे काम करती रही.   फिर जहाँ ग़ैर ज़रूरी था  वहाँ पर गोलियाँ चलाई और शदीद लाठी चार्ज किया। किसानों के मज़बूत कन्धों पर बंदूक रख कर गोली ज़ाफ़रानी दहशत ने चलाई है, अब मिडिया बदनामी का ठीकरा किसानों पर फोड़ रहा है, एक तीर से कई निशाने।   

अब दबे अलफ़ाज़ में ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों के खबरनामों में साजिश के पीछे पाकिस्तान का भी नाम लिया जा रहा है।  लेकिन अभी तक हुकूमत की जानिब से उसका कोई सरकारी बयान या सहाफी इजलास में किसी भी हूकूमती नुमाइंदे ने ऐसी बात नहीं कही है।   पाकिस्तान का नाम फील वक़्त  सिर्फ ज़ाफ़रानी ज़हर और उनके ज़हन की ख़बासत तक ही महदूत है। 

अगर मोदी इन्तेज़ामियाँ या हुकूमत की जानिब से ऐसा कोई भी बयान जारी किया जाता है तो उसका इस सहाफी के पास माक़ूल जवाब मौजूद है।  और सही वक़्त पर सही जवाब दिया जाएगा।

कुल मिला कर यह कहना ग़लत ना होगा की भारत में ज़ाफ़रानी साजिश, ज़ाफ़रानी ज़हर, ज़ाफ़रानी वायरस ने फिर से मीठा मीठा बोल कर गले लग कर किसानों का क़तल करवा दिया और कई पुलिस वाले भी ज़ख़्मी हुए।   लेकिन ऐ बी वी पी की आतंकिनी कोमल शर्मा और शाहीन बाग़ में घूस कर एहतेजाज को कमज़ोर करने वाली आतंकिनी की तरह यह मामला भी दब कर रह जाएगा। 

कुल मिला कर पुलीस इस मसले में भी बली की गाये तलाश करेगी जैसा की करोना वबा में मोदी के ऊपर लानत मलामत और नाकामी का ठीकरा तब्लीग़ी नामक जर्सी गाये को हलाल कर के पूरा इलज़ाम उसके ऊपर लगा दिया था।   

लेकिन इस बार हो सकता है गाये बाहर के देशों की यानी जर्सी ना हो बल्कि देसी यानी हिन्दू ईमान की अलामत वाली हो।   यह बात तो ते है ना बीजेपी, ना ज़ाफ़रानी दहशत, ना शिद्दत पसंद हिन्दू बल्कि एक बली की गाये को हलाल किया जाएगा और यह मसला भी ऐसे ही दब जाएगा जैसे की गोधरा, पठानकोट, उरी, पुलवामा, दिल्ली दहशतगर्द हमलों की हक़ीक़त।    

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