अज़ीज़ नाज़रीन
यह
सहाफ़ी मुजाहिद ऐ इस्लाम भाई दाऊद, भाई शकील, भाई अबू सालेम, भाई नदीम सैफ़ी जैसी अज़ीम
इस्लाम शख़्सियतों को तहे दिल से सलाम करता है।
जिनका नाम आते है काफ़िरों और हुकमते हिन्द के नुमाइंदों को मिर्गी आना शुरू
हो जाती है। इन मुजाहिदों ने काफ़िरों की बस्ती
में जा कर फोड़ फाड़ डाला था और अभी तक भारत की हुकूमत के हाथ ना लगे। जिसकी जलन और तपिश खलिश हमेशा हूकूमते हिन्द अदलिया
और पुलिस को रहेगी।
भलें ही हुकूमत हिन्द पुलिस और काफ़िर अवाम इन मुजाहिदों को गन्दी और गलीज़ नाम से पुकारे लेकिन अहले इस्लाम और हर सच्चे मुसलमान के नज़दीक इनका मुक़ाम बोहोत ही आला है। इनकी कारगरदेगी की वजह से ही १९९३ के बाद मुस्लिम बंबई और हिन्दुस्तान में ज़िंदा रह सके। ऐसा काम कर दिया जो मुसलमानों की तारीख़ के सफों में सुनहरे अलफ़ाज़ में दर्ज हो गया। जिन हिन्दू दहशतगर्दों ने मुस्लिम अवाम को क़तल किया था उन सभी को एक ही झटके में जहन्नुम का टिकेट कटवा दिया।
इनमे से भाई अबू सालेम और भाई नदीम सैफ़ी ने तो आलमी अदलिया में भारत के ख़िलाफ़ जंग लड़ी और फतह हासिल की थी। जिन मुसलमानों को पुलिस गेस्टर बोल कर मुखातिब करती है भारत का मीडिया बेहूदा और अदना दर्जे के अलफ़ाज़ में कवरेज देता है बिल फ़र्ज़ भारत की अदालत में उनके लिए इंसाफ़ नहीं होगा लेकिन आलमी सतह पर उन्होंने भारत के ख़िलाफ़ तवील जंग लड़ी और फतह दर्ज की है। जब एक मुजरिम समझा जाने वाला शख्स इंसाफ़ में जीत सकता है तो मैं इस बात को समझने से क़ासिर हूँ की मुस्लिम क़ियादत मुसलमानों पर भारतीय जब्र, ज़ुल्म और बर्बरियत के ख़िलाफ़ आलमी अदालत या अक़वामे मुताहिदा में जाने के लिए किस शे का इंतज़ार कर रहा है, जो क़त्ले आम के बराबर है। बीजेपी, संघ के नुमाइंदे जैसे महमूद और जमीयत के उनके भाई अरशद जैसे पेड एजेंट्स को भूल जाइए। लेकिन कम से कम जिस शख़्सियत के साथ मुसलमानों का झुकाव और यक़ीन है की इंसाफ़ के लिए लड़ेगा, उसे खुलकर सामने आना चाहिए और मुस्लिम नाइंसाफ़ी क़त्ल आम या नस्ल कूशी से मुताल्लिक़ सभी मामलों को आलमी अदालत और अक़वामे मुताहिदा में चेलेंज करना चाहिए।
भारत
का तमाम मुस्लिम माशरा ज़ाफ़रानी दहशगर्दी के नाइंसाफी से बेज़ार है। कब तक मुस्लिम क़यादत
और कितने नौजवान मुसलमानों के शहीदों के जनाज़े बूढ़े कंधों पर ढोने का इंतजार करेगा।
ज़ाफ़रानी दहशत और भारत की हुकूमत चाहे कोई भी हो, कांग्रेस या बीजेपी। इनको जलन देने के लिए महज़ दाऊद, शकील, सालेम, सैफ़ी नाम ही काफी है। अबू सलेम को पुर्तगाल में गिरफ्तार किया गया था, हूकूमते हिन्द उन्हें मुठभेड़ में शहीद करने के लिए साजिश रच रही थी। जब वह भारत पहुंचे और हुकूमत (पुलिस कमिश्नर, कानूनी सलाहकार और अदालतों) ने हमेशा की तरह मुसलमानों के साथ अपनी दहशतगर्दाना नाइंसाफ़ी की ज़ेहनियत का मुज़ाहिरा करना शुरू कर दिया। और हूकूमते हिन्द ने साजिश रचनी शुरू कर दी, उन्हें फ़र्ज़ी एनकाउंटर में मारने या फांसी देने के लिए बड़े इलज़ाम में फंसाने की शरारत की। उन्होंने हवालगी को मन्सूख़ करने के लिए पुर्तगाल कोर्ट में चले गए क्योंकि हूकूमते हिन्द हवालगी के क़रारनामे और शर्तों की खिलाफ़वर्ज़ी कर रही है। पुर्तगाल हुकूमत ने फ़ौरन हवालगी मन्सूख़ कर दिया और सलेम को पुर्तगाल बुला लिया। अब वह बेरुन मुल्क में मेहफ़ूज़ हैं।
नदीम
सैफी ने हिन्दू पुलिस और हुकमते हिन्द के ख़िलाफ़ ब्रिटेन के हाई कोर्ट का रूख़ किया।
उन्होंने हुकूमत पर इलज़ाम लगाया कि यह मुस्लिम मुख़ालिफ़ और फ़िर्क़ापरस्त है, पुलिस मुझे
फर्जी एनकाउंटर में हलाक कर डालेगी। फ़िर्क़ापरस्त और मुस्लिम मुख़ालिफ़ इलज़ाम हूकूमते
हिन्द के ऊपर साबित हुए और नदीम सैफी बेगुनाह। उस फैसले पर कांग्रेस की भारतीय हुकूमत
को अज़हद ज़लालत का सामना करना पड़ा। भारत हुकूमत के लिए दाऊद और शकील आज भी ख़ौफ़नाक साये
की मानिंद हैं जो भारतीयों के कूल्हे में तीखी मिर्च डाल रहे हैं। वह सभी ज़िंदा हैं क्योंकि
उन्हें भारतीय कानूनी निज़ाम और हुकूमत पर भरोसा नहीं है। वे हुकूमत की मंशा से वाकिफ
हैं।
वहीं
एक नासमझ याकूब मेमन अपने भाई दाऊद की इंतेबाह को नज़रअंदाज़ कर भारत आ गए क्योंकि
उन्हें भारत के कानूनी निज़ाम, दस्तूर और हूकूमते
हिन्द पर एतेमाद था और हुकूमत ने उन्हें मीठा लॉलीपॉप दिया था। क्या हुआ वो नहीं रहे
और उनका नाम शहीदों की फेहरिस्त में आ गया?
हर
मुसलमान से मेरी गुजारिश है कि किसी काफिर पर भरोसा न करें भले ही वह कितना ही शाइस्ता
क्यों न हो। बिल आख़िर वह गले लग कर पीठ में खंजर भौंकेगा ही।
जब
याकूब मेमन ने इस यक़ीन पर अदालत को सारे सबूत दिए थे कि उनके सिर पर सबूतों का बोझ
नहीं है तो वह मुजरिम साबित नहीं होंगे। अदालत ने उन्हें एमिकस क्यूरी और अदालत का
दोस्त जैसे अज़ीम तमगों से नवाज़ा था। बाद में कोर्ट ने उसके साथ क्या किया। दहशतगर्द
सरग़ना प्रणब मुखर्जी की मिलीभगत से अदालते उज़मा ने उनका अदालती क़तल कर दिया। इसका मतलब यह है कि ये लोग भरोसे के लायक़ नहीं हैं, भले ही वे तहरीर में कुछ कर रहे हों,
उन पर भरोसा ना करें। अगर ये अपने ही कोर्ट के दोस्त को क़तल कर सकते हैं तो आम मुसलमान
की कोई कीमत नहीं है.
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