अज़ीज़ नाज़रीन,
हिन्दू राष्ट्र में मुस्लिम अवाम की नस्ल कूशी बदस्तूर जारी है। शिद्दत पसंद और ज़ाफ़रानी दहशतगर्द सिर्फ उन्ही मुस्लिम नौजवानों को झूठे फरेबी इलज़ाम लगा कर शहीद कर रहें हैं जो रसूख़दार और इज़्ज़तवाले होते हैं। उनकी इज़्ज़ते नफ़्स की पहले लंगूर लँगूरनियाँ हलाकत कर देती हैं बाद में पुलिस का काम आसान हो जाता है। क्या एक १९ साल का मासूम अग़वाह, फ़िरौती, डरना धमकाना, मामूली मार पीट जैसे जुर्म कर सकता है। अगरचे यह जुर्म सही भी हैं तो क़ाबिल ऐ ज़मानत जुर्म हैं। फिर उन मामूली जरायम में पुलिस को किस ने यह हक़ दिया की शहीद कर दे। उस तमाम पुलिस टीम पर क़तल का मुक़दमा दर्ज हो कर उन सब को फांसी होना चाहिए।
जब महाराष्ट्र में २०१० से २०१३ तक बोहोत फ़र्ज़ी एनकाउंटर हो रहे थे तब ख़ुतूत के ज़रिये अदालते उज़मा, सदरे जमुहिया को ख़ूब इत्तेला की गई थी तब अदालत ने कहा था अगर पुलिस वाला आला अफसर अपने अदना पर किसी भी मासूम को गोली मारने का हुकुम देता है तो ऐसा ग़ैर क़ानूनी हुकुम को ना माना जाए और ऐसे अफसर के ख़िलाफ़ क़तल का मुक़दमा दर्ज किया जाए।
लेकिन अब हालात दुसरे हैं अब तो अदालत उज़मा ख़ुद ही गुलाम हो चुकी है और दहशतगर्दों के रहमो करम पर जी रही है। अगर ऐसा सख़्त हुकुम बिल फ़र्ज़ अदालत ने नाफ़िज़ कर दिया तो दुसरे ही दिन उस जज का एनकाउंटर हो जाएगा। #जस्टिसलोया
दर हक़ीक़त इसमें ज़ाफ़रानी इन्तेज़ामियाँ, क़ानून और पुलिस की भी कोई ग़फ़लत नहीं है।अगर कोई इन सब हालात के लिए ज़िम्मेदार है तो वोह है जुम्मनों, ग़द्दारों और मुनाफ़िक़ों के एक बड़ी जमात। अगर उत्तर प्रदेश के इन्तेख़ाब में जुम्मानों ने जो आम मुस्लिम थे उनके दिलों दिमाग़ में मजलिस के नुमाइंदों के ख़िलाफ़ शक और वस्वसे ना डाले होते। मुसलमान अगर उस वक़्त बजाये अखिलेश का साथ देने के जुझारू क़ौम और मिल्लत के लिए जंग करने वाला इन्साफ़ पसंद हर दिल अज़ीज़ असदुद्दीन को वोट किया होता तो हालात कुछ और होते।
तानाशाही और दहशत के ज़ेरे इंतज़ाम काम करने वाली हुकूमत इन्तेज़ामियाँ और क़ानून भी देखता है की तुम्हारी औक़ात कितनी है और कौन सी सियासी जमात तुम्हारे साथ खड़ी है तभी फैसले होते हैं। आज अगर ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों ने क़ानून, एवान, इन्तेज़ामियाँ को गुलाम बनाया है तो उसकी वजह है उनके पास अदद शुमारी है। अगर आज एवान में ज़मीर फ़रोश मुस्लिम जनाज़ों पर सियसत करने वाली नाम निहाद सेक्युलर तंज़ीमों के बजाये मजलिस के कुछ नुमाइंदे होते तो एवान में उधम मचा देते। अगर मासूम १९ साल के असद अहमद की शहादत की तशवीश हुई है तो सबसे पहले वही "बी" टीम वाले को हुई है।
मासूम असद अहमद जिनको पुलिस ने क़तल -शहीद किया उनका निकाह होने वाला था। लड़की से बात चीत पक्की हो गई थी। अगर यही हालात किसी भारत के फौजी के साथ होते तो मीडिया की पूरी उन्सियत और हमदर्दी उस फौजी के साथ होती। लेकिन असद एक मुस्लिम थे और तानाशाही के ख़िलाफ़ थे तो तमाम झूठी बदकारी तमाम झूठे जुर्म असद के ऊपर लाद कर उनका मनफ़ी किरदार पेश किया जा रहा है। और उनका उनके वालिद उनके अहले खाना की इज्तेमाई किरदार कूशी की जा रही है। Character Assassination.
बावजूद इतना सब होने के अभी भी अबू आसिम जैसे ज़मीर फ़रोशों को अक़ल नहीं है। वोह सदा अपने ही भाई असदुद्दीन के ख़िलाफ़ बोलते रहते हैं। अरे जो तंज़ीम अपने सबसे ज़्यादा वफ़ादार आज़म खां और उनके फ़रज़न्द की इन्तेख़ाब की नुमाइंदगी ख़त्म करने पर कुछ नहीं कर पाई तो वोह आम मुसलमान के हक़ में क्या लड़ेगी।
हिन्दुस्तान में जुडिशल मर्डर हो या शहादत या फ़ांसी सिर्फ और सिर्फ यह सज़ाएँ मुस्लिम नाम पर ही वक़्फ़ हैं।
दहशतगर्दी के इलज़ाम में अभी तक सिर्फ़ तीन फ़ांसी हुई है और वोह तीनों मुस्लिम।
१.
शहीद भाई अफ़ज़ल गुरू
२.
शहीद भाई याक़ूब मेमन
३. शहीद भाई अजमल अमीर क़साब
तो क्या हिन्दू दहशतगर्द नहीं हैं। फिर राजीव गाँधी को मारने वाले कौन थे।
फिर हेमंत करकरे को शहीद करने वाले एवान में क्यों बैठें हैं। एक नहीं हर वोह हिन्दू दहशतगर्द हेमंत करकरे की शहादत में ज़िम्मेदार है जो दहशत मुस्लिम नस्ल कूशी को फ़रोग़ देता है। योगी से ले कर मोदी आडवाणी और प्रज्ञा बोहोत लम्बी फेहरिस्त है। तो क्या इनका एनकाउटर होगा कभी। या अदालते उज़मा इनको फांसी पर लटकायेगी।
इन दहशतगर्दों ने तो वतन के साथ ग़द्दारी की फौज में बग़ावत करने के मुर्तकिब हुए अज़ीम पुलिस अफसर को शहीद किया कियोंके वोह इनके कच्चे चिठ्ठे खोल रहा था।
लेकिन यह सब दहशतगर्द बजाये सज़ा पाने के क़ानून बनाने वालों में शुमार हो गए।
यही है अक्सरियत वाली सियासत इसको जम्हूरियत ना कहिये बल्कि तानाशाही कहिये जो हमने कहा उस ही में सदाक़त है नहीं माने को एनकाउटर कर देंगें।
पेश कर्दा सहाफ़ी ज़ुबेर
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