भारत में २०१४ की ग़ुलामी और ज़ाफ़रानी दहशत के चलते अक़लियतों
ख़ास मुस्लिम अवाम पर तशद्दूत फ़रेब धोखा बढ़ता ही जा रहा है। हूकूमती डकैती की वारदात ख़ास रमज़ान और बकरा ईद पर
खूब देखने को मिलती है। बकरा ईद पर ज़ाफ़रानी
दहशतगर्द बकरों, गायों, बेलों, भैसों को ज़िबह करने की निस्बत से ले जाते हुए ताजिरों
पर तशद्दूत तो करते ही है ताहम हूकूमती डाकू घरों के बहार बंधे बकरों को डकैती कर के
उठा ले जातें हैं।
बृहन्मुम्बई के किसी भी इदारे को यह हक़ कहाँ से आ गया की बकरों को अपनी गाड़ियों में ज़बरदस्ती ले जाए। फिर क्या ऐसा करने का हुकुम और क़रारदार नाफ़िज़ किया है। और अगर किया है तो उसकी मालूमात सहाफ़ियों को काहे को नहीं है। अगर नहीं किया है तो क्या इस तरह से इदारे की गाडी ला कर बकरों को ज़बरदस्ती उसमे डाल कर अपने ओहदे और हूकूमती निज़ाम के नाम के पीछे डाका डालना नहीं है। ऐसे अनासिरों के ख़िलाफ़ हुकूमत को सख़्त इक़दाम करना चाहिए।
जब सूबे महाराष्ट्र के वज़ीरे दाख़ला और नायब वज़ीरे आला ने हुकुम नाफ़िज़ कर दिया की कोई भी ग़ैर ज़रूरी अनासिर किसी भी ताजिर को बकरा ईद पर ले
जाते क़ुर्बानी के जानवरों को नहीं रोक सकता।
फिर बृहन्मुम्बई के इस फ़िर्क़ा परस्त, ज़ाफ़रानी ज़ेहनियत डाकू फितरत मुलाज़िम के
पास ऐसी कौन सी क़ुव्वत आ गई के उसने घरों के बहार बंधे बकरों को गाडी में लादना शुरू
कर दिया।
क़ौम और मिल्लत से गुज़ारिश की जाती है जब तक भारत इन ज़ाफ़रानी
गुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद नहीं हो जाता अपने आशियात की खुद हिफाज़त करें।
यह मुगलियाँ और हुकूमत ए आलमगीरी का दौर नहीं हैं जिनकी रूहानी
फैज़ की बदौलत किसी भी मज़हब की एक अकेली ख़ातून कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरे सोने के ज़ेवरों से आरास्ता
जा सकती थी और रस्ते में किसी क़िस्म की कोई दुशवारी या चोरी डकैती नहीं होती थी।
जी हाँ नाज़रीन:-
१. यह अलामगिरी वही सुनहरा दौर है जिसमे हज़रत सूफी बाकमाल मोहीउद्दीन औरग़ज़ेब आलमगीर रेहमतुल्लाह अलैहे के दौर ए बादशाहत में भारत की सरहद फ़ारस (ईरान) से ले कर तो बर्मा तक फ़ैली हुई थी।
२. यह वही औरग़ज़ेब रेहमतुल्लाह अलैहे हैं जिनको की गंगा
जमुनी तहज़ीब का मुजस्समा और मर्कज़ तस्लीम किया गया था।
३. यह वही औरंगज़ेब रेहमतुल्लाह अलैहे हैं जिनके दौर
ए बादशाहत में गद्दारों और इस्लामिक ममलेकत से बग़ावत करने वालों के सर क़लम कर दिए जाते
थे।
४. यह वही औरंगज़ेब रेहमतुल्लाह अलैहे हैं जिनका नाम
आते ही आज ८०० साल बाद भी ग़द्दारों दहशतगर्दों की नस्लों की जल जाती है। जली जली तेरी भी जली ना।
५. यह वही औरग़ज़ेब रेहमतुल्लाह अलैहे हैं जिनके नज़दीक
इंसाफ़ और अवामुं नास की ख़िदमत फ़र्ज़ ए ऊला था।
६. यह वहीँ औरंगज़ेब रेहमतुल्लाह अलैहे हैं जिन्होंने माले गनीमत (सरकारी ख़ज़ाने) से कभी अय्याशी या बेरुन मुल्क गुलछर्रे नहीं उड़ाए और ना ही अपने ज़ाती नफ़े के लिए उसको इस्तेमाल किया। वोह अपने इख़राजात क़ुरान लिख कर टोपी बून कर करते थे। तभी उन्होंने कभी हज नहीं किया जो की इस्लाम का फ़रीज़ा है। हुकूमत के ख़ज़ाने से करना नहीं था और उनके पास इतना सरमाया नहीं था।
सहाफ़ी ज़ुबेर
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