Saturday, 18 February 2023

४७ और आज का भारत वैसा ही है।

अज़ीज़ नाज़रीन 

आज के दौर का भारत वैसा ही है जैसा की ४७ या उससे क़ब्ल था।  वही ज़ेहनियत वही साजिश वही मुनाफ़ेक़त।  आज कल तमाम दुनियां को पता चल चूका है कौन शेर की खाल में छुपा हुआ भेड़िया है कौन साजिश करता है कौन दूसरों के मज़हब का चोला पहन कर अवाम को गुमराह करता है।  कौन असली दहशतगर्द है और कौन मज़लूम।  कौन परदे के पीछे का क़ातिल है और कौन मक़तूल।  लेकिन यह तो बदक़िस्मती ही कही जाएगी या हुकूमतों की ग़फ़लत की अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, श्रीलंका, नीव ज़ीलैण्ड, कुवैत में दहशतगर्दाना हमले होतें हैं और शक की सूई भी उसी मुल्क के नुमाइंदों पर जाती है।  

बद अच्छा बदनाम बूरा।

असली दहशतगर्द और साजिश रचने वाले को पकड़ो जो भारत के कोने कोने में पनप चुके हैं और उन दहशतगर्दों की तैयार की गई फ़सल अब दुनियां के कोने कोने में भेजी जा चुकी है।  अगर "हिन्दू राष्ट्र" को किसी से सबसे बड़ा ख़तरा है तो वोह इस्लाम और क्रिस्टी ही हैं।  कियोंके हिन्दू राष्ट्र की मुख़ालेफ़त में वही सबसे पहले खड़े होंगे।  तो उन मुमालिकों में हमले भी हिन्दू राष्ट्र के हामी ही कर रहें हैं।  दर हक़ीक़त सिख अवाम का कोई अलहदा मुल्क नहीं है नहीं तो वहां पर भी दहशतगर्दाना हमले हो चुके होते।

यूं तो भारत कंगाली की राह पर खड़ा है लेकिन २०० करोड़ की इमदाद तालिबान को दी जा रही है।  जिसका एहतेमाम हिंदुस्तान के बजट में किया गया है।  भारत की फ़ौज और दिफ़ाई अमल के लिए इतने बड़ी रक़म का एहतेमाम नहीं किया गया तो एक ऐसे मुल्क के लिए २०० करोड़ की इमदाद देने के पीछे की हिकमत किया है।  सिर्फ और सिर्फ दहशत को फ़रोग़ देना।  और बदनामी इस्लाम मुसलमानों की होगी। 

नाज़रीन यह महज़ सहाफ़ी का दिमागी फुतूर नहीं है बल्कि पूरी तहक़ीक़ात की गई है।  लेकिन इस बात को समझ पाने से क़ासिर है सहाफ़ी तमाम सबूत फ़राहम करने के बाद भी भारत पर कोई हिकमत आलमी बरादरी कियों नहीं करती है।  दरिंदे नाथूराम गोडसे ने मिस्टर गाँधी को गोली मारने से क़ब्ल अपना ख़तना करवाया था और कुछ दिनों मदरसे में जा कर इस्लाम की शिक्षा ली।  इस बात को कई फोरम्स और ख़बरनामों के तब्सिरों में २०१२ के बाद कई दफ़ा दोहरा चूका हूँ।  फिर सफ़ेद पायजामा कुरता पहन कर गोली मारी थी।  आज का दरिंदा ज़ालिम अंगार लगाने वालों को उनके कपड़ों से पहचान जाता है।  वोह तो भला हो पाकिस्तान का मिस्टर गाँधी को गोली मारने के बाद उसने फ़ौरन इस बात की तस्दीक़ कर दिया था की इस क़तल में हमारा हाथ नहीं है।  नहीं तो गोडसेवादिओं ने साजिश तो पाकिस्तान और मुस्लिम अवाम को बदनाम करने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी

आज कल आये दिन अमेरिका में दहशतगर्द हमले हो रहे हैं और बा एक वक़्त कमो बेश १२ से १५ लोगों की जाने जा रहीं हैं।  क्या अमेरिका ने क़ातिल की कस के तहक़ीक़ात की और क्या क़ातिल का लिंक भारत और उसके दहशतगर्द तंज़ीमों से तो नहीं मिलता है यह जानने की कोशिश की।  अगर नहीं की तो यह आलमी बरादरी की ग़फ़लत है।  मेरे पास इस बात के पुख़्ता दलील है जब भी अमेरिकी सदर, वाज़ारतख़ाना या विज़ेरे दिफ़ा कुछ भी ऐसा स्टेटमेंट देंतें जिससे भारत की अज़मत विक़ार कम हो जाता है या भारत के ऊपर दहशत को फ़रोग़ देने की बात कहीं जाती है अक़लियती तबक़े मुस्लिम, क्रिस्टी की निस्बत से भारत पर अमेरिकी बंदिश आती है, हूजूमी दहशत जैसे मामलों में अमेरिकी डंडा भारत के ऊपर पड़ता है तो अगले ही रोज़ अमेरिका में खून की होली खेली जाती है।  यह महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं है बल्कि क्रोनोलॉजिकली ऐसे स्टेटमेंट और उसके बाद हुई गोली बारी पर इस सहाफ़ी ने नज़दीकी नज़र रखी है। 

भारत के वज़ीरे दाखला सब को खूब क्रोनोलॉजी सीखा रहे थे।  आप क्रोनोलॉजी समझये क्या अमेरिका में गोली बारी के पीछे भारत की तनक़ीद तो नहीं है इस बात को समझायेगें।

आप क्रोनोलॉजी समझये जैसे ही भारत को तनक़ीद की जाती है उसके अगले ही दिन गोली बारी होती है।  क्या अमेरिका में इस क़दर आम गोली बारी माज़ी में कभी हुई थी, जितनी जारिहाना अंदाज़ में गुजिश्ता -१० सालों में हुई है।  ख़ास २०१४ से भारत की ग़ुलामी से क़ब्ल गोलीबारी की क्या सूरते हाल थी और भारत की ग़ुलामी के बाद किया है।  फिर गुलाम भारत में जब जब मोदी, बीजेपी, संघी दशहत को कटघरे में खड़ा किया के हुई गोली बारी।   हर दुसरे रोज़ गोलीबारी में मरने वाले लोगों की अदद शुमारी निकाली जाए तो शायद /११ हमले में भी उतने नहीं मरे होंगे, जितने की गुजिश्ता १० सालों में मारे गए हैं।  लेकिन यह तो मुस्लिम अवाम की बदकिस्मती ही कही जाएगी की अमेरिका ने बग़ैर तहक़ीक़ात के इराक़ के ऊपर हमला कर दिया अफ़ग़ानिस्तान को २० साल तक ग़ुलाम बना कर रखा और दोनों ही जगह नतीजा क्या निकला।  सिर्फ अपनी अना और ग़ुबार को निकालने के लिए दो ख़ुशहाल मुमालिकों को बर्बाद कर दिया। 

फिर वही सूरते हाल भारत के साथ काहे को नहीं इख़्तेयार की जा रही है।   जबकि मोदी तो ज़ालिम तरीन दरिंदा सिफ़त एक ऐसा जल्लाद है अगर उसको बीच चौराहे पर गोलियों से भून भी दिया जाए या पेट्रोल डाल कर ज़िंदा जला भी दिया जाए तो भी अवाम के ग़ुस्से और ग़ुबार का कफ़्फ़ारा नहीं अदा हो सकता। 

जैसे  इराक के सद्दाम हुसैन को फ़ासी दी गई थी दरिंदा मोदी अब इसको फांसी कब होगी। गुजरात के हिन्दू दहशतगर्दाना हमलों की बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री से गले में फांसी का फंदा फस रहा था ऊपर से अडानी ने कर मज़ीद उसको मोदी के गले कस दिया। 

सहाफ़ी ज़ुबेर

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