अज़ीज़ नाज़रीन,
मोदी हुकूमत ने इस साल के बजट में तालिबान हुकूमत को २०० करोड़ रूपये की इमदादी रक़म का एहतेमाम किया है। क्या यह दर हक़ीक़त इमदाद है या तालिबान को महसूल अदा किया गया है। भारत जैसे मुफ़लिस मुल्क जिसकी ख़ुद की अवाम दाने दाने को मोहताज है क़र्ज़ के बोझ तले दबा हुआ मुल्क २०० करोड़ की इमदादी रक़म एक ऐसे मुल्क को कैसे दे सकता है जिसका ताल्लुक़ ना तो भारत से मज़हबी है और ना ही सियासी (राये शुमारी) और जिसको भारत का ना सिर्फ अवाम बल्कि सहाफ़त, हुकूमत और आलमी बारादरी दहशगतगर्द तसव्वुर करता है।
मोदी हुकूमत यह तो बताये जो मुल्क ख़ुद ही क़र्ज़ के बोझ तले दबा है वोह किसी दुसरे मुल्क को क़र्ज़ नहीं इमदाद कैसे कर सकता है और यह पैसा किधर से आया। अगर भारत हुकूमत क़र्ज़ देती तो भी समझ में आता की वोह २०० करोड़ वापिस आ जायेगें कियोंके तालिबान सख़्त इस्लामिक उसूलों के हामी हैं और किसी भी हराम की दौलत को नहीं ले सकतें या किसी का भी क़र्ज़ खा नहीं सकते अगर क़र्ज़ लिया है तो देना है, अगर नहीं दिया तो रोज़ा ऐ जज़ा में सख़्त अज़ाब है।
में बतौर सहाफ़ी हूकूमते हिन्द से सवाल करता हूँ क्या भारत सऊदी, क़तर, कुवैत, अमीरात, पाकिस्तान जैसे मुल्कों से भी अमीर हो गया जो इमदाद करने लगा। अरे जब सऊदी ने नहीं दिया, क़तर ने नहीं दिया, अमीरात यहाँ तक की पाकिस्तान ने नहीं दिया तो तुम कियों देतें हो।
तो क्या यह समझा जाए की भारत इन अमीर तरीन मुल्कों से भी ज़्यादा अमीर हो गया। और अगर इतना अमीर है तो भारत के अवाम में मुफ़लिसी, ग़ुरबत काहे को है, भारत का शुमार अभी तक ग़रीब मुमालिकों की फेहरसित में सबसे अदना दर्जे पर काहे को फ़ाइज़ है। मतलब कीनिया और कांगों जैसे मुफ़लिस मुमालिकों की फेहरिस्त में शुमार होता है। यहाँ तक की बंगलादेश की फि शख्स आमदनी (Per Capita Income) भारत से अच्छी है। और आमदनी ग्रोथ रेट भारत से अच्छा है। भारत पर क़र्ज़ काहे को बढ़ता जा रहा है, बेरोज़गारी काहे को मुँह फाड़ रही है, मेह्गाई आसमान पर है, डॉलर रूपये के मुक़ाबले क़वी पर क़वी होता चला जा रहा है। जब इतनी परेशानी है मुल्क में तो इमदाद देने की ऐसी कौन सी हंगामी सूरते हाल थी, की देना ज़रूरी था। ऐसा महसूस हो रहा है की यह इमदाद नहीं बल्कि महसूल की अदायगी की है जो वक़्त पर अदा नहीं करने से हूकूमते हिन्द को भारी जुर्माना भरना पड़ता।
एक तर्क यह भी है, रुपया कमज़ोर नहीं हुआ है, बल्कि डॉलर मज़बूत हो गया है।
अगर भारत इतना ही दौलतमंद और अमीर मुल्क था तो अक़लियती मामलों के वाज़ारतख़ाने का बजेट ४० फीसद कम काहे को कर दिया। अफ़ग़ानिस्तान की तालिबानी हुकूमत के लिए हूकूमते हिन्द के पास इमदाद है लेकिन अपने ही मुल्क की अवाम को भूखा नंगा छोड़ देने का चलन। जैसा भी संघी बोलते है बीचारी क्या खायेगी, कहाँ रहेगी, कैसे गुज़ारा करेगी। लेकिन जब मुस्लिम ख़्वातीनों को सुहूलियत और फ़ायदा देने की बात आएगी तो पिछले दरवाज़े से भाग जायेगें। यूं मुस्लिम मस्तूरातों से हमदर्दी दिखायेगें।
वही हाल हूकूमते हिन्द का है। ग़ैरों पर करम अपनों पर सितम
जैसा
की क़ौम में कुछ हज़रात का अक़ीदा है।
१. रसूल अल्ल्हा ने कभी नहीं बनाया उनके बाद सहाबा ने नहीं बनाया क़ुरान से साबित नहीं हदीस में मौजूद नहीं तो तुम कियों बना रहे हो। "ख़ास फ़िर्क़े का सरकार की आमद पर नज़रिया"
२. मेरे अबूबकर ने कभी नहीं पड़ा उम्र बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाह जलील क़द्र सहाबी ने कभी नहीं पड़ा तो तुम कहाँ से लाये यह सलाम। क़ुरान और हदीस में दरूद भेजने का ज़िक्र है खड़े हो कर सलाम पढ़ने का नहीं। "ख़तीब Br. इमरान का सलात सलाम पर नज़रिया"
३. वोह कोई वली नहीं शैतान से अपना काम करवाता है और हम बोलतें हैं यार बड़ा वली है दिलों के हाल जान ले रा। "ख़तीब Adv फ़य्याज़ सईद का वलिओं के ऊपर नज़रिया"
तो ऐसे हज़रात के इल्म में इज़ाफ़े के लिए बता दूँ जो बन्दा शैतान से मदद लेगा उससे अपने कामों को करवाएगा, अल्लाह उससे सजदे की और हर जाइज़ काम की तौफ़ीक़ छीन लेगा। अगर बन्दा ईमान वाला है शरीयत का पासो लिहाज़ रखता है अल्लाह उसको सजदे की तौफ़ीक़ दे रहा है वोह अल्लाह से डरता है तो ऐसे बन्दे से शैतान डरेगा और अल्लाह उसको क़ुव्वत और ताक़त देगा की वोह आपके दिलों के हाल क्या मुस्तक़बिल के हाल बयान कर दे। अरे आप अल्लाह का हाथ पकड़ोगे जिस बन्दे को जो चाहे अता करे।
सरकार की आमद और सलात सलाम पर इससे क़ब्ल जवाब तहरीर कर चूका हूँ। मज़ीद उस मुद्दे पर जवाब देने की कोई हाजत नहीं है। कोविद-१९ में अल्लाह तबारक ताला ने भी मोहर लगा दी जब ढाई साल अपने हरम और सरकार के रोज़े से ऐसे अवाम को दूर रखा। जिसका ज़िक्र गाहे बा गाहे किया जा चूका है। मिलाद से कुछ २ माह क़ब्ल वही आम पैग़ाम सोशल मीडिया पर गर्दिश कर रहा था। फिर जो हुआ वोह तमामी ने देखा।
फिर जब अल्लाह वाले की परवाज़ इतनी बुलंद हो जाती है तो अब जो बात होने वाली होती है वही अल्लाह उसकी ज़ुबान से कहलवाता है। फिर ऐसे अल्लाह वाले सुकूत इख़्तेयार कर लेते हैं और दुनियां से अलहदगी। उनको चाहू जानिब अल्लाह का जलवा ही नज़र आता है। कोई कोई यादे इलाही में मजज़ूब हो जातें हैं। दुनियां से ग़ाफ़िल अल्लाह से वाक़िफ़।
सहाफ़ी ज़ुबेर
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