अज़ीज़ नाज़रीन,
जब भी हिन्दू राष्ट्र की बात होती है या हिन्दू अक्सरियत की हिमायत, मनु का क़ानून नाफ़िज़ करने, यक सा क़ानून नाफ़िज़ करने की बात होती है सबसे पहले बकवास और ग़ैर ज़रूरी मुबाहसा ले कर असदुद्दीन ओवेसी जी मैदान में कूद पड़ते हैं। जंग में ऐसे क़दीमी हथियारों के साथ अलम्बरदार होतें हैं जो १९४७ से क़ब्ल अंग्रेज़ी हुकूमत को शाकिस्त ना दे पाए थे। ऐसे क़दीमी ज़न्ग लगे फ़लसफ़ों और हथियारों से २०१४ के ग़ुलाम भारत में जदीद ज़ालिमों और दहशतगर्दों के मुक़ाबिल तवक़्क़ो जंग में फतह हासिल करने की करतें हैं।
२०१४ के ग़ुलाम भारत में हर एक हिन्दू की शिद्दत ज़ाहिर हो रही है। हर एक इस्लाम और मुस्लिम अवाम पर हमला रेज़ हो रहा है। रामदेव उर्फ़ सलवार वाले बाबा उर्फ़ काने दज्जाल की बात को किसी हद तक फरामोश कर दो कियोंके वोह कोई हूकूमती नुमाइंदा नहीं है। हलाके उसका गुनाह भी मज़हबे इस्लाम पर हमला है। जिसने मज़हबे इस्लाम की अज़मत पर चोट पहुंचाई है और नमाज़ जैसी मुक्क़द्दस इबादत का मखौल उड़ाया है। मुसलमानों की निस्बत से बोहोत सी नाज़ेबा और झूठी बातें बोली हैं। वोह तो है ही नाजाइज़ हिकमत की पैदावार लेकिन हूकूमती निज़ाम में पलने वाले कीड़े और ज़हर की बात करना एहम हो जाता है। यह हूकूमती नुमाइंदे ख़ास वज़ीरे आला, वज़ीरे दाख़ला, वज़ीरे अमूर ख़ारजा और तमाम रकूने पार्लीमान और असेम्बी जो दस्तूर पर हलफ़ लेते हैं लेकिन दस्तूर के ख़िलाफ़वर्ज़ी वाले बयान देतें हैं, ख़िलाफ़ ऐ दस्तूर अमल में सरे फेहरिस्त रहतें हैं। तो ऐसे ज़ालिमों अपने फ़र्ज़ से ग़द्दारी करने वालों को भी जवाब और सज़ा भी उस ही नौइय्यत वाली मिलना चाहिए जिसकी उनको तलाफ़ी कभी ना हो पाए। जतना बड़ा जुर्म उतनी बड़ी सज़ा।
योगी के एक बयान पर असदउद्दीन ओवेसी जी हस्बे मामूल उसको किताब मतलब दस्तूर का दर्स देने लगे। और योगी से पूछतें हैं ऐसा किस किताब में लिखा है। अरे बाबू कब तक इन ज़ालिमों ग़द्दारों के गंदे ग़लीज़ मुँह से ख़ारिज इस तरह की बकवास सून कर किताब का हवाला देते रहोगे। बीजेपी, संघी और शिद्दत पसंद काफ़िरों की हर ऐसे नाज़ेबा बात का सही जवाब है बटवारा, तक़सीम। आपको क्या लगता है आप किताब का हवाला मागेंगे दस्तूर की बात करेगें क़ानून की दुहाई देंगें तो यह लोग मान जायेगें। अरे जब इन काफिरों ने ठान लिया है हिन्दू राष्ट्र बनाना तो बनायेगें। और आपकी इस तरह की ऊल जलूल बकवास और इन ज़ालिमों के हर हमले का दिफ़ा करने की हिकमते अमली से अब कुछ नहीं होने वाला है। अब तो यलग़ार या हमला करने का वक़्त है। हेमंत बिस्व शर्मा कुछ बोलता है योगी कुछ बोलता है अमित कुछ बोलता है गोडसे की नाजाइज़ औलाद नाथूराम मिश्रा कुछ बोलता है। अगर इनकी तमाम बातों को सिर्फ सविधान और क़ानून की कताबों का हवाला दे कर जवाब देते रहे तो तुम्हारी नस्लों को वोह सब भोगना पडेगा जो तुमने और हमने भोगा है।
अगर इन ज़ालिमों को दहशतगर्दों को आईंन का पासो लिहाज़ होता क़ानून की अज़मत होती तो आला अदालत एक पालतू जानवर के जैसे इन दहशतगर्दों के सामने सजदा रेज़ नहीं होती। हर उस मुद्दे पर ग़ैर अख़लाक़ी, ग़ैर क़ानूनी, ग़ैर आईनी फैसला हुआ है जो मुस्लिम और अक़लियतों के जज़बात और हक़ से मुनसलिक था। "का", एन.आर.सी. एहतेजाज और दिल्ली दंगों के बाद आज ढाई तीन साल बाद अब आहिस्ता आहिस्ता मुस्लिम नौजवान जेलों से बहार आ रहें हैं। जब सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, ऐवान सभी दहशत के हिमायती हो गए तो आप किस क़ुव्वत पर क़ानून की दफा इन ज़ालिमों को पढ़ा रहे हो। दस्तूर बता रहे हो। यह लोग ना ही दस्तूर को और ना ही मौजूदा क़ानून को मानते हैं। अब आप भी वही करो जो इनको दुःख दे। यह लोग आईनी तरमीम कर के "मनु स्मृती" नाफ़िज़ करना चाहतें हैं। तो आप तोहसीह सरहद या तक़सीम की बात करो। बटवारे में एक होगा हिन्दू राष्ट्र और दूसरा सेक्युलर इंडिया। लेकिन उस सेक्युलर इंडिया से एक एक ऐसे कीड़ों को दवाई डाल कर ख़तम कर देना होगा जो ज़हरीली खेती से पैदा हुए थे। इसमें वोह मुस्लिम कीड़े भी आ जायेगें जो बीजेपी, संघी और शिद्दत पसंद काफिरों के हामी और हिमायत में थे।
असद साहब आपको लगता है की यह लोग किसी क़ानून की ज़ुबान समझ सकेगें और इनके ऊपर क़ानून का शिकंजा काम करेगा। क्या इन दरिदों को क़ानून का पासो लिहाज़ है। दस्तूर की अज़मत है। मुझे लगता है नहीं है जो इनके किरदार और तर्ज़े अमल से ज़ाहिर हो तो कुछ भी कर लो यह करेगें वहीँ जो इनको करना है। तो आप भी वही करो जो इनको तकलीफ़ दे ईज़ा पहुचाये। तक़सीम, बटवारा या सरहद की तरमीम। पाकिस्तान की तोहसीह।
२०१४ से क़ब्ल भारत में सबसे क़ब्ल मोदी ने सहाफत को अपने क़ब्ज़े में किया और २०१४ के ग़ुलाम भारत में आज की तारीख़ में हर हूकूमती निज़ाम ग़ुलाम हो चूका है। आपको इस ग़ुलामी से अवाम को निजात दिलवाना है। दस्तूर की बातें क़ानून की दफ़ा बताना अब इन ज़ालिमों, दरिंदों, शैतानों और दहशतगर्दों पर वैसा ही है जैसा की शमशीर लिए हुए एक ज़ालिम से अपनी जान की अमान मांगना। भीक मांगने और मज़ीद ज़लील होने से अच्छा है की मुक़ाबला कर के जंग लड़ के अपना हक़ ले लिया जाए नहीं तो जान तो वैसे भी जानी ही है। कियोंके इन ज़ालिमों ने ते कर लिया है की मुस्लिम, क्रिस्टी और सिख अवाम का क़त्ले आम करना है। हिन्दू राष्ट्र क़ायम करना है तो आप भी वही बात करो जो जंग में इन लोगों के ऊपर मिसाइल के हमले जैसी साबित हो।
आप ज़न्ग लगी शमशीरों से पुराने फ़लसफ़ों से जदीद तरीन दुश्मन से जंग जीतने की उम्मीद सजा बैठे हो। हाँ अगर पुराना फ़लसफ़ा इस्लामिक उसूलों पर मब्नी है तो जंग जीत सकते हो। और कहीं भी इस्लाम में ऐसा नहीं कहा गया है की ज़ालिम से जंग मत करो, सिर्फ ज़ुबानी जमा ख़र्च में काम निकालते रहो। अब पानी सर से ऊपर हो चूका है कोई भी सड़क छाप दरिंदा उठ कर नबी की शान में कुछ भी बोल देता है, नमाज़, क़ुरान, इस्लाम, अल्लाह सभी तो रुस्वा हो गए अभी भी सिर्फ दस्तूर और क़ानून की दफ़ा बताने वाली बेवक़ूफ़ी, लायानी बातें ही करेगें, या बटवारे पर भी बात करेगें।
सहाफ़ी ज़ुबैर
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