अज़ीज़ नाज़रीन,
अभी पाकिस्तानी दहशतगर्द और मुमकिना जासूस को भारत ने पदमश्री तमग़े से सरफ़रोज़ किया है. ये शख़्स पाकिस्तानी फौज के अफसर का फ़रज़न्द
हे. जिसने १९६५ की जंग में भारतीय फ़िज़ाई अड्डे को नेस्तनाबूत कर दिया था और अनगिनत तय्यारे तबाह और बर्बाद कर दिए थे. उस जंग में इस अफसर की कारगरदेगी और बमों की बौछार की वजह से भारीतय फौज चूहों की मानिंद अपने बिलों में पोशीदा होने पर मजबूर हो गई थी. इस मुद्दे पर इस सहाफी ने एक ट्वीट किया है.
Zuber Ahmed Khan
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बिलकूल सही है नही देना चाहिये था. इस मुद्दे पर कल ही बोहोत लम्बी बेहेस हो चूकी है ओर इस पत्रकार के तर्क को बोहोत सराहा गया. इस शख्स के अवॉर्ड से क्यों ए पत्रकार इत्तेफाक़ नही रखता उसकी दो वजह है. एक अभी तो इसको नागरिकता मिले हूए 2-3 साल ही हूए है ओर भारत का इतना बड़ा अवॉर्ड. दूसरी बात है क्या पता ए आदमी पाकिस्तानी जासूस हो ओर इसके दिल मे क्या है किसको पता. पाकिस्तानी हूकूमत ने इसको जान बूझ कर भारत भेजा हो. क्योंके ए कब भारत आया है जब पाकिस्तान आतंकवाद के जंजाल से जूझ रहा था ओर भारत मे आम तौर पर पाक जासूस घूस जाया करते थे. आई अस आई एजेंट. ए पत्रकार समझने से कसीर है की मोदी हूकूमत को इस शख्स की सिर्फ ज़ूबानी जमा खर्च, भारत की पोटना, भारतीय आर्मी की पपोलना ओर पाकिस्तान को कोसने के उपर इतना ऐतेमाद कैसे हो गया. अगर अवॉर्ड का पैमाना ही ए ही तो मोदी हूकूमत की जहालत है. आगे पछताना पड़ेगा. क्योंके इसका किरदार विवादों से भरा है. एक पत्नी को ट्रिपल तलाक़ दिया दूसरी के साथ अनेटिक सम्बंध बनाये कई सालों तक बॉमबे हाइ कोर्ट मे केस चला तो क्या ऐसी मुजरिमाना सौच वाले ही बीजेपी मे सबसे प्रतिशतित अवॉर्ड के हक़दार होते हैं. हा भई बीजेपी मे खूद एक से बड़े एक मुजरिम ओर डाकू बस रहे है जो अवॉर्ड पाते है तो ऐसा ही किसी को तलाश कर देंगे अवॉर्ड. आतंकी गद्दार सावरकर भी तो अवॉर्ड के रेस मे है. उसका क्या हूआ. ये पाकिस्तानी भी दूसरा सावरकार साबित होगा.
आज उस फौजी के सपोले को मोदी इंतेज़ामिया ने सबसे अज़ीम तमग़े से नवाज़ दिया है. इस शख़्स की इज़्ज़त
अफ़ज़ाई
पर इस सहाफी को शदीद इज़ा पहुंची थी इसलिए नहीं के एक पाकिस्तानी को तमग़ा दिया गया बल्कि इसलिए की वो शख़्स उसके लिए अहल नहीं था. इस पाकिस्तानी जासूस को भारत का शहरी बने हुए महज़ दो साल ही हुए हैं दूसरा इसके माज़ी के साथ सख़्त सियाह सबक़ जुड़े हुए हैं. फिर अगर ऐसे शख़्स को मोदी इंतेज़ामिया आला तरीन तमग़े से नवाज़ रही हैं जिसका इंसानी हुक़ूक़ की निस्बत से क़ौम और मिल्लत की निस्बत से जिसका भारत की बक़ा और फलाह की निबस्त कोई भी क़ाबिले
फख्र अमल
नहीं
है, तो ये मोदी इन्तेज़ामियाँ की जहालत और नाहीली होगी. अब अगर आला तरीन तमग़ों का पैमाना इंसान
की फितरत उसकी ज़हानत, फिक्रमंदी या दानिशमंदी नहीं है बल्कि दहशतगर्दों को सराहने की
एक वजह है तो ये सहाफी मोहम्मद अफ़ज़ल गुरू, याक़ूब मेमन और बुरहान वानी के लिए परमवीर चक्र की सिफारिश करता हैं. उसकी वजूहात बताता हूँ.
१.
अफ़ज़ल गुरू और बुरहान वानी को कश्मीर के अवाम दिलों जान से चाहतें हैं और उनके नाम पर अपने आप को क़ुर्बान कर सकतें हैं. और याक़ूब मेमन को तो तमाम इन्साफ पसंद अवाम चाहतें हैं. जिनके लिए रा के साबिक़ चीफ की सिफारिश थी की उनका जुडिशल मर्डर कर के शहीद ना किया जाए.
२.
दूसरी वाजिब वजह हैं तीनों के साथ मुंसिफाना फैसला नहीं हुआ. तीनों के साथ ना इंसाफ़ी हुई और उनको अदलिया ने गैर ज़रूरी क़त्ल कर दिया जिससे उन तीनों को शहीद का दर्जा भी मिले.
३.
बुरहान वानी के साथ भारतीय फौज ने ज़ालिमाना कारगरदेगी की थी. जब वो महज़ ९ साल के थे तब स्कूल से घर जाते वक़्त फौज ने उनको और उनके दोस्त ख़ालिद को अगवाह कर लिया था. फिर उनकी नज़रों के सामने ख़ालिद को बे ज़र्ब मारा पीटा गया जिसकी वजह से वो मासूम शहीद हो गया. फिर उसकी जसत विकृत हालत में बग़ैर कोई उज्र और जवाज़ बताये घर वालों को सौंप दी. जिसका बुरहान के दिलों दिमाग पर शदीद धक्का बैठा और वो दिफ़ाई फौज का एहम किरदार बन गए. जिस हिसाब से याक़ूब मेमन को अदालती क़त्ल किया गया था, तो उससे पेश्तर बाबरी मस्जिद को शहीद करने वालों को फ़ासी देनी थी. जिन बजरंग दल और संघ के दहशतगर्दों ने बॉम्बे और
तमाम भारत में दिसम्बर १९९२ और जनवरी १९९३ में ग़दर मचाया था और क़त्ले आम किया था पहले उनको फ़ासी देनी थी.
नाज़रीन मेरे ज़ुबानी मिसाइल के ज़र्ब से संघी, शिद्दत पसंद और बीजेपी वाले शदीद ज़ख़्मी हो जातें हैं. गुजिश्ता मज़मून गन्दी बात नहीं करते इंसान, कौन हो तुम, साधु या शैतान. पर किसी शिद्दत पसंद और संघी का बदकलामी का एहसास तो नहीं हुआ अलबत्ता दो मस्तूरातों के फोन आये थे शायद लँगूरनियों के गिरहो से होंगी. उन्होंने अपनी शिनाख़्त तो ज़ाहिर नहीं की लेकिन उस मज़मून में जो लँगूरनियों के लिए हक़ गोई की थी उसपे ख़ासी खफा दिख रही थी. उनके दीगर एतेराज़ात के साथ मज़मून की सख़्त गोई और अदना दर्जे की तहरीर पर भी शिकायत थी.
नाज़रीन
आप
तमाम
हज़रात
को
संघी,
शिद्दत
पसंद
और
बीजेपी
के
नुमाइंदों
को
बताना
चाहता
हूँ
की
में
उसी
ज़ुबान
में
कलाम
करना
मुनासिब
समझता
हूँ
जिस
ज़ुबान
को
सामने
वाला
समझ
पाए. रहा सवाल
संघियों
और
शिद्दत
पसंदों
का
तो
वो
हद
दर्जे
की
अदना
और
गलीज़
ज़ुबान
समझ
पातें
हैं
क्योंकि
उसकी
ज़ेहनियत
और
घरेलू
माहोल
से
उनको
ऐसी
ही
तरग़ीब
मिली
होती
हैं. फिर इस
सहाफी
का
फलसफा
हैं
की
एक
७-८
महीने
के
बच्चे
के
सामने
अगर
ऑक्सफ़ोर्ड
इंग्लिश
या
आला
तरीन
ज़ुबान
में
कलाम
करना
शुरू
कर
दिया
तो
वो
समझ
ही
नहीं
पायेगा. दूसरी बात
एक
माँ
की
ज़ुबान
को
बच्चा
सबसे
अच्छी
तरह
समझ
पाता
हैं
फिर
क्यों
कोई
भी
माँ
अपने
बच्चे
से
तुतला
के
और
तोतली
ज़ुबान
में
बोलती
हैं
क्यों
नहीं
उससे
साफ़
शफ़्फ़ाफ़
अलफ़ाज़
में
बात
करती
हैं.
क्योंकि
ऐसी
तुतलाती
हकलाती
ज़ुबान
बच्चा
बा
खूबी
समझ
जाता
हैं
जबकि
आला
तरीन
ज़ुबान
में
बोला
तो
नहीं
समझ
पायेगा.
फिर
ज़ाफ़रानी
मीडिया
के
इन
लंगूर-लँगूरनियों
से
एक
सवाल
करता
हूँ
बिल
फ़र्ज़
इनको
यूगांडा
या
साउथ
अफ्रीका
के
ऐसे
देश
या
जंगल
में
जा
कर
न्यूज़
स्टोरी
कवर
करने
का
वक़्त
आये
जहाँ
की
ज़ुबान
आदिवासी
हो
और
वो
लोग
लीचिंगस्थान (भारत) के हब्शिओं
की
तरह
ही
कोई
और
ज़ुबान
ही
नहीं
जानते
हों
तो
ये
लँगूरनिया
कैसे
काम
करेंगीं. इनको उनकी
ज़ुबान
बोलने
के
लिए
किसी
तर्जुमा
करने
वाले
को
साथ
लेना
होगा
या
इशारों
से
टूटी
फूटी
ज़ुबान
में
बोलना
होगा
या
फिर
उनकी
ज़ुबान
सीखनी
होगी.
२०१२-१३
तक
इस
सहाफी
की
ज़ुबान
कभी
भी
ऐसी
नहीं
हुई
जैसी
की
आज
कल
हैं. लेकिन उसके
हर
तन्क़ीदी
नुक़्ता
चीनी
वाले
मज़मून
पर
गाली
गलोच,
मेरे
घर
की
मस्तूरातों
के
ऊपर
हमले
करने
की
धमकी,
जान
से
मार
डालने
की
धमकी
बिल
आखिर
मज़हब
इस्लाम,
क़ुरान
और
प्रोफेट
पर
हमले. फिर इस
सहाफी
ने
तमाम
अपनी
तालीम, नवाबी तहज़ीब और सुख़न ज़ुबान
को
बोलना
बंद
किया
और
इन
दहशतगर्दों
से
मुक़ाबला
करने
के
लिए
इन्ही
की
ज़ुबान
बोलना
सीख
ली. शुरू शुरू
में
थोड़ी
सी
तकलीफ
हुई
और
अटपटा
भी
लगा
गलीज़
ज़ुबान
और
गाली
गलोच
करते
हुए
अच्छा
नहीं
लग
रहा
था,
लेकिन
धीरे
धीरे
आदत
हो
गई. अब तो
अगर
कोई
खाकी
चड्डी
धारी
जया
प्रदा,
हेमा
मालिनी
या
लँगूरनियों
में
से
श्वेता
सिंह,
अंजना
ॐ
कश्यप,
रूबिका
लियाक़त,
चित्रा
त्रिपाठी,
रूबाना
एहसान
की
तरह
कोई
मुँह
लगता
हैं,
झूट
फरेब
फैलाने
की
कोशिश
करता
हैं तो उसको
पूरी
तरह
बरहना
करने
की
हैसियत
रखता
हूँ.
आज
भारतीय
फौज
के
किसी
भी
काम
को
बढ़ा
चढ़ा
के
दिखाया
जाता
हैं. अदना सी
बात
को
कुर्बानी
का
नाम
दिया
जाता
हैं.
सियाचीन
में
जो
फौजी
काम
करतें
हैं,
उनको
बड़े
बड़े
माराआत
से
नवाज़ा
जाता
हैं. कुर्बानी कैसी.
ये
मुलाज़मत कर रहे
हैं
इसके
एवज़
में
इनको
मौटी
रक़म
मिलती
है.
ये
लोग
कोई
भी
काम
फोकट
मे
कर
रहे
हैं
क्या??.
इनसे
बड़ी
तो
शहीन
बाग़
की
ख़वातीनों (दादियों) की
कूर्बानी
है.
जो
बग़ैर
किसी
लालच
ओर
पेसे
के
0 डिग्री
मे
आज
कमो
बेश
४०
दिन
से
ज़ाइद
बेठी
हैं. इन खरीदे
हूए
इंसानों
(फ़ोजिओं)
से
बड़ी
तो
इस
सहफी
की
कूर्बानी
है
जो
२०१०
से
बिना
लालच
लिख
रहा
है.
ओर
२०१४
तक
मोदी
हूकूमत
आने
तक
हर
महीने
कम
से
कम
५०००
से
७०००
हज़ार
रुपये
सिर्फ
लेटेर
बाज़ी
ओर
ज़ेरॉक्स,
रजिस्ट्री,
पोस्टेज
मे
खर्च
कर
देता
था.
मोदी
हूकूमत
आने
के
बाद
भी
३
पेटिशन
डाली
थी
वो
भी
अपने
खूद
के
खर्चे
से.
फिर
इन
फ़ोजिओं
को
तो
हर
चीज़
पर
रियारत
मिलती
है.
जब
बेनिफिट
मिल
रहा
है
तो
थोड़ा
सा
अपने
हक
मे
कमी
आ
गई
तो
कोई
एहसान
नही
किया.
उससे
ज़्यादा
तो
बेनेफिट
ले
लिया.
एहसान
फरामोश.
ए
वतन
परस्ती
नही
है
बल्कि
खूला
कारोबार
(धंदा)
है.
भारतीय
हुकूमत
तमाम
फायदे
रोक
दे
फिर
देखे
क्या
होती
है
वतन
परस्ती.
फ़ौजिओं का
अमल
क़ाबिले
फख्र
नहीं
हैं
बल्कि
वो
तो
एक्सचेंज
ऑफर
के
जैसा
काम
कर
रहें
हैं. हर क़ुर्बानी
के
एवज़
में
बड़ा
फायदा. फिर रेल,
बस,
होटल
यहाँ
तक
की
घरेलू
चीज़ों
से
ले
कर
गाडी
घर
फ्लेट
ज़मीन
हर
चीज़
पर
रियायत
हैं. फिर नौकरी
के
बाद
बड़ी
पेंशन.
क़ुर्बानी
वो
जो
बग़ैर
किसी
लालच
के
की
जाए
और
उसमे
आपका
अपना
कोई
ज़ाती मफ़ात
पोशीदा
ना
हो
बल्कि
अवाम
का
फायदा
हो
और
नुकसान
आपका
हो,
बग़ैर
किसी
फायदे
के. जैसा की
ये
मस्तूरातें (दादियाँ) कर
रही
हैं,
इनका
क्या
फायदा
हैं. या इस
सहाफी
ने
किया
ना
ही
इसका
कोई
सियासी
नफा
लेने
की
नियत
थी
और
ना
ही
पैसा
कमाने
की
नियत. हालांकि २०१०
के
बाद
बोहोत
बड़ी बड़ी
पेशकश
आईं,
बेरुन
मुल्क
से
भी
आई. चाहता तो
किसी
भी
बड़ी
फर्म
में मुलाज़मत कर
सकता
था. यहाँ तक
की
सहाफत
में
भी
अमेरिका
के
एक
अंग्रेजी
अखबार
से
पेशकश
थी. हिंदुस्तान में
बड़े
बड़े
अंग्रेज़ी खबरनामों से पेशकश
थी
लेकिन
अब
गुलामी
पसंद
ना
थी. फिर लॉ
के
जो
दो
साल
बचे
थे
उसको
पूरा
कर
के
वकील
बन
सकता
था. लेकिन अब
काम
ऐसा
करना
था
जिसमे
पैसे
के
लिए
अपने
ज़मीर
का
सौदा
नहीं
होने
पाए. वकील बनता
तो
मुवक्किलों
के
पीछे
रहता
और
उनका
ही
काम
करता
जो
पैसा
देतें
हैं.
आज
कोई
भी
ख़बर
कवर
करने
के
लिए
या
ख़बर
की
तेह
तक
जाने
के
लिए
अपने
खुद
के
सरमाये
और
जेब
के
रुपयों
का
इस्तेमाल
करता
हूँ. कश्मीर में
अफ़ज़ल
की
फ़ासी
के
२
महीनों
के
बाद
हालात
का
जायज़ा
और
रिपोर्टिंग
करने
का
मामला
हो
या
पठानकोट,
उरी
या
पुलवामा
की
तहक़ीक़ात
हो
सब
कुछ
अपने
बूते
पर
किया
है.
२०१४
के
बाद
जिस
तरह
से
सहरांगपूर
उत्तर
प्रदेश
और
हैदराबाद
में मोदी ने सिख-मुस्लिम
दंगा
करवाया
था
उसकी
भी
तहक़ीक़ात
पूरी
तरह
से
मेरी
निजी
सारमाये
पर
थी. उसके ऊपर
पूरी
रिपोर्टिंग
इसी
ब्लॉग
में
की
है.
किस
तरह
से
अहमदाबाद,
बड़ोदा
और
गुजरात
से
दहशतगर्दों
को
फ़रोख़्त
कर
के
हैदराबाद
की
फ़िज़ा
को
ख़राब
कर
के
असदुद्दीन
को
हारने
के
लिए
लाया
गया
था.
कुल
मिला
के
ये
सहाफी
गुज़ारिश
करना
चाहेगा
की
अगर
जासूसी
के
शक
वाले
एक
पाकिस्तानी
शख़्स
को
आला
तरीन
तमग़ा
मिल
सकता
है
तो
ना
इंसाफ़ी,
फ़िरक़ापरस्ती और
मज़हबी
मवाद
का
शिकार
हुए
शहीद
अफ़ज़ल,
याक़ूब
और
बुरहान
को
उनकी
शहादत
और
बहादुरी
के
लिए
परमवीर
चक्र
दिया
जाए.
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