"उस हिन्द की तक़सीम में शामिल थे लहू के दो रंग
इस हिन्द की तक़दीर में शामिल है अश्क और ग़म”.
सहाफी जुबेर
अज़ीज़ नाज़रीन और ब्रादराने मिल्लते इस्लामियां,
आज़ादी आज़ादी आज़ादी हम ले कर रहेगें,,,,,,, आज़ादी,,,,, दुश्मन से लेंगे आज़ादी,,,,, भगत सिंह वाली आज़ादी, है अशफ़ाक़ वाली आज़ादी, आतंकवाद से आज़ादी, फासीवाद
से आज़ादी, तानाशाही से आज़ादी,,, चाहे डंडे मारो आज़ादी, चाहे गोली मारो आज़ादी चाहे जेल में डालो आज़ादी. आज़ादी आज़ादी आज़ादी.
आज कल जो कुछ भी हालात भारत के चल पड़ें हैं उनकी आहट इस सहाफी को दिसम्बर २०१७ उसके बाद मुतवातिर २०१८,२०१९ में होती रही. जब हूकूमते हिन्द ने दहशतगर्दों को भेज कर कश्मीर पर बंदूक के ज़रिये क़ब्ज़ा किया था तब इस सहाफी ने एक मज़मून लिखा था “शैख़ अबदुल्लाह की ग़लती ना दोहराएँ मुसलमान” जो आज के हलाते हाजरा पर सो फि सद दुरुस्त और सही साबित होता है.
आज ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर और लँगूरनियाँ शिद्दत पसंद, बीजेपी के नुमाइंदे और संघ के दहशतगर्द जिस अंदाज़ में मीठा मीठा बोल रहे हैं ये उनकी महज़ एक चाल और फरेब है. बिल फ़र्ज़ मुसलमान इस जाल में फसे की उनकी नस्ले ख़त्म हो जायेगी. दो बातें वाज़ें करना चाहूंगा. अगर हुकूमत के हर सियाह कारनामे, बदकारिओं दग़ाबाज़ी को अपनी तक़दीर समझ कर सहते गए तो भी हुकूमत तुम्हारे साथ धोखा करने ही वाली है और अगर आज जंग लड़ी और हुकूमत के किसी भी ग़ैर क़ानूनी ग़ैर शराई बात की ताईद नहीं की तो कल तुम्हारी नस्ले फख्र के साथ बोल सकेगी की हमारे बाप दादाओं ने ज़ालिम हिटलर के तलवे नहीं चाटे और ना ही जनरल डायर की गोलिओं से ख़ौफ़ज़दा हो कर घुटने टेंके. जैसे किसी समाज के बाप दादाओं ने खौफ ज़दा हो कर अंग्रेज़ों के सामने घोटने टैंक दिए थे और ५० दफा माफ़ी नामा लिख कर दिया था की में गुलामी क़ुबूल करता हूँ.
आज जिस फख्र से अशफ़ाक़ उल्लहा खान और भगत सिंह के वारिस अपने आबो अजदाद का नाम लेते हैं क्या संघी, कट्टरपंथी हिन्दू और
बीजेपी के नुमाइंदे ख़ास क़ौम के गद्दारों को अंग्रेज़ों की गुलामी के बाद इतने ही फख्र से नाम लेते हुए सूना है. नहीं हरगिज़ नहीं.
फिर जो बात २०१७ में इस सहाफी ने हूजूमी दहशत कर लीचिंग पर कही थी की अभी लीचिंग सिर्फ मुस्लिम अवाम की हो रही है तो हिन्दू शिद्दत पसंद दानिशमंदों के लिखे ख़त के ऊपर तनक़ीद कर रहें हैं लेकिन कल जब हिन्दू अवाम खुद हूजूमी तशद्दुत का शिकार होना शुरू होगा तब इनको एहसास होगा की हमसे कुछ तो गलत हो गया. उसके बाद तक़रीबन ज़्यादातर मामलों में हिन्दू हुजूम ने खुद हिन्दू की लीचिंग कर दी. जिसमे दिल्ली का वो मासूम साहिल भी शामिल है जिसको मुस्लिम तस्लीम कर के ब्राह्मण वाड़ी के ब्राह्मण (कपिल मिश्रा) जैसे आतंकी और हुजूम ने हलाक कर दिया था.
जब से "का" कानून बना है और एन.आर.सी., एन.पी.आर. जैसे सियाह क़ानूनों की वजह से मुल्क भर में दहशत का माहौल है तब से ये सहाफी अपने पिछले ४-५ मज़्मूनों में लिख चूका था की ऐसे क़ानून सिर्फ मुस्लिम अवाम को मुत्तासिर नहीं करेगें बल्कि पहले मुस्लिम फिर बाद में उसकी तपिश सेक्युलर हिन्दू अवाम को भी सहना पड़ेगी. अंग्रेजी के एक मज़मून में साफ़ तौर पर मेने कहा है की जब हिटलर की फौजें गोलियां बरायेगी तो ये नहीं देखेगी की सामने हिन्दू है या मुस्लिम दोनों को एक ही वेसल में सवार कर के हलाक कर डालेगी. बस ज़िंदा रहेंगे तो संघी दहशतगर्द, शिद्दत पसंद और बीजेपी और उसके मुहाफ़िज़. अभी तो कोई भी ऐसा क़ानून लागू भी नहीं हुआ और बेंगलोर जैसे बोहोत बड़े शहर में ३०० से ज़ाइद हिन्दू अवाम के घरों को बिलडोज़र से मिस्मार कर दिया. अभी तो कुछ भी नहीं है आगे आगे जो तबाही में देख सकता हूँ वो ना ही ना बिना अकीदतमंद देख सकतें हैं और ना ही हिटलर की ज़ालिम फौज.
जैसा की हर मुस्लिम अवाम ने ये अज़्म किया है की हुकूमत के किसी भी नुमाइंदे को अपने कोई भी दस्तावेज़ शहरियत साबित करने के लिए नहीं देंगे. सही क़दम है और इस तरीक़ेकार हिकमत का ये सहाफी ख़ैर मक़दम करता है. इस सहाफी ने अपने कोई भी दस्तावेज़ किसी भी हुकूमत के नुमाइंदों को देना बंद कर दिए हैं. अभी गुजिस्ता हफ्ते मरकज़ की जानिब से एक तहक़ीक़ात इस सहाफी की तक़सीम पेटिशन की निस्बत से आई थी. कमिश्नर पुलिस की जानिब हाज़िर हुआ हालांकि तमाम कागज़ात लाने की अपील करने के बाद भी कोई भी दस्तावेज़ फ़राहम नहीं किये. घर से निकलते वक़्त पूरा अज़्म कर के निकला था अगर दस्तावेज़ ना देने पर गिरफ्तार करतें हैं या डिटेंशन सेंट्रर भेजते हैं तो उसके लिए तैयार था. ऐसा सभी अवाम को करना चाहिए. ये जंग अब एक सख़्त मरहले में पहुंच चुकी है जिसका ज़िक्र अपने एक मज़मून "ग़ज़वए हिन्द होगा" में कर चूका हूँ.
जैसा की हर मुस्लिम अवाम ने ये अज़्म किया है की हुकूमत के किसी भी नुमाइंदे को अपने कोई भी दस्तावेज़ शहरियत साबित करने के लिए नहीं देंगे. सही क़दम है और इस तरीक़ेकार हिकमत का ये सहाफी ख़ैर मक़दम करता है. इस सहाफी ने अपने कोई भी दस्तावेज़ किसी भी हुकूमत के नुमाइंदों को देना बंद कर दिए हैं. अभी गुजिस्ता हफ्ते मरकज़ की जानिब से एक तहक़ीक़ात इस सहाफी की तक़सीम पेटिशन की निस्बत से आई थी. कमिश्नर पुलिस की जानिब हाज़िर हुआ हालांकि तमाम कागज़ात लाने की अपील करने के बाद भी कोई भी दस्तावेज़ फ़राहम नहीं किये. घर से निकलते वक़्त पूरा अज़्म कर के निकला था अगर दस्तावेज़ ना देने पर गिरफ्तार करतें हैं या डिटेंशन सेंट्रर भेजते हैं तो उसके लिए तैयार था. ऐसा सभी अवाम को करना चाहिए. ये जंग अब एक सख़्त मरहले में पहुंच चुकी है जिसका ज़िक्र अपने एक मज़मून "ग़ज़वए हिन्द होगा" में कर चूका हूँ.
लँगूरनियाँ ये ना समझे की हम बीजेपी की बोली बोल रहें हैं हम दहशतगर्द अमित को खुश कर रहें हैं हम हिटलर की मालिश कर रहें हैं तो हम बोहोत मेहफ़ूज़ हैं. हरगिज़, नहीं बिल्कुल नहीं. किसी भी ग़फ़लत में ना रहें ये लँगूरनियाँ इन्होने भेड़ियों को मॉस और ख़ून का आदि बना दिया है. अब इनकी बारी है.
जहाँ ज़र्रा बराबर खबर देने में उंच नीच हो गई की इनकी इज़्ज़त की धज्जिया उड़ा दी जायेगी. ख़ास नाम बा ना लिख रहा हूँ, जिनके ऊपर सख़्त खतरे के बादल हैं और ये लँगूरनियाँ अदना मरहला बदकलामी, हाथा पाई से ले कर इन्तेहाई क़वी मरहला या दर्जा ज़िना बिल जब्र तक का शिकार हो सकतीं हैं. स्वेता सींग, अंजना ॐ कश्यप, रूबिका लियाक़त, रूबाना एहसान, चित्रा त्रिपाठी. इनमे से रूबाना एहसान और चित्रा त्रिपाठी हैं तो संघी दहशतगर्दों, शिद्दत पसंद हिन्दू और बीजेपी के राडार के ऊपर फिर भी खतरा कम है. लेकिन आगे की तीन तो बे हद ख़तरे में हैं.
जहाँ तक इस सहाफी की जानकारी है भारत की तक़सीम तो होगी और हर हाल में होगी. अब देखना ये ही होगा की तक़सीम कितने हिस्सों में होती है. हिन्दू राष्ट्र के साथ साथ कश्मीर, पंजाब, नार्थ ईस्ट, आसाम और सेक्युलर इंडिया या फील वक़्त भारत सिर्फ दो हिस्सों में तक़सीम होता है हिन्दू राष्ट्र और सेक्युलर इंडिया.
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