दरिंदा, खुनी, ज़ालिम तानाशाह मोदी जुर्म करने के लिए मश्क़ करते हुए
दरिंदा सिफ़त हिटलर ज़ेहनियत मोदी से खुद हिन्दू
अवाम ने बनाई दूरी. टूटा मोदी ज़िम्नी जाल
और फुट गया गलीज़ ग़ुब्बारा. मोदी पडोसी मुल्क
वेस्ट बंगाल के दो रोज़ के दौरे पर है. वहां
पर उसको सख़्त ज़लालत और बेइज़्ज़ती का सामना करना पड़ रहा है. पहले चीख़ बाज़ों ने उसके ऊपर चीख़ के नारे फेके. उसके बाद रामकृष्ण मठ और मिशन ने बरोज़ इतवार मोदी
के शहरियत तरमीम कानून पर दिए हुए बयान से ये कहते हुए दूरी बना ली है की वह एक ग़ैर
सयासी तंज़ीम है और ऐसे बयानात पर कोई राय नहीं रखेगें. यह मोदी जैसे हिटलर और ज़ालिम तानाशाह के लिए हद
दर्जे की ज़लालत और बेइज़्ज़ती है की जिन हिन्दू अवाम के लिए वो और उसकी तंज़ीम खूँखार
दहशतगर्द संघ और बीजेपी खूब उठा पटक कर रहें हैं उसी हिन्दू तंज़ीम राम किशन मिशन और
मठ ने मोदी के बयान को दायमी और जहालत से भरा बोल के कोई भी तास्सुर नहीं दिया और उसके
ऊपर तब्सिरा, बेहेस और मुबाहिसा करना भी मुनासिब नहीं समझा.
तानाशाह रामकृष्ण मिशन के हेड कुअर्टेर बेलूर
मठ में बोल रहा था की नया क़ानून किसी की शहरियत छीनने के लिए नहीं लाया गया है नवजवानों
में "का" और शहरियत क़ानून की निस्बत से ग़लतफहमी पैदा कर के उनको ग़ाफ़िल किया
जा रहा है.
तानाशाह की स्पीच के बाद सहाफियों से खिताब
करते हुए राम किशन मठ के जनरल सेक्रेटरी स्वामी सुवीरनन्दा ने कहा "तंज़ीम वज़ीरे अज़ाम
के "का" पर दिए हुए बयान पर कोई राय नहीं देगी और ना ही कोई तब्सिरा करेगी,
हम एक ग़ैर सयासी तंज़ीम हैं. हम यहाँ पर हमारे घरों से अबदी (सनातन) के सवालों का जवाब देने
के लिए अलहदा हुए हैं, ना की दाई (काल्पनिक) बातों का जवाब देने के लिए". उन्होंने मज़ीद आगे कहा मोदी मठ में हमारे मेहमान
थे, और हमारी मेहमान नवाज़ी का ग़ैर ज़रूरी फायदा उठाते हुए उनके जो भी दिल में आया मठ
में बोलते गए.
उन्होंने मज़ीद आगे कहा जब आपके यहाँ मेहमान
आता है तो वो "अतिथि देवो भव" होता है जो की भारत की तहज़ीब है. और हम मेहमान के लिए ख़ुश ख़लक़ी की हर तरीक़े कार हिकमत
इख़तियार करते हैं. अगर आपको लगता है मेज़बान के यहाँ मेहमान
ने जो कुछ भी कहा है, तो वो उस शख़्स की ज़ाती राये हो सकती है, मेज़बान का उससे कोई ताल्लुक़
नहीं होता है.
सहाफी जुबेर का मुद्दे पर तब्सिरा.
इस सहाफी ने २०११- १२ में कई बार बिला ख़ौफ़
और ख़तर इस बात को मन्ज़रे आम किया है, १९४७ के बाद भी कई सालों तक गुज्जु अवाम की पहचान
एक अमन पसंद शहरी की हैसियत से होती थी. उनकी
शीरी ज़ुबान और ज़ायक़े में मीठा हर वक़त की पहचान होती थी. यहाँ तक की आम के खट्टे अचार में भी मिठास होती
थी. लेकिन उस मिठास को धीरे धीरे संघ और शिद्दत
पसंदी ने कड़वा बे हद कड़वा कर दिया. यहाँ तक
की २००२ में दहशत की दर्जे हरारत और कड़वाहट इस हद तक बड़ी की दहशतगर्द मोदी ने हिन्दू
अवाम को ३ दिनों की खुली छूट दे दी के जो दिल में आये करो. मोदी ने हर उस हिकमत को अंजाम दिया जो की इंसानियत
के ऊपर निहायत ही सियाह दाग़ है, और तारीख़ के सफों में एक काला मज़मून दर्ज हो चूका है.
मोदी की खुली छूट को गुजराती अवाम ने भी खुले
आम बरहना रक्स कर अपने खुद के सूबे के भाइयों, बूढ़े माँ बाप का क़त्ल कर खून बहा कर,
मासूम बच्चों, बूढ़ों को आतिशे नार कर के. मस्तूरातों
की इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ा कर, गुजरात को बना दिया भारत का सबसे से ज़्यादा खतरनाक, ख़ौफ़ज़दा
जुर्म पेशा सूबा. उस ज़ालिम, दरिंदे ने अपनी
सरपरस्ती में वो सब काम किये और बाप बेटों को क़त्ल करवाया, गद्दी पर फ़ाइज़ होने के लिए
तास्सुब और फ़िर्क़ा परस्ती का बीज बोया. इतना
ही नहीं पुलिस और आला अफसरों के हाथ पैरों को हूकूम की ज़ंजीरों में जकड़ दिया. अब जो अफसर मुत्तासिब ज़ेहनियत नहीं थे और जो अपने
फ़र्ज़ से ग़द्दारी नहीं कर सकते थे, जिन्होंने दस्तूर पर हलफ लिया था की पुलिस की वर्दी
में हम किसी भी ग़ैर क़ानूनी काम को हर्जिग बर्दाश्त नहीं करेगें और हम ग़ैर जानिबदार
बगैर मुत्तासिब ज़ेहनियत के अपने फ़र्ज़ को अंजाम देंगे ऐसे जिस भी अफसर ने अपने फ़र्ज़
को अंजाम दिया उसके ऊपर चाबुक चली. ख़ास संजीव
भट का नाम लेना चाहूंगा.
फिर जो गुजरात कभी गाँधी, पटेल, जिन्ना जैसे
अज़ीम रहनुमाओं, वतन परस्तों की सरज़मीं होता था वो २००२ के बाद बदनामी के अंधेरों में
ग़र्क़ाब हो गया और भारत का पहला सूबा बना जो हिन्दू दहशतगर्दों का अड्डा और गड है.
आज जिस हिसाब से इस तानाशाह ने बंदूक, ख़ौफ़,
दहशत और फ़िर्क़ापरस्ती के ज़ोर पर अपने खुद के अवाम का क़त्ल कर के खून बहा कर गद्दी के
लिए लड़ाई और जंग कर के जालसाज़ी से मुंतख़िब हुआ है वो तारीख के सफों में दर्ज हो चूका
है.
फिर तानाशाह ने अपने क़द को मज़ीद क़वी बनाने
के लिए अपने मुहाफ़िज़ के रूप में एक और जालसाज़, फ़िर्क़ापरस्त, ज़ालिम जाहिल मददगार को
बुला लिया. जो ओहदे में तो बड़ा था लेकिन अक़्ल, तालीम और ज़हानत बिल्कुल एक मवाली और
दहशतगर्दों वाली. इन दो गुज्जू की सियाह करतूत
और बदआमालियों ने तमाम गुजरात के अवाम को बदनाम कर दिया. वैसे तो जालसाज़ी और फरेब में गुजराती अवाम मशहूर
हैं. हर्षद मेहता से ले कर तो ललित मोदी, नीरव
मोदी, अडानी, अम्बानी और मेहूल चौकसी तक सभी जालसाज़ी फरेब धोखे बाज़ी के लिए मशहूर हैं.
लेकिन इन जैसे काली करतूत करने वालों की वजह
से हार्दिक पटेल जैसे वतन परत और साफ़ शफ़्फ़ाफ़ किरदार रखने वाले गुजराती अवाम पर भी शक
और शुकूक होता हैं.

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