Sunday, 19 January 2020

शाहीन बनी हक़, इन्साफ और आज़ादी की नई मुहाफ़िज़.


जब दिल्ली सल्तनत के तख़त पर फ़ाइज़ हिटलर की तानाशाही, बर्बरियत, ज़ुल्म हद दर्जे तक बढ़ गया, और तानाशाह ने एहतेजाज करने वाले मर्दों को या तो गिरफ्तार कर लिया, ज़ख़्मी या हलाक कर दिया तब जंग की क़यादत और मोर्चा मस्तूरातों ने संभाला.  तारीख़ अपने आप को दोहराती है उसी हिसाब से बर्रे सग़ीर की तारीख़ भी वापिस दोहराई जा रही है.  जिस हिसाब से मस्तूरातों ने जंग की कमान अपने हाथों में ले ली है उससे १२वी सदी की रज़िया सुलतान और अंग्रेज़ों की तानाशाही के ख़िलाफ़ रानी लक्ष्मी बाई की तारीख आज की नई नस्ल की मस्तूरातें दोहरा रही हैं.  जो एहतेजाज की आतिश दिल्ली के शाहीन बाग़ से शुरू हुई थी अब वो तमाम हिन्द को अपनी आगोश में ले चुकी है.  मस्तूरातों के हर एहतेजाज को शाहीन बाग़ नाम दिया जा रहा है.  दिल्ली के बाद कमो बेश १० से ज़ाइद शाहीन बाग़ बने जिसमे ख़ास हैं लखनऊ, अल्लाहाबाद, वाराणसी और अब बंबई में भी शाहीन ने अपनी कारगरदेगी दिखाई है. 

तारीख़ की सफों में एहतेजाज शाहीन बाग़ एक अलग पहचान की हैसियत से दर्ज हो चूका है. जिस तरह से अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ गाँधी के किये हुए नमक आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन, असयोग आंदोलन, मौलाना अब्दुल बारी का ख़िलाफ़त आंदोलन मशहूर हो चूका है उसी तरह से मस्तूरातों का एहतेजाज नई तारीख़ में दर्ज हो चूका है.  ये शायद जदीद भारत का पहला बाब होगा जिसमे हर एहतेजाज में कम से कम ५ से १० हज़ार या उससे भी ज़ाइद मुख्तलिफ मज़हबों की मस्तूरातें एक ही मुद्दे पर हम ख़्याल हैं और वो है "आज़ादी".  

एन.आर.सी., "का" जैसे सियाह क़ानून से "आज़ादी", हुकूमत की दहशत से "आज़ादी", ना इंसाफ़ी से "आज़ादी", हक़ तलफि से "आज़ादी", फ़िरक़ा परस्ती से "आज़ादी".    

आज के जदीद हिन्द में जिस अंदाज़ में शाहीन बाग़ से मस्तूरातों ने एहतेजाज का आग़ाज़ किया था उनके जज़्बे को हर वतन परस्त सलाम करने से नहीं चूक रहा है.  सहाफिओं की फौज से ले कर हर वतन परस्त हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हर तबके हर उम्र का अवाम इस एहतेजाज में वतन पर अपने आपको क़ुर्बान करने का जज़्बा रखता है, और इस तानाशाही, ग़ुलामी, फ़िरक़ापरस्ती, दहशतगर्दी से आज़ादी चाहता है.  दिल्ली के मक़बूल और कामयाब शाहीन बाग़ एहतेजाज के बाद हर क़स्बे, हर शहर हर मोहल्ले में मस्तूरातों के हर एहतेजाज को एहतेजाज शाहीन नाम दिया जाने लगा.

कुछ गद्दारे वतन हैं जो मस्तूरातों के पाकीज़ा जज़्बे और एहतेजाज को अपनी गलीज़ सोच से निकाले हुए आलूद और मवाद की वजह से ना पाक कर रहें हैं.  एहतेजाजिओं को गद्दारे वतन बोल रहें हैं.  इलज़ाम तराशी कर रहें हैं की मस्तूरातों को ५०० रूपये हर रोज़ का मिल रहा है और ये एहतेजाज तवाइफ़ों और बदकार मस्तूरातों की कारगरदेगी पर चल रहा है.    तो ऐसे संघी और बीजेपी के अनासिर ख़ुद ही वतन के गद्दार हैं जिनको की जमुहरियत पे यक़ीन नहीं है उनकी ऐसी बातें ही ये साबित करने के लिए काफी हैं की इलज़ाम तराशी करने वाले ख़ुद गद्दार हैं जमुहरियत के क़ातिल हैं और तानाशाही पर यक़ीन रखने वाले लोग हैं और जो एहतेजाज कर रही हैं या रहें हैं वो सभी वतन परस्त और जमुहरियत पर यक़ीन रखने वाले अवाम हैं.  और हुकूमत के किसी भी फैसले पर एहतेजाज करना ना इत्तेफ़ाक़ी दिखाना उनका जमूरियाई हक़ है. 

ऐसे गलीज़ संघी, शिद्दत पसंद और बीजेपी की सोच रखने वाले नुमाइंदे ख़ास संबित पत्रा और अमित जैसे लोग जो अपनी घरों की मस्तूरातों की इज़्ज़त नहीं करते वो पाकीज़ा जज़बे की एहमियत क्या जानेगे.  गलीज़ सोच से निकले हुए आलूद का नतीजा ही संबित पात्रा, अमित, चिन्मयानन्द, सेंगर और कठुआ के ज़ानी जैसे अनासिरों की पैदावार है.  

संघी और बीजेपी वाले एहतेजाज को ५०० रूपये का खेल बोल रहे हैं.  में उनसे महज़ तीन सवाल करना चाहता हूँ.

१.           एक दो या तीन चार मस्तूरातों को कोई फ़रोख़्त कर सकता है लेकिन ५००० या उससे ज़ाइद को कैसे कोई फ़रोख़्त कर सकता है.   फिर अगर आपको लगता है की मस्तूरातों को फ़रोख़्त किया जा रहा हैं तो आप उससे ज़्यादा क़ीमत दे कर देखिये फिर आपको केसा थप्पड़ रसीद होगा.  जब आपकी दो गुना तीन गुना क़ीमत भी इन खातूनों को अपने मक़सद से ग़ाफ़िल नहीं कर सकती तो ५०० रूपये की हैसियत ही क्या है.  ये तमाम मायें बेहेने आज इज़्ज़त का मुक़ाम रखतीं हैं और इनकी इज़्ज़त आज हर अवाम की नज़रों में दो बाला हो रही है.  हर भाई को अपनी ऐसी बेहेन पर हर वालिद को अपनी ऐसी दुख्तर पर और हर शोहर को अपनी ऐसी नेक सीरत बीवी पर नाज़ होगा जो अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों की बक़ा के लिए अपने आपको फ़ना करने को तैयार है.   

२.          दूसरी बात में इन संघी शिद्दत पसंदों से पूछना चाहता हूँ दिल्ली के शाहीन बाग़ की मस्तूरातों को ख़रीदा गया उन सभी बहनों और माँओं के किरदार में इन संघी शिद्दत पसंदों को खोट नज़र आ रहा है लेकिन दीगर शहरों में जो शाहीन बाग़ बन रहे हैं उसके ऊपर ये गलीज़ सोच वाले संघी क्या बोलेगें.

३.           तीसरी बात इन गलीज़ सोच से पूछना चाहता हूँ अपने जैसा ये सभी को समझते हैं.  इन लोगों ने चंद कुछ ५ से ले कर ७ मस्तूरातों को ट्रिपल तलाक़ पर फ़रोख़्त किया था.  जिसमे से २ दरख्वास्त कर्दा थी.  एक वेस्ट बंगाल और दूसरी उत्तर प्रदेश की (सायरा बानो) को सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए मदद मोहय्या की थी.  बाक़ी को मीडिया में आने के लिए फ़रोख़्त किया था.  फिर महज़ उन ७ मस्तूरातों के ऊपर बीजेपी, संघ, शिद्दत पसंदों और लंगूर मीडिया के लंगूर और लँगूरनिओं ने उधम मचा डाला था.  तानाशाह सभी को अपनी बेहेन तस्लीम करता था.  आज मेरी मुस्लिम बेहेने १४०० साल की ग़ुलामी से आज़ाद हुई.  और जब आज हिंदुस्तान के हर बड़े शहरों की करोड़ों ना सिर्फ मुस्लिम बल्कि हर मज़हब की बेहेने आज़ादी मांग रही हैं तो किस गटर की गैस से चाय बनाने में मसरूफ है की उसको इतना भी वक़्त नहीं की अपनी बहनों से बात कर ले.

इससे ये बात भी साबित हो गई की बीजेपी की कोई भी कारगरदेगी किसी की हमदर्दी के लिए नहीं होती है और ना ही बीजेपी, संघ और उससे जुड़ा हुआ कोई भी शिद्दत पसंद सच्चा वतन परस्त होता है बरक्स ये लोग तो सबसे बड़े गद्दार होतें हैं,  जो महज़ तिरंगे की आड़ में अपने ही देश को खंजर से ज़ख़्मी करतें हैं.  ऐसे एक नहीं हज़ारों मिसालें मौजूद हैं, तिरंगे की आड़ में वतन परस्ती की आड़ में क्या क्या काले कारनामे इन संघी दहशतगर्दों ने और बीजेपी के नियसतदाओं ने किये हैं.  

बल्कि जहाँ तक इस सहाफी की जानकारी है उससे तो साफ़ ज़ाहिर होता है संघ ने बीजेपी और ख़ास मोदी, अमित को मिशन पूरा करने के लिए लाया है.  और वो मिशन है भारत की तक़सीम.  जिस हिसाब से १९४७ में भारत हिंदुस्तान पाकिस्तान में तक़सीम हुआ था.  नए दौर में भारत दो मज़ीद दो हिस्सों में तक़सीम होगा, एक होगा जिन्ना की दो क़ौमी नज़रियात का हामी और बनेगा हिन्दू राष्ट्र जबकि दूसरा होगा अंबेडकर, गांधी की सोच का हामी और बनेगा दुनयावी (सेक्युलर) भारत.   

अब जो गद्दार हैं वो जिन्ना की दो क़ौमी नज़रिये को मानेगें वहीँ जो वतन परस्त होंगे वो आंबेडकर, गाँधी के नज़रिये को मानेगे. ऐसे अवाम गाँधी, करकरे की शहादत का सौग मानायेगे जबकि गद्दार इज़हारे खुशी.

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