Friday, 13 September 2019

लंगूर और बया

अज़ीज़ नाज़रीन, 
इस सहाफी ने अपने गुजिश्ता मज़मून और खबरनामे  एहले हूनूद हूजूमी दहशत का अगला निशाना के इख़्तेताम पर एक कहावत पेशे खिदमत की थी.   हमारे समाज के एक कहावत है. 
   " सीख बा को दीजिये, जा को सीख सुहाए.  
ना दीजियो सीख बांदरा को बया का घर भी जाए."
इस कहावत से जुड़ी हुई एक मशहूर कहानी है.  जिसका ताल्लुक़ बया (एक नन्हा पक्षी) और लंगूरों से है.  बया एक ऐसा पक्षी है जो अपना घोसला चारों तरफ से ढंका हुआ बनाता है.  उसके घोसले पे ना तो सूरज की तपिश असर करतीं है ना सर्दिओं की सर्द हवाएं और ना ही बरसात के पानी की बूंदे. 

किसी कसबे से दूर जंगल की हुदूत शुरू होते ही बया नाम की चिड़ियों की बस्ती थी.  इस बस्ती में सुब शाम बया की काय काय से जंगल गूंजता रहता था.  शहर में अपने काम काज के सिलसिले में आने वाले मुसाफिर थके मांदे कुछ देर उस पेड की ठंडी छावों के नीचे बैठ कर और बया की बस्ती की चायं चायं सून कर अपनी थकान उतार अपने अगले सफर के लिए निकल पड़ते थे.

एक रोज़ बया की उस बस्ती में ज़ोरदार बारिश बरसी.  हत्ता के सभी छोटे मोटे पेड पानी की ज़द बर्दाश्त नहीं कर सके और डूब गए.  लेकिन जिस पेड़ पे बया की बस्ती थी वो बस्ती अभी तक ना सिर्फ क़ायम थी बल्कि उनके मेहफ़ूज़ हर एक घोसलों में बया मौजूद थी. 

इस मेहफ़ूज़ और खुशहाल बस्ती को देख कर किसी ज़ालिम की बद नियत पड़ गई.  फिर यकायक एक लंगूर उसके साथ उसके कुछ साथी उस पेड पे आ बैठे जो पानी से पूरी तरह से भीग गए थे और पानी रुकने का इंतज़ार करने लगे.  ये सब माजरा देख कर बया को बड़ी हैरत हुई.  उसने सोचा इतना बड़ा जानवर और उसमे इतनी भी सलाहियत नहीं की अपने आपको पानी से मेहफ़ूज़ कर सके.  देखो एक हम हैं ऐसे घोसले की तामीर की है जिसमे ना सूरज ना सर्दी और ना ही बारिश हमको कुछ भी इज़ा पंहुचा सकती है.  हम सब अपनी इस बस्ती में कितने मेहफ़ूज़ हैं और एक ये लंगूर दर बदर भटक रहें हैं.

बया ने सोचा की हम इन लंगूरों को सीख देंगें ताके वो भी हमारी तरह ही खुशहाल ज़िन्दगी गुज़ार सकें और बारिश, धूप और सर्दी से बच सकें.  सो सबसे उम्र रसीद बया ने लंगूरों से कहा, तुम इतने अज़ीम जानवर हो दिखते भी हू बहू इंसानों जैसे हो दो हाथ दो पैर और इंसानी शक्ल.  क्यों ना तुम ऐसी हिकमत इख्तयार करो की तुमको बारिश सर्दी और गर्मी में कुछ भी अज़ीयत ना पहुंचे.  तुम लोग इतना बड़ा जिस्म रख कर भी आज बारिश में भीग रहे हो कुदरती आफत से परेशान हो और हम इतने छोटे हो कर भी मेहफ़ूज़ हैं.  तुम भी हमारी तरह अपना घर क्यों नहीं बना लेते हो. 

उस बड़े लंगूर ने कहा ठीक है इसका जवाब हम तुमको पानी बंद होने के बाद देंगे.  फिर जैसे ही पानी बंद हुआ और पेड के नीचे से पानी बहना ख़त्म हुआ लंगूरों के झुंड ने यकायक बया की उस बस्ती पे हमला बोल दिया.  और एक एक कर के तमाम बया के घरों को थोड़ डाला.  और बया से कहने लगे देखो अब तुम भी हमारी तरह ही बे घर हो गई. 

इस कहानी से ये सीख मिलती है की सीख या तालीम भी उसी को देना चाहिए जो उसके एहल होता है.  एक गुंडे, दहशतगर्द, ज़ालिम, ना इन्साफ को अगर सीख दी तो उसको वो सही अंदाज़ में लेने के बजाये उसी को हलाक कर डालेगा जिसने सीख दी है.

वैसे तो ये सहाफी ओमूमन हुकूमत के लिए साफ़ गोई से कभी तन्क़ीदी कभी इस्लाही मज़मून लिखते ही रहता है.  लेकिन हाल है में अपने एक मज़मून  हुजूमी दहशत से अब एहले हुनुद भी ख़ाइफ़ में हुकूमते हिन्द से कुछ मुतालबात किये थे और हूजूमी दहशत को रोकने के इक़दाम उठाने का मुतालबा किया था.  मुतालबा तो मुकम्मल नहीं हुआ बरक्स इस सहाफी का हिंदी ब्लॉग https://zuberjournalist.blogspot.com/  ही ब्लॉक कर डाला. जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपने अंग्रेज़ी मज़मून PAK Army enters in Occupied Kashmir. में किया है

दोस्तों मोदी इंतेज़ामिया और शिद्दत पसंदों, हिन्दू दहशतगर्दों को हाल की हुई हुजूमी दहशत पे इस सहाफी ने आईना दिखाया तो मोदी इंतेज़ामिया ने इस सहाफी का हिंदी ब्लॉग फेस बुक पे ब्लॉक कर दिया है.  इन लोगों को और काम ही क्या है जो इंसान २०१० से कांग्रेस को रास्ता दिखा रहा था और २०१४ से मोदी को दिखाया लेकिन इन अंधे भक्तों और अक़्ल के अंधों को इस सहाफी के मज़मूनों में नसीहत तो दिखी नहीं और ना ही उसके मज़मूनों की रौशनी में इनको रास्ता दिखा.  लेकिन जब ठोकर खा ली और ज़ख़्मी हो गए तो उस रौशनी को ही ब्लॉक कर दिया जो राह गुज़ार थी.  आप सभी से गुज़ारिश है इस हुजूमी दहशत से अब एहले हुनुद भी ख़ाइफ़ मज़मून को ज़्यादा से ज़्यादा अवाम तक शेयर कीजिये.

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