अज़ीज़ नाज़रीन,
आज
आप लोगों के दरमियान मुफ्तियाने किराम और मौलाना हज़रात की सरकारे दो आलम हज़रत मोहम्मद
मुस्तुफा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की चंद हदीस मुबारक के बयान की निस्बत से आया हूँ. कोई भी
मुसलमान किसी भी सही मुसनद, मोतबर और बुखारी शरीफ की हदीस का इंकार नहीं कर सकता और
अगर वो हदीस का इंकार कर रहा है तो वो काफिर है और कुफ्र कर रहा है. क्योंकि क़ुरआन हर जगह खुला हुकुम दे रहा है ऐ ईमान
वालों अल्लाह और उसके नबी की बात मानो.
कुछ
मौलाना हज़रात सिक्के का एक पहलू तो बताते है लेकिन पूरी बात और सिक्के का दूसरा पहलू नहीं बताते. जिसकी वजह से हम जैसे तन्क़ीदी लोगो के दिलो दिमाग
में एक अलग ही कैफियत तारी हो जाती है और सवालात का सिलसिला ख़त्म होने का नाम ही नहीं
लेता.
गुजिश्ता
हफ्ते मौलाना वहीदुद्दीन का एक वीडियो देख रहा था जिसमे वो आधी इंग्लिश और आधी हिन्दू
में एक हदीस शरीफ बयान कर रहे थे. मौलाना साहब
कहते हैं की अल्लाह के रसूल की हदीस है जिस मुसलमान ने किसी भी इंसान का दिल दुखाया
वो जन्नत में नहीं जाएगा. मज़ीद मौलाना साहब
हदीस की तशरीह करते हैं. इस हदीस में सिर्फ
मुसलमानों के दिल आज़ारी का ज़िक्र नहीं है, बल्कि हर शख़्स का ज़िक्र है ख़्वाह वो काफिर
ही क्यों ना हो. फिर आगे मौलाना साहब कहतें
है की अगर आपको जन्नत की तलब है या आप चाहते हो की आपको जन्नत में आला मुक़ाम मिले तो
किसी की दिल आज़ारी मत करो. नहीं तो आप जन्नत
से महरूम रहोगे.
मौलाना
वहीदुद्दीन साहब को चंद बातें कहना चाहूंगा:-
१. जिस हदीस की आपने बात कही है सर आँखों पे लेकिन
वो हदीस अमन पसंद मुल्क, जगह के लिए और जब मुल्क़ में अमनों अमान हो उस वक़्त के लिए
है. जंग जैसे हालात में नहीं.
२. आपने फर्माया की जिसको जन्नत की आरज़ू है वो किसी
भी शख़्स की दिल आज़ारी ना करे. में कहना चाहता
हूँ अगर कोई भी अमल इसलिए किये जाएँ की दुनिया अच्छी हो जाए जन्नत मिल जाए तो वो अल्लाह
के साथ अदल बदल की पेश कश (एक्सचेंज ऑफर) हो गया. हम अच्छे आमाल करेंगे तू बदले में
जन्नत अता कर. हम नमाज़ क़ायम करेगें तू दुनिया अच्छी कर. अल्लाह से मोहब्बत है तो कैसा
एक्सचेंज. मोहब्बत में कोई एक्सचेंज नहीं बे लोस बग़ैर किसी लालच के अमल होना चाहिए.
बिल फ़र्ज़ तमाम आमाले सालेहा किये और उस मालिके
हक़ीक़ी ने ना जन्नत अता की ना दुनिया फिर शिकवा भी तो हम ही करते है. ऐ अल्लाह इतना
सब करने के बाद भी हम पे ये मुसीबत.
३. दोज़ख़ किस की मर्ज़ी से मिलेगी वो थोड़ी कोई शैतान
की मर्ज़ी से मिलेगी. वो भी तो अल्लाह की मर्ज़ी से ही मिलेगी. मज़ा तो तब है जब आप तमाम
आमाले सलेहा करें और अल्लाह आपको दोज़ख़ दे दे फिर भी आप उसको बोहोत बड़ी नेमत जाने और
कहें अल्लाह आप कितने रहीम है हम तो समझ रहे थे की आप हमको मुनाफ़िक़ों वाली दोज़ख अता
करेंगे लेकिन आपने आपको इतना ख़ुशक़िस्मत जाना, की काफिरों की दोज़ख़ में जगह दी.
४. जंग जैसे हालात में तो हुकूमत के निज़ाम और कानून
बदल जातें हैं, फिर अगर कोई बंदा जिहाद फि सबिल्लीलाह कर रहा है तो क्या उसके ऊपर कोई क़ैद
होनी चाहिए? दुश्मन को हलाक़ करने से लेकर क्या तलवार की
मार, हाथ की मार और ज़ुबान की मार उसके लिए सब जाईज़ हैं
जब
किसी काफिर मुल्क़ में हर जानिब बद अमनी हो ख़ाना जंगी चल रही हो और वो काफिर मुल्क का
बादशाह या हाकिम मुस्लिम अवाम पे सख्त तरीन ज़ुल्म और दहशत करता हो, उसके ख़िलाफ़
इस्लामिक जिहाद चालू हो तो ऐसे हालात में शीरी ज़ुबान का मुज़ाहेरा कैसे मुमकिन है. जिहाद की तीन तहरीरी इनतेबह (वार्निंग) की अव्वलीन
शर्त ही ये है की या तो आप दाख़िले इस्लाम हो जाव नहीं तो इस्लामिक मुमालिक के साथ जंग
करो. और जिहाद में दुश्मन को ख़त्म करने का
हुकुम है ना की उससे दोस्ती और उसके लिए दस्तरख़्वान वसी करने की हिदायत. हाँ वो बात अलहदा है की जब जिहाद ख़त्म हो जाए और
आप काफिरों पे ग़ालिब हो जाएँ तो अब आप उनके साथ हुसने सुलूक करें. क्योंकि अब रियासते इस्लामी क़ायम हो चुकी है और
अब वो आपके असीर हैं. अब जंगी क़ैदिओं को ज़्यादा
अज़ीयत और तकलीफ ना दी जाए.
हज़रते
उमर फ़ारूक़ बोहोत ही जलाली सहाबी ऐ रसूल थे.
आपके दाख़िले इस्लाम होने के बाद अल्लाह के नबी ने फर्माया उमर तुम जैसे हो वैसे
ही रहो और अपने गुस्से को इनके लिए नहीं बल्कि इनके लिए इस्तेमाल करो. अपने जलाल को इनके लिए नहीं बल्कि इनके लिए इस्तेमाल
करो. उस वक़्त मक़्क़ा में कुफ्र का दौर था और
हर जानिब अल्लाह के रसूल के दुश्मन और दीने इस्लाम को ख़त्म करने वाले गिरोह मौजूद थे. तो आप सल्ललाहो अलैहे वस्सलम के फरमान के मुताबिक़
मोमिनो के लिए गुस्सा और जलाल कम करो लेकिन काफिरों के लिए कम मत करो.
नाज़रीन
आपको बताता चलूँ यूं तो अल्लाह का क़ानून तमाम
आलमे इंसानियत के लिए है लेकिन वो नाफ़िज़ सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम रियासतों पे होता है
और उस क़ानून के अमल पेश सिर्फ मुस्लिम अवाम ही होतें हैं. जहाँ तक काफिरों का सवाल है वो जिस ख़ुदा का इंकार
कर रहें हैं वो कैसे उसके बनाये क़ानून को मानेगे.
इस्लामिक रयासत के अवाम को ५ दर्जों में बाँट सकतें हैं.
१.
मोमिन: मुस्लिम रियासत का सबसे अफ़ज़ल बाशिंदा होता है मोमिन. मोमिन वो बंदा होता है जो अपने आपको अल्लाह और उसके
रसूल की मर्ज़ी के हवाले कर दे.
२.
काफिर: काफिर का मतलब होता है
इंकार करने वाला. ऐसा शख़्स जो किसी अच्छी बात
का इंकार करे वो काफिर. रसूल की बात का इंकार
करे अल्लाह के कानून का इंकार करे वो काफिर होता है.
३.
मुशरिक: ऐसा शख़्स जो अल्लाह के साथ किसी को शरीक करे. मूर्ती, तसावीर, आतिश या किसी और दीगर दुनयावी साज
सामान की इबादत करने वाला और उस ही से मदद तलब करने वाला शख़्स मुशरिक होता है. इस मूर्ती पूजा में वली अल्लाह और कामिल बुज़ुर्गाने
दीन के रौज़े की ज़ियारत करना उनके रौज़े पे फातेहा ख़्वानी पढ़ना शामिल नहीं हैं.
४.
मुनाफ़िक़: ऐसा शख्स जो सिर्फ नाम का मुस्लिम होता है और उसका हर अमल इस्लाम
को ज़लील करने और मुसलमानों को इज़ा पहुंचाने का होता है. ऐसे लोग चेहरा लिबास और नाम इस्लामिक इख़्तियार करतें
हैं लेकिन इनके दिलो दिमाग में इस्लाम के लिए हद दर्जे की नफरत बुग्ज़ और कीना होती
है और ये लोग मुसलमानों को नुकसान और ईज़ा पहुंचाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते हैं.
५.
मुल्हिद (नास्तिक). ये वो लोग
होतें हैं जिनका किसी भी खुदा पे यक़ीन नहीं होता है बरक्स ये लोग समझतें हैं की इस
कायनात का निज़ाम सदियों से चल रहा है और यूं ही चलता रहेगा. इस्लाम का पहला कलमा ही नास्तिक से शुरू होता है.
"नहीं है कोई माबूत, आगे कहा गया मगर अल्लाह के" एक मुल्हिद नास्तिक सच्चा
आस्तिक या अल्लाह पे यक़ीन करने वाला बन सकता है.
नास्तिक वो जो सब कुछ देखे समझे तहक़ीक़ करे फिर भी उसपे यक़ीन ना करे. लेकिन सब कुछ देखने समझने और तहक़ीक़ करने के बाद
इस बात को तस्लीम कर ले की कोई तो ताक़त है जो कायनात के निज़ाम को संभाले हुए है और
वो ताक़त इंसानी अक़ल से परे है तो हो गया वो आस्तिक. या खुदा पे यक़ीन करने वाला.
अब इस्लामिक रियासत के मुस्लिम की
जानिब से इन ५ लोगों की जमात में से किसी की भी दिल अज़ारी हुई तो ऊपर बताई हुई हदीस
की खिलाफवर्जी करता हुआ पाया जाएगा और उसके हक़ में जन्नत ना होगी.
सहाफी ज़ुबेर एहमद ख़ान
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