अज़ीज़ नाज़रीन,
आज के हालाते हाजरा और मग़रिबी तहज़ीब से मुत्तासिर हो कर आमूमन नौजवान तपक़ा बच्चे और बच्चियाँ अपनी अज़वाजी ज़िन्दगी, शादी वग़ैरह के फैसले खुद ही ले लेते हैं, जिसका ख़मयाज़ा उनको आगे चल के रूसवाई और ज़लालत की शक्ल में मिलता है. इस मुद्दे पे हज़रत अल्लामा मौलाना रज़ा साक़िब मुस्तफ़ाई का आब दीदा बयान सुनिए.
बच्चे और बच्चियाँ शादी वग़ैरा के लिए अपने हमक़दम ज़िन्दगी के रहनुमा में सिर्फ एक या दो ही चीज़ों को तलाश कर पातें हैं जबकि उनके वाल्दैन की चश्मे दूरंदेशी वो सब चीज़ें देख लेते हैं. जिसकी ज़रुरत एक खाविंद को अपनी एहलिया में होनी चाहिए और एक एहलिया को अपने खाविंद में होनी चाहिए. फिल वक़्त एक नौजवान जौड़ा अपने शरीके हयात में सिर्फ एक दो खूबी देख कर मुत्तासिर हो जाए और अपने वाल्दैन के किसी दुसरे फैसले पे तनक़ीद करें की क्या अब्बा आप तो बूढ़े हो गए हो, क्या अम्मी आपकी सोच धकियानूसी है.
लेकिन जैसे जैसे हालात उनके सामने आयेगें उनको इस बात का बा खूबी इल्म हो जाएगा की जो फैसला बच्चो ने अपनी ज़िन्दगी के बारे में बगैर वाल्दैन को शामिल कर किया वो तबाह कुन साबित हुआ और जो फैसला वाल्दैन की रज़ामंदी से उनकी सूझ बूझ के साथ हुआ वो खुश व खुर्रम और बेहतरीन ज़िन्दगी का बाइस बना.
वाल्दैन के हुक़ूक़ के बारे में बे पनाह आ हदीस मुबारक और क़ुरआन का खुला क़ौल है.
अल्लाह तबारक ताला क़ुरआन में फार्मा रहा है की जब तुम्हारे वाल्देन बुढ़ापे को पहुंच जाए तो उनसे ऊंची आवाज़ में बात मत करो और उनको झिटकारो मत.
और उनके साथ हुसने सुलूक करो जैसा की उन्होंने तुमको तुम्हारे साथ जवानी में किया था.
ये तो खुदा का क़ानून है और वो कभी तब्दील नहीं हो सकता बिल फ़र्ज़ वाल्दैन का फैसला आपको गलत मालूम हो रहा होगा लेकिन अगर आप उस फैसले पे सरे तस्लीम ख़म हो गए तो अल्लाह अपना फैसला भी बदल देता है और जो फैसला आपके लिए तबाह कुन साबित होने वाला बा ज़ाहिर दिख रहा था लेकिन आपके वाल्देन की मर्ज़ी को आपने तरजि दी तो अल्लाह उस तबाही को भी आपके लिए रेहमत बना देता है.
ये तो अल्लाह के इख़्तियार में है लोह क़लम से जो तक़दीर लिख दी गई उसको बदलने का इख़्तियार पूरी तरह से अल्लाह तबारक ताला के हाथ में है.
ना सिर्फ अज़वाजी ज़िन्दगी बल्कि कोई भी रूहानी या दुनयावी काम में अगर वाल्देन की मर्ज़ी शामिल नहीं है तो उस काम में आपको कभी भी कामयाबी नहीं मिलेगी.
सिर्फ वाल्दैन के उस हुकुम की खिलाफ वर्ज़ी कर सकतें हैं जो हुकुम अल्लाह
और उसके रसूल की शरीयत से अलेहदा हो. जैसे के वाल्दैन ग़ैर शराई काम करने को कहतें हैं,
कुफ्र, मूर्ती पूजा, ज़िनाकारी, ना हक़ क़त्लो ग़ारत वग़ैरा करने का दबाव डालतें हैं या
कोई भी ऐसा काम कहतें हैं जो अल्लाह और उसके रसूल के हुकुम की ख़िलाफ़वर्ज़ी करता है,
तो ऐसी सूरत में आप उनकी हुकूम अदूली कर सकतें हैं.
यहाँ तक की फुक़हा बताते हैं की कोई शख़्स फ़र्ज़ नमाज़ में अल्लाह से लौ लगा बैठा है और उसकी अलील वालेदा की आवाज़ सूने तो नियत तोड़ दे तो उसका अमल बाइसे मज़मत या बाइसे लानत नहीं होगा बल्कि बाइसे फख्र तस्लीम किया जाएगा. एक बंदा ऐ मोमिन अल्लाह के लिए नमाज़ अदा करता है और उसके तमाम अमल अल्लाह की रज़ा हासिल करने के लिए होतें हैं और अल्लाह की रज़ा ओलाद के लिए वाल्दैन की रज़ा में शामिल हैं.
एक शख़्स नमाज़ को अपने वक़्त से ताख़ीर कर दे या तर्क कर दे क्योंकि उसको खदशा है की वो नमाज़ पे खड़ा हुआ और कब उसकी अलील वल्दा को उसकी ज़रूरत पड़ जाए तो ऐसी तर्क की हुई नमाज़ वल्दा को दुःख पंहुचा के पढ़ी हुई नमाज़ से हज़ार गुना अफ़ज़ल है.
हज़रते औवेसे क़रनी रज़िअल्लाह अनहा ने रसूल अल्लाह का दौर पाया और इस्लाम में दाख़िल हुए लेकिन आप नबी सल्ललाहो अलैहे वस्सलाम का दीदार की हसरत दिल में लिए, लेकिन कभी नबी का दीदार ना कर सके, कियोंकि वो अपनी अलील ना बिना वालेदा की ख़िदमत में हमेशा मसरूफ रहते और अगर नबी के दीदार के लिए यमन से मक्का आते तो उनकी वालेदा की देख भाल कौन करता. इस कश्मकश में वो कभी नबी की बारगाहे रूहानी में हाज़िर ना हो सके लेकिन उनको सहाबा का दर्जा हासिल है. और नबी सल्लाहो अलयहे वस्सल्लम ने इस दुनिया ऐ फ़ानी से पर्दा करने से क़ब्ल जलील क़द्र सहाबा हज़रते उमरे फ़ारूक़ रज़ि अल्लाह हो अन्हा और अली शेरे खुदा को नसीहत की थी के अगर तुम्हारा कोई काम ना बन पाए तो ओवेस से दुआ करने को कहना उसकी दुआ अल्लाह कभी रद्द नहीं करता है.
एक सहाबी ऐ रसूल थे और जिहाद में जाने के लिए अल्लाह के रसूल के हुज़ूर पहुंचे और जिहाद पे जाने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की आप सल्ललाहो अलैहे वस्सलम ने फ़रमाया क्या आपके वाल्देन ज़िंदा है तो उन्होंने जवाब दिया जी मेरी वल्दा ज़िंदा है और अलील हैं. अपने फ़रमाया आप उनकी ख़िदमत कीजिये और आपको जिहाद का सवाब मिलेगा. आपके लिए वही जिहाद है.
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