भारतीय आर्म्ड फोर्सेज कश्मीरी अवाम के साथ तशद्दुत, जब्र और उनकी नस्ल कुशी, मासूम बच्चिओं
और १७ साला से लेकर हर उम्र की मस्तूरात के साथ ज़िना बिल ज़ब्र, गिरोह गरदाना ज़िना,
कश्मीरी इंसानी हुकूक की हक़ तलफि के लिए मशहूर है और ऐसी चीज़ें भारतीय फौज के लिए कोई
एहमियत नहीं रखती और बड़ी बात नहीं है. क्योंकि फ़ौज को इस तरह की कारवाही पे हुकूमते हिन्द
की पूरी रज़ामंदी है अगरचे वो सरकारी दहशतगर्द की किस्म में आतें है फिर भी हुकूमते हिन्द इस तरह की कारवाही पे आँखे बंद
किये हुए खामोश है.
लेकिन
२०१८ के बाद से जैसे जैसे २०१९ नज़दीक आ रहा है, सहाफिओं पे भारतीय फौज के इस तरह के
हमले ज़्यादा ही बढ़ गए हैं. अभी तक कश्मीरी
अवाम भारतीय फौज के निशाने पे होता था. और
उनको संग बाज़ या दहशतगर्द बोल के बन्दूक की ज़द में ले कर शहीद कर दिया जाता था. लेकिन अब भारतीय फौज के पेलेट गन के छर्रे यहाँ
तक सहाफिओं की आँखों को भी ना बीना कर रहे है.
२०१८ से ले कर हाल ही में २६ जनवरी को हुए सहाफिओं पे भारतीय फौज का ये तीसरा
हमला है. फिर भी भारतीय इंतेज़ामिया और सरकार
भारतीय फौज के इस तरह के हमलों को बोहोत ही संजीदगी से ना ले कर इसको बड़ा हमला नहीं
बोल रही है, क्योंकि अगर ऐसी ख़बरें पब्लिक डोमेन में आ गई तो फौज और इंतेज़ामिया की
इज़्ज़त ख़राब होगी.
ऐसे ही सहाफिओं के ऊपर भारतीय फौज के हमले का एक वीडियो, इस सहाफी ने
अपने मज़मून के साथ २०१८ में शाय किया है, जिसमे फ़ौज के जवान सहाफिओं पे ज़ब्र और उनके
साथ धक्का मुक्की कर रहें हैं, और उनको अपनी बन्दूक के हत्थे से मार रहे हैं.
हाल ही में २६ जनवरी भारतीय फौज के पेलेट गन के जान लेवा छर्रों की
ज़द में कुछ मुसव्विर सहाफी आ गए जो भारतीय फौज के एनकाउंटर की जगह पे मज़ीद जानकारी, हमले
की फोटो और वीडियो लेने गए थे. एनकाउंटर वाली
जगह पे भारतीय फौज के सहाफिओं पे इस तरह के हमले, दो बातें साबित करने के लिए काफी हैं एक या तो एनकाउटर
मुतानाज़ा हैं दूसरा कश्मीरी अवाम के लिए जो ज़हर भारतीय फौज के दिलों दिमाग में भरा
गया है वो आलूद सहाफिओं पे भी निकल रहा है.
क्योंकि अगर एनकाउटर हक़ था तो सहाफिओं पे पेलेट गन के छर्रों की बौछार करने
की कोई ज़रुरत ही नहीं थी. उनको अपना काम करने
देना था. फिर एनकाउंटर के फलसफे और जेहादिओं
और फौज के बीच क्रॉस फायर की हक़ीक़त अवाम के सामने अपने आप आ जाती. इस तरह की चीज़ें भारतीय फौज के एनकाउटर के फलसफे
पे शक की काफी गुंजाइश रखतीं हैं. आर्मी मासूम
कश्मीरी अवाम को एनकाउंटर के नाम पे मौत के घाट उतार रही है. और यही वजह है आर्मी ने मुस्सविर सहाफियों को एनकाउंटर
की जगह पे जाने से रोका और उनके ऊपर भी हमला किया और छर्रों की बौछार की, जिसकी वजह
से एक ना बीना हो गया और अपनी आँखों की रौशनी पूरी तरह से खो दी. भारतीय फौज के सहाफियों पे हमले के बाद उन्होंने
अपना बयान मीडिया से रू बरू हो कर दर्ज करवाया. देखिए.
हिन्दू शिद्दत पसंद मंशियाती ज़हर कश्मिरिओं के खिलाफ जो आर्मी के दिलों
दिमाग में भरा गया था और पुलिस, इंतेज़ामिया, अदलिया, निज़ाम, तालीम के ज़रिये मुस्लिम अवाम के खिलाफ भरा गया था
वो अब साढ़े चार साल बाद अपना रंग दिखाने लगा है. और मोदी की बीजीपी हुकूमत में अवाम
के बाद कश्मीर में अब सहाफी आर्मी का नरम निशाना बन चुके हैं.
ये सहाफी पूरी तरह से कुंद हो चूका है और समझने से क़ासिर है के हम कहाँ
पहुंच चुके हैं. जब भारतीय अवाम अपने वतन का ७० वां यौमे जमुहरिया बना रहा है लेकिन क्या हम फख्र के साथ सही और दुरस्त बात को
कहने और उसका इज़हार करने की कुव्वत रखतें हैं.
अगर एक सहाफी को अपना फ़र्ज़ निभाने से रोका जा रहा है जो सच्ची बात को और हमले
की तस्वीर के उस रुख को सामने लाना चाहता है जो सच्चाई पे मुश्तमिल है. जो भारतीय फ़ौज के इंसानी हुकूक की हकतलफी, दोहरा
रवैया, अवाम को दहशतगर्दी के इलज़ाम में मौत के घाट उतारने के अमल को बरहाना कर रहा
है और अगर ऐसा करने से उसको रोका जाता है तो हमको अपने आपको एक जमुहारियाई मुल्क कहलाने का कोई
हक़ नहीं है, और किसी भी भारतीय को यौमे जमुहारिया बनाने का कोई हक़ नहीं होना चाहिए. भारतीय फौज ग़लतफहमी का शिकार हो गई थी के सहाफियों
पे गोलियाँ बरसाने से उनकी बदकारियाँ और बदमालियाँ छुप जायेगी लेकिन बावजूद पेलेट गन
के छर्रों से और सहाफिओं के रस्ते में रोड़ा अड़ाने से वो सच्चाई को बदल नहीं सकते की
भारतीय फौज के दिलों दिमाग में कश्मीरी अवाम के खिलाफ आलूद और ज़हर भरा है जो एक दर
हक़ीक़त है और रहेगी. के किस तरह से दहशतगर्दी
के नाम पे भारतीय फौज कश्मीरी अवाम को एक लाइन से खड़ा कर के गोलियाँ मार देते हैं, ख़वातीन
के साथ कभी बन्दूक की नौक पे कभी उनके अपने नाबालिग बच्चों और भाइयों को दहशतगर्दी
के इलज़ाम में जेल भेजने के इलज़ाम में बदकारियाँ करतें हैं.
हूकूमते हिन्द के ज़र खरीद गुलाम या लंगूर सहाफी और लंगूर मीडिया हाउसेस
फ़ौज के जंगी जराइम, इंसानी हुकूक की हक़ तलफि, ख्वातीनों के हुकूक की हक़ तलफि को पोशीदा
रखने की पुरज़ोर कोशिश करतें हैं और फौज की कारगरदेगी की वकालत करतें हैं क्योंकि उनको फौज
की हौसला अफ़ज़ाई, और सरहाना करने के लिए मुवावज़ा मिलता है. लेकिन ऐसे सहाफी भरोसे के काबिल नहीं होतें हैं,
यहाँ तक के वो भारतीय फौज के प्यार में अंधे हो कर मासूम इंसानी लाशों की अनदेखी कर
रहे हैं. वो लोग ऐसा करने के लिए मजबूर हैं
क्योंकि ये उसी गुलाम जमात से हैं जो सड़े गले खाने को भी खाने के लिए मजबूर हैं और
इनमे इतनी कुव्वत भी नहीं बची है की दूसरा खाना मांग सकें.
कुछ भारतीय अवाम (आर.अस.अस. और बीजेपी हिमायती) मौलानाओं की एक जमात
(संघ प्रचारक और अवामी मुस्लिम मंच के कारकूनों) ने इस सहाफी के हिंदी मज़मून जिसमे
उसने यौमे जमुहरिया को सियाह दिन के जैसा बनाने की दरख्वास्त की थी सख्त अलफ़ाज़ में
मज़म्मत कर रहे थे. वो सभी यौमे जमुहरिया पूरे
जोश व खरोश के साथ बनाने के अज़्म के साथ तैयार थे. उनको हुकूमत के किसी भी अम्ल पे गैर जमुहरियाई शक्ल
नज़र नाही आ रही थी. इन लोगों को और कितने सबूत
फ़राहम करना चाहिए, के जमुहरियाती मालियात चिंदे
चिंदे हो चुकी है और वो खतरे के निशान से ऊपर पहुंच गई है. भारतीय हुकूमत, उसके एजेंट्स, नुमाइंदे, हाकेमीन या कोई भी सरकारी इदारा सभी जमुहरियाई मालियात की खिलाफवर्जी कर रहे हैं और कोई भी
जमुहारियाती मालियात के पैमाने पे खरा साबित नहीं हो रहा है.
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