हुकूमते
हिन्द के ख़िलाफ़े आईन हिकमते अमली से तमाम अवाम परेशान और बेचैन है. अब तो ज़ाफ़रानी महाज़ में से भी मोदी के ख़िलाफ़े आईन
हिकमते अमली पे आवाज़ें उठने लगीं हैं. अब
सिर्फ हिन्दू तशद्दुत पसंद तंजीमें ही मोदी हुकूमत के साथ हैं, और मोदी की हर बदकारिओं,
बदामलियों में हुकूमत के साथ शाना बा शाना नज़र आ रही हैं.
इस
सहाफी के यौमे जमुहरिया पे सियाह डी.पी. रखने के ऊपर और हक़ बयानी पे तनक़ीद शुरू हो
गई है. अवाम का एक तपका पुरज़ोर तरीके से मुखालिफत
कर रहा है और इस सहाफी को पाकिस्तान का हिमायती बोल के उसके खिलाफ खड़ा हो गया है. उनका कहना है जिस मुल्क का खाते हो, जिस मुल्क का
हवा, पानी इस्तेमाल करते हो, जिस मुल्क में रहते हो उसके साथ गद्दारी करते हो. उनको हुकूमते हिन्द के ऊपर इस सहाफी की तनक़ीद से
इतनी इज़ा और ज़र्ब नहीं पहुंची जितनी उसके हक़ गोई से पहुंची है जिसमे इस सहाफी ने पाकिस्तान
को हर शोबे में भारत से बेहतर और बोहोत बेहतर बताया है. जिसकी वजह से पाकिस्तान का अक्स और तस्सव्वुर भारत से बेहतर
साबित हुआ. जो एक दर हकीकत है.
ये
सहाफी उन तमाम नाक़दीन अवाम से कहना चाहता है के रिज़्क़ की ज़िम्मेदारी अल्लाह की है और
कोई भी इंसान या ज़मीन का टुकड़ा किसी भी इंसान को एक दाना भी नहीं खिला सकता अगर वो
उसकी किस्मत में नहीं है. और अल्लाह बिला तफ़रीक़
कौम और मिल्लत ना सिर्फ मुसलमान बल्कि हिन्दू, क्रिस्टी, सिख या सभी को रिज़्क़ फ़राहम
करता है. उसको भी रिज़्क़ देता है जो उसको मानता
है और उसको भी देता है जो नहीं मानता बल्कि जो उसका मुनकर होता है उसको भी देता है. दूसरी बात बहती हुई हवा को रोक दो उसका रुख मोड़
दो या पानी रोक दो जो अल्लाह की नेमत है. फिर
जब भारत में मानसून वक़्त पे नहीं आता है तो मिन्नतें किस से की जाती है अल्लाह और सिर्फ
अल्लाह से. तो तन्क़ीदीयों काहे को ऐसी बात
कहते हो जो तुम्हारे बस में नहीं है, जिसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ अल्लाह ने अपने
ऊपर रखी है. फिर कोई कहता है भारत से कमा रहे
हो, कोई भी एहसान नहीं कर रहा है इस सहाफी
के ऊपर. वो अपना काम करवाता है उसके बदले में
ये सहाफी उज्र लेता है उसमे भारत और पाकिस्तान किधर से आ गया. दूसरी बात कभी भी इस सहाफी ने २०१० के बाद कहीं
भी जॉब करते वक़त ऐसा एहदनामा या करार नहीं किया की हक़ गोई की बात नहीं करूँगा.
भारत
दुनिया का सबसे बड़ा जमुहरियाती मुल्क है. लेकिन
मोदी हुकूमत आने के बाद जमुहरियत का क़त्ल होने लगा. और जमुहरियाती मालियात में भारत तेज़ी से पीछे की
जानिब जाने लगा. जिसमे शामिल है ई.वि.ऍम. स्केम,
ज़रकारवाज बंदी (नोट बंदी), जो अवाम के हर तपके के लिए परेशान कुन साबित हुआ. दूसरी बात ये मोदी हुकूमत की कैसी जमुहरियाती अमल
है की मुल्क में ज़रकारवाज बंदी लागू की और मुख़लिफ़ीनों को भनक तक नहीं लगने दी. जो फैसला मुल्क की माशियत के लिए तबाह कुन साबित
हुआ क्या उसमे मोदी हुकूमत को मुख़लिफ़ीनों को भरोसे में नहीं लेना चाहिए था.
फिर बल जब्री से ताक़त की बुनयाद पे
मोदी हुकूमत ने बोहोत से फैसले एवान में ख़िलाफ़े जमुहरिया लिए और जब्र, तशद्दुत से अपने
मुवाफिक बिल पास करवा लिए. ट्रिपल तलाक़ पे
मोदी ने लोक सभा से बिल पास करवाया जबकि उसमे किसी भी मुस्लिम नुमाईंदगी से गुफ्तगू
करना भी मुनासिब नहीं समझा, जो सबसे ज़्यादा मुत्तासिर होगा. ऐसी सोच और ज़ेहनियत एक जमुहरियती मुल्क के लिए खतरा हैं, और ऐसे हाकिम जो ऐसी ज़ेहनियत
रखते हैं वो कभी भी जमुहरियत पे यकीन नहीं
रखते और ना ही इज़्ज़त करते है पार्लियामेंट की, बल्कि उनकी सोच ही तशद्दुत पसंद हो जाती
है.
मोदी हुकूमत
आने के बाद तास्सुरात का इज़हार करने की आज़ादी को भी छीन लिया गया. ना सिर्फ बा इज़्ज़त शहरी बल्कि सहाफी, वुक्ला हज़रात,
और सियासतदां भी मोदी, बीजपी या ज़ाफ़रानी तशद्दुत के खिलाफ नहीं बोल सकते. उनके खिलाफ कुछ भी अलफ़ाज़ बोले के हो गए गद्दार,
मुख़ालिफे मुल्क. अब ऐसी ज़ेहनियत को क्या कहेंगे
जो ज़ाफ़रानी महाज़, मोदी हुकूमत और संघ की बोली बोले सिर्फ वही मुल्क का वफादार है बाकी
सब गद्दार. फिर ऐसे हाकिमों की योमे जमुहरियत में शमूलियत का किसी भी बा इज़्ज़त शहरी को
ज़ौक़ और शौक नहीं होना चाहिए.
ये
सहाफी मुल्क के हर उस अवाम, बा इज़्ज़त शहरियों और सियासतदानों से गुज़ारिश और दरख्वास्त
करेगा जो जमुहरियत पे यकीन रखते हैं और समझते हैं की मोदी हुकूमत हूकूमशाही पे यकीन
रखती है और जमुहरियत का क़त्ल कर रही है, वो सभी २६ जनवरी योमे जमुहरिया को सियाह दिन
के जैसे बनाये. अगरचे किसी भी क़ौमी इजलास में
शमूलियत दर्ज करवाना ज़रूरी है तो एक काला फीता गले में डाल के जाए या काली पट्टी वाली
घडी पहन के जाएँ, ताके हुकूमते हिन्द को अपने ख़िलाफ़े जमुहरिया अमल पे पशेमानी और नदामत
हो सके.
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