मेरे
हमक़दम सहाफिओं, हमख्याल सियासतदाओं, दोस्तों, दानिशमंदों और मेरे हम राह पैरोकारों,
दो बातों पे आप लोगो की जानिब रूबरू हुआ हूँ.
पहली बात; अब से इस सहाफी की उरफ़त अबू सहाफी के नाम से जानी जायेगी. हालांकि हुकूमत के गैज़ेट में उसका नाम जुबेर अहमद
खान ही रहेगा. लेकिन सहाफत की दुनिया में अपना
सिक्का ज़माने के बाद अब जुबेर अहमद खान; सहाफी
जुबेर, पत्रकार जुबेर या जर्नलिस्ट जुबेर के नाम से कोई भी खिताब नहीं करेगा, बल्कि
उसकी जगह अबू सहाफी के नाम से उसके मज़मून, तबसिरे शाया होंगे. जो उर्दू, इंग्लिश, हिंदी और दूसरी किसी भी ज़ुबान
में सिर्फ अबू सहाफी नाम से मंज़रे आम में आएंगे.
हालांकि उसके ग्रुप का नाम ऑटोनोमस जौर्नालिस्ट ही रहेगा.
दूसरी
उस बात का तब्सिरा और जराहत करना चाहूंगा जो हूकूमते हिन्द के मौजूदा वज़ीरे आज़म मोदी
और कांग्रेस पार्टी के सरबराह राहुल गाँधी की मक़बूलियत से ताल्लुक रखती है. जनवरी २०१४ से ले कर जनवरी २०१९ तक मोदी की मक़बूलियत का ग्राफ किस
तरह से लुढ़क कर नीचे आया और राहुल का किस तरह से ऊपर पहुंचा. जनवरी २०१४ उससे कुछ अर्से क़ब्ल उसके बाद २०१६ तक
मोदी के हर जलसों में एक हुजूम बरपा रहता था और मकबूलियत का वो आलम था के हुजूम बे
साक्ता चिल्लाता रहता था मोदी मोदी मोदी. इस
क़ेहर बरपा मक़बूलियत को दिखाने के लिए बीजेपी के आला ओहदेदारों, सहाफिओं की जानिब से अवाम की खरीद
फरोख्त की जाती थी , झूठी, फरेबी बातों के ऊपर मोदी को दाद देने को कहा जाता था. लेकिन जल्द ही बीजेपी और अवाम को समझ में आ गया
की खरीद फरोख्त की हुई चीज़ जल्दी ख़राब और खत्म हो जाती है. हराम की लाखों रूपये की कमाई हुई दौलत (पैरोकारों)
में बरकत नाम नहीं होती जबकि हलाल और मेहनत से कमाई हुई दौलत (पैरोकार) की भलें ही
वो हज़ारों में क्यों ना हो सालों साल तक रहती है क्योंकि उसमे बरकत होती है.
हाल
ही में जनवरी २०१९ में राहुल गाँधी यूनाइटेड अरब अमीरात के दौरे पे गए. भारतीय अवाम,
दुबाई की इंतेज़ामिया और वहां के सहाफिओं ने राहुल का बेहद गर्म जोशी से इस्तक़बाल
किया. २०१४-२०१५ में जो नारे कभी मोदी के लिए
लगाए गए थे वो तब्दील हो गए अब मोदी मोदी मोदी की जगह भारतीय अवाम राहुल राहुल राहुल
चिल्ला रहा था और अपने पसंदीदा सियासतदां के दीदार के लिए बे ताब था.
मक़बूलियत
का ये ग्राफ मोदी, बीजेपी, संघी दहशतगर्दों के लिए नीचे आता हुआ और दिगर सियासतदानों
और सियासी जमातों के लिए ऊपर की जानिब जाता हुआ कोई भी दानिशमंद महसूस कर सकता है. इस पस्ती से ये बात भी साबित हो गई की मोदी को झूटी
और फरेबी मकबूलियत दिलवाने में लंगूर सहाफिओं ने अहम किरदार निभाया है. लेकिन जल्द ही अवाम के दिलों दिमाग से वो मोदी
नामज़दा खुमार, गारत गायब हो गया; क्या हुआ वो जोश कहाँ गए वो वुलवूले.
और उसकी सिर्फ और सिर्फ वाहिद वजह है इश्तेहार पे बे पनाह भरोसा करना और काम पे कम. अब मोदी से अवाम जवाब तलब करेगी ५ सालों में कितना काम किया और कितना इश्तेहार, बेरुन मुल्क, घूमने फिरने में फरोख्त किया तो मोदी जी लगे फवाइद की बरसात करने. लेकिन सवाल अब वही है मुल्क की अवाम को पूरे ५ साल पानी की एक एक बूंद के लिए तरसाया, जब अवाम को आपकी मदद की ज़रुरत थी तब आपने उनका क़त्ल नोट बंदी, जी अस टी, मेह्गाई, लीचिंग, कश्मीर, फ़िरक़ा परस्ती, दहशतगर्दी नामक जानलेवा हथियारों से किया, और जब आपकी अवाम को कोई ज़रुरत ही महसूस नहीं हो रही है तब आप बरसात करने में लगे है. यही बारिश अगर आपने २०१४ में नहीं २०१५ में नहीं २०१६ में भी नहीं अगर २०१७ से भी की होती तो आपका और आपकी जमात का अक्स और तस्सव्वुर अवाम की नज़रों में कुछ और ही होता. और २०१८ के इख़तताम तक आपका अपना रिवायती वोट बैंक मुस्तहकम हो जाता जिसका फ़ायदा आपको २०१९ में मिलता.
इससे पहले इस सहाफी ने अपने एक मज़मून में साफगोई से इस बात को मंज़रे आम किया है की २०१९ में बीजेपी को ना तो हिन्दू वोट देगा और ना ही मुस्लिम अब उनके पास बच जाता है उनका अपना रिवायती वोट बैंक लेकिन वो भी काफी कश्मकश में है की किस जमात को २०१९ में राय शुमारी की जाए. १०% आला दर्जे को मेहफ़ूज़ करना भी अपने रिवायती वोट बैंक को लुभाने की एक इंतेखाबी स्कीम है. लेकिन इसके ज़्यादा असरात अवाम के दिलों दिमाग में नुमाया नहीं हो सकेंगे बरक्स उसके जो ज़ख़्म उन्होंने मोदी इंतेज़ामिया में झेले हैं वो शायद कभी नहीं भरने वाले साबित होंगें.
और उसकी सिर्फ और सिर्फ वाहिद वजह है इश्तेहार पे बे पनाह भरोसा करना और काम पे कम. अब मोदी से अवाम जवाब तलब करेगी ५ सालों में कितना काम किया और कितना इश्तेहार, बेरुन मुल्क, घूमने फिरने में फरोख्त किया तो मोदी जी लगे फवाइद की बरसात करने. लेकिन सवाल अब वही है मुल्क की अवाम को पूरे ५ साल पानी की एक एक बूंद के लिए तरसाया, जब अवाम को आपकी मदद की ज़रुरत थी तब आपने उनका क़त्ल नोट बंदी, जी अस टी, मेह्गाई, लीचिंग, कश्मीर, फ़िरक़ा परस्ती, दहशतगर्दी नामक जानलेवा हथियारों से किया, और जब आपकी अवाम को कोई ज़रुरत ही महसूस नहीं हो रही है तब आप बरसात करने में लगे है. यही बारिश अगर आपने २०१४ में नहीं २०१५ में नहीं २०१६ में भी नहीं अगर २०१७ से भी की होती तो आपका और आपकी जमात का अक्स और तस्सव्वुर अवाम की नज़रों में कुछ और ही होता. और २०१८ के इख़तताम तक आपका अपना रिवायती वोट बैंक मुस्तहकम हो जाता जिसका फ़ायदा आपको २०१९ में मिलता.
इससे पहले इस सहाफी ने अपने एक मज़मून में साफगोई से इस बात को मंज़रे आम किया है की २०१९ में बीजेपी को ना तो हिन्दू वोट देगा और ना ही मुस्लिम अब उनके पास बच जाता है उनका अपना रिवायती वोट बैंक लेकिन वो भी काफी कश्मकश में है की किस जमात को २०१९ में राय शुमारी की जाए. १०% आला दर्जे को मेहफ़ूज़ करना भी अपने रिवायती वोट बैंक को लुभाने की एक इंतेखाबी स्कीम है. लेकिन इसके ज़्यादा असरात अवाम के दिलों दिमाग में नुमाया नहीं हो सकेंगे बरक्स उसके जो ज़ख़्म उन्होंने मोदी इंतेज़ामिया में झेले हैं वो शायद कभी नहीं भरने वाले साबित होंगें.


No comments:
Post a Comment