Friday, 25 January 2019

सय्यदना की रूहानी ताक़त के आगे पस्त हुई शैतानी ताक़त

रूहानी शख्सियात और शैतानों की शैतानी.

बीजेपी और मोदी हमेशां से मुस्लिम समाज में निफ़ाक़ और फूट डाल के अपना सियासी फ़ायदा देखते हैं.  लेकिन हर बार ये लोग अपने ही फेके हुए जाल में फस जाते हैं फिर बदनाम और रूसवा होते हैं.  ये वीडियो हाल ही में ११ दिसंबर को तीन राज्यों से बीजेपी की ताजपोशी रूह पोश हो जाने के एक हफ्ते के बाद मसूल हुई थी.  लेकिन कुछ मसरूफियात थी इसलिए इस वीडियो और सय्यदना की रूहानियत की निस्बत से कुछ कलमबंद नहीं कर सका. लेकिन जब सब कुछ आईने की तरह साफ़ हो चुका है और मोदी का हर बातिल बरहना हो गया है तो इस सहाफी का फ़र्ज़ ए ऍन है की हक़ और बातिल के बीच कुछ मज़मून शाय करे और नाज़रीन को हक़ीक़त और सय्यदना की रूहानियत से रू बरू करे.
हकीकत में अगर देखा जाय तो ये सय्यदना का रूहानी फेज़ था मुस्लिम अवाम के ऊपर जो मोदी की शैतानी को कामयाब नहीं होने दिया. जिस तरह से वीडियो में सय्यदना को एक शैतानी ताक़त का मरकज़ और खोड़ला कहा जा रहा है असल में वो उनकी रूहानियत है.  क्योंकि मोदी के दिल के कैफियत उनके ऊपर ज़ाहिर हो गई होगी के वो मुस्लिम समाज में निफ़ाक़ डालने की निस्बत से ना की मुसलमानो का भला करने की निस्बत से उनके पास आये हैं.  मोदी हुए या बीजेपी के कारकून या कोई और संघी सभी को ऐसा लगता है शिया, बोहरी, सुन्नी, वहाबी, बरेलवी या एहले हदीस ये अलग अलग मज़हब है जो की बिलकुल गलत है.  और ये ही कट्टरपंथी हिन्दू समाज की खुली गुमराही है के वो बोहरी समाज या शिया समाज के मौलाना के पास जा के उस समाज को फायदा देने की बात तो करते है लेकिन दीगर मुस्लिम समाज की अनदेखी करते है.  और यहीं से ये कट्टरपंथी हिन्दू रूसवाई के अंधेरों में गारकाब हो जाते हैं.  क्योंकि शिया, बोहरी, देवबंदी, सुन्नी, बरेलवी, एहलेहदीस ये सभी मुस्लिम हैं और एक अल्लाह को और नबी मोहम्मद सल्लम को आखिर पैगम्बर तस्लीम करते हैं. तो कोई भी अगर इनसे मुस्लिम समाज को इज़ा पहुंचाने का काम करने को कहेगा तो ये मौलाना तो ऐसा नहीं करेंगे लेकिन कहने वाले का हाल बूरा हो जायेगा.    

ये सहाफी समझने से क़ासिर है की संघी, बीजेपी और कट्टरपंथी हिन्दू समाज को ये ग़लतफहमी कहाँ से हो गई के शिया, सुन्नी, बोहरी ये अलग अलग है ये सभी इस्लाम को मानने वाले हैं इस्लामिक स्कूल ऑफ़ थॉट्स अलग हैं लेकिन ख़ास अक़ीदा वही है जो एक सच्चे मुसलमान का होना चाहिए. एक अल्लाह की हम्दो सना और पैगम्बर मोहम्मद सल्लम को नबी अखिरूज़मा तस्लीम करना, अल्लाह के तमाम पेगम्बरों, नबिओं, अम्बियाओं, उसकी तमाम किताबों पे ईमान अल्लाह के तमाम फरिश्तों और रोज़ाये जज़ा पर ईमान. 

यू.पी.ए. दोयम के इंतेखाबात के पहले ऐसा ही गलीज़ हरबा राजनाथ सिंह ने खेला था और लखनऊ में लाल सफ़ेद चेक का इस्लामिक गमछा गले में पेहेन के मौलाना क़ल्बे जव्वाद के पास पहुंच गए, और लगे सिर्फ शिया हज़रात को फवाइद की बारिश करने की बातें करने.  अब मौलाना साहब भी कोई कच्ची गोलिया थोड़ी खा के बैठे थे समझ गए की ये मुसलमानों के अंदर शिया सुन्नी का निफ़ाक़ डाल के अपना सियासी उल्लू सीधा करना चाहते हैं.  उन्होंने भी नहले पे दहला मार दिया और मीडया से खिताब करते हुए साफ़ अलफ़ाज़ में कहा राजनाथ सिंह जी एक ख़ास तपके के फवाइद की बात कर रहे थे हमने उनसे कहा सारे मुसलमानो की बात करिये बाबरी मस्जिद की निस्बत से भी हमारा फैसला साफ़ है उसकी बाज़याबी मुसलमानो को दीजिये तो हमारा वोट आप को पड़ेगा.  फिर हुआ वही जो होना था यू.पी.ए. दोयम के वक़त बीजपी की क्या हालत हुई थी सबको मालूम है.  लेकिन इस गहमा गहमी में सभी राजनाथ और मौलाना साहब की मीटिंग को भूल गए लेकिन हम जैसे सहाफी और दानिशमंद तो सभी बातो का ज़खीरा रखते है और सही वक़त पे उसको मन्ज़रे आम करते हैं. 

बीजेपी की २०१४ में सरकार बनने के बाद हिन्दू शिद्दतपसन्द तंज़ीमे और उनके सरबराह बोहोत उछल कूद मचा रहे थे. एक टी वि इंटरव्यू में सुब्रमणियम स्वामी कहते हैं हम चाहते हैं शिया सुन्नी आपस में लड़ के मर जाएँ जो बचेगें उनको हम अरबिस्तान या पाकिस्तान भेज देंगे फिर भारत होगा हिन्दू राष्ट्र.  इससे ये बात फिर साबित हुई मुस्लिम माशरे में निफ़ाक़ डालने वाले सिर्फ और सिर्फ सियासी रहनुमा और सियासी जमातें हैं.   कोई भी सच्चा मुसलमान या मौलाना चाहे वो किसी भी इस्लामिक स्कूल ऑफ़ थॉट्स का हो मुसलमानों में निफ़ाक़ हरगिज़ नहीं डालेगा, या उनकी दिल अज़ारी हर्गिज़ नहीं करेगा.  हाँ अब जो संघ और बीजेपी के दलाल होंगे वो बाबरी मस्जिद और मदरसों पे आम मसुलमान से मुख्तलिफ राये रखते होंगे और ये ही हैं मुनाफ़िक़ इस्लाम और मुसलमानो को इज़ा पहुंचाने वाले गद्दार मुसलमानों के दुश्मन  और अगर खिलाफते उस्मानिया अभी भी हयात होती तो ऐसे मुनाफ़िक़ों की गर्दन क़लम करने का फ़तवा आईद हो चुका होता.

ऐसा ही एक मामला इस सहाफी के पीरो मुर्शिद के सामने पेश आया था जब वो हयात थे.  २०१४ में उत्तर प्रदेश के इंतेखाबात के वक़्त एक सामजवादी के एक आला रहनुमा ने उनके पास आ के दुआ की दरख्वास्त की, और उनको शेरवानी का कपडा पेश किया उसके साथ सिलाई के पैसे भी दिए.  उस नुमाईंदे के साथ मीडिया का हुजूम भी था. हज़रत ने मीडिया को फोटो वगेरा लेने को मना किया और इस दुआ को गैर सियासी ही रखने को कहा.   उस ना मुराद ने अल्लाह के वली की निस्बत को गलत तरीके से पेश किया और चोरी से हज़रत के फोटो उसके साथ हाथ मिलाते हुए मीडिया के सहारे खींच लिए.  दुसरे रोज़ अपने रसूख से उसने ख़बरों को अखबारों की सुर्खियां बना के पेश किया, समूचा उत्तर प्रदेश का मुस्लिम सामजवादी को वोट करे ऐसी अपील हज़रत ने की है. जब की उन्होंने उसके अच्छे मुस्तक़बिल के लिए दुआ की थी ना की समाजवादी की कामयाबी की और ना ही ऐसी कोई अपील मुस्लिम सामज से की थी. बस खबर देखते ही हज़रत का दिल दुःख गया जो बात उन्होंने नहीं कही वो उनके ऊपर बोहतान के जैसी लादी जा रही है और हो गया २०१४ में बेडा गर्क समाजवादी का.    

फिर कॉग्रेस के युवराज राहुल गांधी मुतावातिर हार रहे थे.  २०१८ में ५ सूबों के इंतेखाबात के कुछ अर्से पहले अजमेर में ख्वाजा अजमेरी के दर पे चले गए.  ख़ामोशी से दुआ मांगी अपने मुस्तक़बिल के लिए अपनी पार्टी के लिए और आ गए ना कोई मीडिया की सुर्खिया और ना कोई खबर लेकिन वली का करम हुआ और हो गए कामयाब.  उसी तरह से २०१७-१८ में शेखर धवन भारीतय क्रिकेट के गब्बर बुरी तरह से फेल हो रहे थे. फ़ार्म ज़बरदस्त ख़राब चल रहा था यहाँ तक के टीम से निकाले जाने की नौबत आ पहुंची थी. पहुंच गए ख्वाजा के दर पे और हो गया बेडा पार.  फिर तो रनों को बौछार कर डाली.  अब ऐसी बाते भले ही पब्लिक डोमेन मिडिया में खबरों की सुर्खिया नहीं बने लेकिन हम जैसे सहाफियों की ज़िम्मेदारी है की सच्ची खबर की जड़ तक पहुंच के नज़रीनों को रू बरू करवाएं.  फिर विराट कोहली जो ऑस्ट्रेलिया २०-२० फिर एक दिवसीय बुरी तरह फ्लॉप रहे उसके बाद टेस्ट में १-१ की बराबरी में थे.  फिर किया था पहुंच गए काला रूमाल बाँध के अपनी शख्सियत छुपा के ख्वाजा के दर पे और मांग ली मन्नत और देखिये अब क्या हाल है. 

जिस तरह ज़ाफ़रानी सहाफी और मीडिया सैयददना मुफ्फदल की रूहानी को गलत तरह से पेश कर के उनको ज़लील कर रहें हैं ये सहाफी ऐसी ख़बरों की सख्त मज़्ज़मत करता है और ऐसे ज़ाफ़रानी सहाफिओं और मिडिया को चैलेंज करता है की किसी भी कामिल मुस्लिम मौलाना की जिस किसी भी पंडित से चाहें डिबेट करवा लें फिर देखें कौन है खोड़ला पनोती बाज़ और कौन है रूहानी. 

No comments:

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...