अज़ीज़ नाज़रीन
पाकिस्तान पाकिस्तान खूब करते,
पाकिस्तान से जब डॉलर मिलते
डकारने में ज़रा सा नहीं डरते
सहाफ़ी ज़ुबेर
भक्तों के पापा को एक और नाम मिल गया “वसूली भाई”। जी हाँ नाज़रीन जिस रोज़ से अदालत ए उज़मा का डंडा चला है और अस.बी.आई. ने इलेक्टोरल बांड का डाटा अवामी किया है भक्तों के पापा की डाका ज़नी, मुश्त ज़नी, फ़रेब, धोके बाज़ी, वतन से ग़द्दारी, काला बाज़ारी सब ज़ाहिर हो गई है। अब हालात ऐसे हो गए हैं जो कभी दूसरों के बाथ रूम में झांका ताकी करता था गुजरात का वज़ीर ए आला होते हुए खातूनों की जासूसी करवाता था अगर वोह सेक्युलर तंज़ीम के ख़्यालात की होती थी तो उनको पहले ख़ौफ़ दिखाता था, फ़िर ख़ाकी चड्डी भिजवाता था। मुख़ालेफ़ीन के सियासतदानों को गिरफ्तार करवाना ईडी, इनकम टेक्स का डर दिखाना उसकी आदत में शुमार था। लेकिन अब ख़ुद ही डर के मारे घंटों बाथरूम और पख़ाने में बैठा रहता है।
नाज़रीन जिस तरह से रावण की कमज़ोरी उसकी नाभी में थी और तीर ने उसकी नाभी को तबाह कर दिया फ़िर रावण मारा गया इसी हिसाब से मौजूदा रावण की कमज़ोरी दस्तूरी इदारे हैं। उनको मार डालो रावण मर जाएगा। दूसरी बात यह ग़द्दार अंग्रेज़ों का ग़ुलाम इसके भक्त और लंगूर लँगूरनियाँ हर इन्तेख़ाब से क़ब्ल पाकिस्तान को खूब कोसते थे और पाकिस्तान, मुसलमानों के नाम पर इन्तेख़ाब जीतते थे। लेकिन क्या आपको पता है इस ग़द्दार ने दुबाई मुक़ीम पाकिस्तानी ताजिर से भी करोड़ों हाज़ार डॉलर का चन्दा वसूल किया है।
क़ाबिल ए एतेमाद ज़ाराये से मालूम हुआ है उस ताजिर ने भीक में वसूली भाई को डॉलर नहीं दिए बल्कि पाकिस्तान के तोहसीह की शर्त रख दी जिसको भाई ने क़ुबूल किया है।
यह सिलसिला २०१५ से चल रहा था लेकिन डील २०२० या २०२२ में फाइनल हुई है। इस दौरान कई बार डोबाल भी जा कर दुबाई में पाकिस्तानी बरियानी खा कर हज़म कर आया है। फ़िर गटर (भारत) में आ कर पख़ाना किया है। जो संघी, बीजेपी वाले हर मुसलमान में पाकिस्तानी देखते थे बड़ी बड़ी बातें करते थे "खायगे भारत का, गायेगें पाकिस्तान का"। अब जवाब दें बीजेपी वाले, संघी तुम तो पाकिस्तान का खा कर गंदगी भारत में कर रहे हो और तोहसीह पर रज़ामंदी दे रहे हो।
इन्तेख़ाब में पाकिस्तान को कोसने की बातें अलग होती हैं और हक़ीक़त में उस पर अमल करना अलग।सिर्फ़ और सिर्फ़ अनपढ़ जाहिल भारत के अवाम को पाकिस्तान और मसुलमानों के नाम पर मुत्तसिब करना और अपना सियासी कुनबा बढ़ाना। मेरा परिवार उसका मतलब ही सियासी कुनबे से होता है। अगर उसमे किसी भारतीय के लिए जगह होती तो पाकिस्तान से पैसे लेने के पीछे की क्या हिकमत है। वोह भी चोरी छुपे। जिस तरह से इन लोगों की आदत है रात की तारीकी में डाका डालने की बैक डोर से दाख़िल करने की वही हिकमत वसूली भाई ने पाकिस्तान की निस्बत से इख़्तेयार की है। वोह तो भला हो अदालत ए उज़मा ख़ास मोहतरम चीफ जस्टिस चंद्रचूण साहब का की तमाम काले चिट्टे खुल कर बाहर आ गए। उसमे पाकिस्तानी भेद भी खुल गया की वसूली भाई को मियां नवाज़ शरीफ़ की बरियानी इसलिए पसंद आती थी और बिन बुलाये दुबाई ख़लीज से सीधा बरियानी खाने के लिए पाकिस्तान उतर गए थे।दरअसल ख़ुश ख़बरी सुनाना थी पाकिस्तान को की तुम्हारी ज़मीन बढ़ने वाली है हिंदुस्तान की ज़मीन घटने वाली है।
नाज़रीन यही वजह है अभी तक इस इन्तेख़ाब में पाकिस्तान का नाम नहीं आया अब इस मज़मून के लिखे जाने के बाद तमाम बीजेपी वालों के मुँह से पाकिस्तानी बदगुमानी की एक बाढ़ सी आ जाए तो कोई ग़लत नहीं होगा। लेकिन वोह सब दिखावा होगा अपनी हरामखोरी से बचने और अपने पापा के डाका डालने की हिकमत को बचाने के लिए होगा।
नाज़रीन दरअसल इसमें वसूली भाई या तड़ी पार भाई की कोई ग़लती नहीं है। इनके खून में ही ग़द्दारी पेवस्त है। दिखाने का कुछ और और होना कुछ और। जिस देश में रहेगें उस ही की जासूसी करेगें, जिस थाली में खायेगें उस ही में गंदगी करेगें। जिस घर में रहेगें उस घर की भाभी, मामी के साथ "नियोग" इख़्तेयार करेगें। ग़द्दारी तो इनके खून में कूट कूट कर भरी है। माफ़ी बाज़ सावरकर "ग़द्दार", नाथूराम आज़ाद भारत का पहला दहशतगर्द "ग़द्दार", ग़ुलाम भारत का पहला राजा वसूली भाई ग़द्दार। सावरकर ने अंग्रेज़ी ग़ुलामी इख़्तेयार की थी और आज़ादी के मतवालों की जासूसी कर के उनको गिरफ्तार करवाता था। वोह काग़ज़ी घोड़ा पेपर में एक भारतीय था दर हक़ीकत वोह एक अंग्रेज़ी पालिसी का दलाल था। जो आज़ादी को ग़लत और अंग्रेज़ी पालिसी को दुरस्त बताता था।
अल ग़र्ज़ जिस जिस ने चलती हुई हुकूमत के साथ ग़द्दारी कर के ख़ुद हाकिमियत इख़्तेयार कर ली मतलब उसके नुत्फ़े में कमज़ोरी है। हलाल का नुत्फ़ा मौत, गिरफ्तारी या अपने ज़ाती नफ़े के लिए कभी हराम काम नहीं करेगा। अपने भाई के पीठ में खंजर नहीं उतारेगा। “ग़द्दारी” नहीं करेगा।
फ़िर जिसने मराठी होते हुए भी अपने भोले भाले मराठी भाई का सियासी क़त्ल किया उसको तब हिंदुत्व की याद नहीं आई जब हुकूमत बनी थी। तब तो बेहतरीन वाज़ारतख़ाना ले कर बैठ गया था। अगर असली मर्द था जब हुकूमत बनी थी तभी बग़ावत करना थी तब लगता था तूने हिंदुत्व के लिए जंग लड़ी है। लेकिन तीन साल बाद कुम्भकर्ण की नींद से जागा और हिंदुत्व याद आया मतलब तूने ग़द्दारी की है और अपनी
ग़द्दारी को हिंदुत के भगवा कफ़न में ढांकने की गलीज़ हिकमत है।
मन मुटाव किस तंज़ीम में नहीं होते हैं। लेकिन पैसा ले कर तंज़ीम के साथ ग़द्दारी करना दूसरी तंज़ीम में जाना, उनके नुमाइंदों को फोड़ना यह मर्दों की और हक़ीक़ी सियसतदाँ की सिफ़त नहीं है। हाँ एक संघी भाजपाई की ज़रूर है। ठीक है अगर तंज़ीम के आला अराकीन तुम्हारी बात नहीं सुन रहे थे तो इस्तीफा देना था। वापिस से दूसरी तंज़ीम से इन्तेख़ाब लड़ना था फ़िर देखते अवाम तुम्हारे साथ है या तुम्हारी ग़द्दारी का सबक़ सिखाया है। अगर मुंतखिब हो कर आते तो जीत तुम्हारी फ़िर जिस तंज़ीम से मन मुटाव था उसको हाशिये पर ले सकते थे। अगर हार गए तो तो “ग़द्दारों” का मुँह काला।
सहाफ़ी ज़ुबेर
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